वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ वरिवस्यारहस्ये
तन्मध्ये परिभावयेद्विषलतान्तूपमेया कृतिम् ॥'१'
जब कुण्डलिनी जागती है तब समस्त चक्रों एवं ग्रंथियाँ भेदन हो जाता है—
'सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुण्डली ।
तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रंथयोऽपि च ॥'२
आधारशक्तिरूपा कुण्डलिनी के ऋज्वीभूता होने पर इड़ा एवं पिङ्गला की मृत्यु
हो जाती है क्योंकि कुण्डली के जागृत होने पर सुषुम्ना नाड़ी में प्राण प्रवेश कर
जाता है—'ऋज्वीभूता तथा शक्तिः कुण्डलीसहसा भवेत् । तदा सा मरणावस्था
जायते द्विपुराश्रया ॥'३ मूलबंध लगाने से अधोगामी अपान ऊर्ध्वगामी होकर
अग्निमण्डल में पहुँच जाता है, (नाभि के अधोभाग में स्थित त्रिकोण जठराग्नि में
प्रविष्ट होने पर), अपानवायु से ताड़ित जठराग्नि शिखा दीर्घ हो जाती है और
अग्नि एवं अपान अग्नि की दीर्घशिखा से ऊष्ण होकर ऊर्ध्वगति प्राण में प्रवेश कर
जाते हैं । अपान की ऊर्ध्वगति से दीप्त अग्नि और प्रदीप्त हो उठती है । उसके
ताप से कुण्डलिनी प्रतप्त होने से जाग उठती है और ब्रह्मनाड़ी में प्रवेश कर जाती
है—'तेन कुण्डलिनी सुप्ता सन्तप्ता सम्प्रबुध्यते । दण्डाहता भुजङ्गीतन्निश्चस्य ऋजुतां
व्रजेत् । बिलं प्रविष्टेव ततो ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् ॥'४
जिस प्रकार कुञ्जी से किवाड़ खुलता है उसी प्रकार कुण्डली के उद्बोधन
रूप चाभी से मोक्षद्वार का कपाट भी खुल जाता है—'उद्घाटयेत् कपाटं तु यथा
कुंचिकया हठात् । कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥'५ जिस मार्ग के
द्वारा प्राणी ब्रह्मस्थान में प्रवेश करता है उस ब्रह्मद्वार को कुण्डलिनी अपने मुख से
ढके हुए हैं ।६ कन्द के ऊर्ध्व भाग में स्थित कुण्डलिनी जीवों को बंधन में डालने
के लिए सोई पड़ी रहती है किन्तु वही योगियों को मोक्ष दिलाने हेतु जाग उठती
है—'कन्दोर्ध्वं कुण्डलीशक्तिः सुप्ता मोक्षाय योगिनाम् ॥७ इसको चलाने पर यह
जाग उठती है और योगी मुक्त हो जाता है—'कुण्डली कुटिलाकारा
सर्पवत्परिकीर्तिता । सा शक्तिश्चालिता येन स मुक्तो नात्र संशयः ॥'८ चूँकि यह
ब्रह्मद्वार को मुख से ढके है—'येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम् ।
मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी'—अतः उसे जगाना आवश्यक है जिससे कि
वह ब्रह्मद्वार पर सोना छोड़कर ब्रह्मद्वार के मार्ग ब्रह्मनाड़ी में प्रवेश कर जाय । इस
सर्पिणी को जगाने हेतु इसकी पूँछ पकड़कर इसे जगाना चाहिए—'पुच्छे प्रगृह्य
भुजङ्गी सुप्तामुद्बोधयेच्चताम् ।'९ निद्रां विहाय सा शक्तिरूर्ध्वमुत्तिष्ठते हठात् ॥'
इसको जगाने के लिए योगी को चाहिए कि वज्रासन लगाकर एवं शक्तिचालनी मुद्रा
साधकर फिर भस्त्रिका प्राणायाम करे । नाभिदेश में स्थित सूर्य का आकुंचन करे
(नाभि के आकुंचन द्वारा) फिर सूर्य के आकुंचन से कुण्डली शक्ति का चालन
करे । दो मुहूर्त (चार घड़ी) तक निर्भय रहकर चालन करने से सुषुम्णागत यह
कुण्डलिनी थोड़ा बहुत जाग जाती है । और परिणामस्वरूप वह सुषुम्णा-मुख का
१. त्रिपुरासार समुच्चय २-९. हठयोगप्रदीपिका