बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
प्रथम रजिस्टर कापी संख्या ३ वस्तुत कापी संख्या ५ —
तत्र तावच्छौनकसूत्रम्—विमानस्थ यन्त्र की शक्तियों के सम्बन्ध में शौनक सूत्र है—
अदिनिक्ष्मावाय्वर्केन्द्वमृताम्बरशक्तयस्सप्त वैमानिका इति तासा नामान्य-
नुक्रमिष्याम । उद्गमा पञ्जरा सूर्यशक्त्यपकर्षिणी विद्युद्द्वादशका परशक्त्यप-
कर्पिणी† कुण्टिणी मूलशक्तिश्चेति ॥
अदिति-अग्नि, क्ष्मा—पृथिवी, वायु, सूर्य, इन्दु-चन्द्रमा, अमृत-जल, अम्बर—आकाश, ये
७ शक्तियां है जिन के नाम कहेंगे—कहते हैं जो कि उद्गमा, पञ्जरा, सूर्यशक्त्यपकर्षिणी,विद्युद्द्वादशका
परशक्त्यपकर्षिणी, कुण्टिणी, मूलशक्ति ॥
सौदामिनीकलायामपि—सौदामिनीकला में भी कहा है—
सू० मलयसवनशक्तयो वैमानिका इति ॥
बो० गृ०
मकारोदितिशक्तिस्स्यादुद्गमेति प्रचक्षते ।
लकार पृथिवीशक्ति पञ्जरेत्यभिधीयते ॥ १ ॥
यकरो वायुशक्तिस्स्यात्सूर्यशक्त्यपकर्षिणी ।
रकारस्सूर्यशक्तिस्स्याद् विद्युद्द्वादशकस्मृत ॥२॥
सकारस्त्विन्दुशक्तिस्स्यात् परशक्त्यपकर्षिणी ।
जलशक्तिर्वकारस्स्यात् कुण्टिणीत्यभिधीयते ॥ ३ ॥
नकारोम्बरशक्तिस्स्यान्मूलशक्तिरिति स्मृत । इत्यादि ।
म, ल, य, र, स, व, न शक्तियां विमान की है । म अदिति—उद्गमा है ऐसा कहते हैं ल
पृथिवी-पञ्जरा कही जाती है, य वायु--सूर्यशक्त्यपकर्षिणी, र सूर्य—विद्युद्द्वादशक शक्ति कही है, स
इन्दु-परशक्त्यपकर्षिणी, व जलशक्ति—कुण्टिणी कही जाती है, न अम्बर-मूलशक्ति कही है॥१-३।
एवमुक्त्वा सप्तशक्तिस्वरूप शास्त्रत स्फुटम् ।
तत्तत्कृत्य यथाशास्त्र सग्रहेण निरूप्यते ॥ ४ ॥
इस प्रकार ७ शक्तियों के स्वरूप को शास्त्र से स्फुट कहकर उनके कार्य शास्त्र से संक्षेप से कहे
जाते हैं ।
† 'परशक्त्यपकर्षिणी' शब्द छूट गया हस्तपाठ में ।
७२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासारग्रन्थ में कहा है—
विमानस्योर्ध्वगमनमुद्गमा शक्तिस्स्मृता ।
अधस्ताद्गमनं तस्य पञ्जराशक्तितो भवेत् ॥ ५ ॥
अ्रर्का शूष्णापहारी स्याद् घृष्टिशक्त्यपकर्षिणी ।
परशक्त्यपकर्षण्या सर्वशक्तिविरोघनम् ॥ ६ ॥
विद्युद्द्वादशकाद् यानविचित्रगमनं स्मृतम् ।
मूलशक्त्या सर्वशक्तिचलनाद्या प्रकीर्तिता ॥ ७ ॥
सप्तशक्तिक्रिया एवमुक्त्वा यानस्य शास्त्रतः ॥ ८ ॥
अथ विद्युद्द्वादशकविचारः क्रियतं क्रमात् ।
विमान का ऊपर जाना उद्गमा शक्ति से कहा, उसका नीचे गमन पञ्जरा शक्ति से, घर्षणा-
शक्त्यपकर्षिणी-सूर्यशक्त्यपकर्षिणी सूर्यकिरणों की उष्णता को हटानेवाली, परशक्त्यपकर्षिणी से सब
शक्तियों को रोक देना होता है, विद्युद्द्वादशक शक्ति से विमान का विचित्रगमन कहा, मूलशक्ति से
सब शक्तियों का दूर हो जाना आदि, इस प्रकार विमान की ७ शक्तियों की क्रियाएं शास्त्र से
कहकर—॥ ५-८ ॥
तदुक्तं सौदामिनीकलायाम्—वह कहा है सौदामिनीकला पुस्तक में—
विमानगतिवैचित्र्यभेदा द्वादश स्मृताः ।
तत्क्रियाकरणे विद्युच्छक्तयस्तावदेव हि ॥ ६ ॥
तासां नामानि यानस्य गतिभेदान्यपि क्रमात् ।
समुच्चयान्निरूप्यन्ते सप्रहेणात्र शास्त्रतः ॥ १० ॥
चलना कम्पनाथोर्ध्वा अधरा मण्डला तथा ।
वेगिनी अनुलोमा च तिर्यञ्ची च पराङ्मुखी ॥ ११ ॥
विलोमा स्तम्भना चित्रा चेति द्वादशशक्तयः ।
विमानचालनं विद्युच्चलनाशक्तितस्स्मृतम् ॥ १२ ॥
तत्कम्पन विशेषेण कम्पनाशक्तितो भवेत् ।
विमानस्योर्ध्वगमनमूर्ध्वासञ्चोदनाद् भवेत् ॥ १३ ॥
यानाधोगमनं विद्यादधराशक्तितः क्रमात् ।
विमानमण्डलगनिमण्डलाशक्तितस्स्मृता (त ?) ॥१४॥
विमान की विचित्र गति के १२ भेद कहे हैं उन विचित्र गतियों में क्रिया करने के निमित्त
उतनी ही अर्थात् १२ विद्युत् शक्तियां है। उन विद्युत् शक्तियो और विमान के गति के भेदों के नाम
क्रम से एकत्र रूप में संक्षेप से यहां शास्त्र से निरूपित किए जाते हैं। चलना, कम्पना, ऊर्ध्वा, अधरा,
मण्डला, वेगिनी, अनुलोमा, तिर्यञ्ची, पराङ्मुखी, विलोमा, स्तम्भना, चित्रा ये विद्युत् शक्तियां हैं।
विमान का चालन तो चलना विद्युत्शक्ति से कहा, उसका कम्पनविशेष कम्पना विद्युत् शक्ति से होता है,
शक्त्यधिकरण ] [ ७३
विमान का ऊर्ध्वगमन तो ऊर्ध्वा विद्युत् शक्ति की प्रेरणा से होता है, विमान का अधोगमन—
अधोगमन-नीचे आना अधरा विद्युत् शक्ति से, विमान की मण्डलगति-चक्रगति मण्डला विद्युत्
शक्ति से कहा-॥६ १४॥
वेगिनीशक्तितो यानगतिवैचित्र्यमुच्यते ।
अनुलोमाद् विमानस्य प्रादक्षिण्यगतिस्स्मृता ॥ १५ ॥
तिर्यग्गमनमित्याहुस्तिर्यञ्चीशक्तियोगत ।
पराङ्मुखीशक्तितस्स्याद् विमानस्य पराङ्मुखम् ॥ १६ ॥
विलोमशक्त्या यानस्यापसव्यगतिस्स्मृता ।
स्तम्भनाशक्तितो यानस्तम्भन परिकीर्तितम् ॥ १७ ॥
चित्राख्यशक्त्या यानस्य नानाविधगतिस्स्मृता ।
इति विद्युद्द्वादशकशक्तिकार्याण्यथाक्रमम् ॥ १८ ॥
उक्तानि विमानगतीरनुसृत्य यथाविधि ॥ १६ ॥ इत्यादि
वेगिनीशक्ति से विमान की विचित्र गति कही जाती है, विमान के अनुलोम से प्रादाक्षिण्य अर्थात्
अनुलोम गति, विमान की तिर्यक्—तिरछी गति तिर्यक् शक्ति के सम्बन्ध से, पराङ्मुखीशक्ति से विमान
की पराङ्मुखगति हो, विलोम शक्ति से विमान की अपसव्य—विलोमगति कही है, स्तम्भनाशक्ति से
यान की स्तम्भनगति कही है, चित्रानामक शक्ति से विमान की नानाविध गति कही जाती है। इस
प्रकार विद्युत् को १२ शक्तियों के कार्य यथाक्रम कहे हैं, विमान की गतियों का यथाविधि अनुसरण
करके ॥ १५—१६ ॥
शक्तयः पञ्चेति नारायणाः ॥ अ० ४ सू० २ ॥
बो० वृ०
मतान्तरविचारार्थं सूत्रोय परिकीर्तित ।
तदर्थबोधकपदान्युक्तान्यस्मिन् चतु * क्रमात् ॥ २० ॥
विमानगतिवैचित्र्यक्रियाकरणशक्तय ।
सयोजाताद्यप्रयन्त्रेण सञ्जाता पञ्च एव हि ॥ २१ ॥
इति नारायणमुनिस्स्वानुभूत्याब्रवीत् स्वयम् ।
तन्मताभिप्रायमेव सूत्रेऽस्मिन् सम्प्रदर्शित ॥ २२ ॥
तत्रादिमपदाच्छक्तिस्वरूपसन्निदर्शित ।
सङ्ख्या तत्प्रभेदस्तु द्वितीयपदतस्स्मृतः ॥ २३ ॥
मतान्तरप्रकटन तृतीयपदतस्स्मृतम् ।
मतप्रवर्तकमुनि तुरीयात् सम्प्रदर्शितम् ॥ २४ ॥
पदार्थमेव कथित विशेषाथोधुनोच्यते ।
सद्यो जातसमुद्भू ताश्शक्तय पञ्चधा स्मृता ॥ २५ ॥
विमानगतिवैचित्र्यक्रिया स्यादेभिरेव हि ॥ इत्यादि ।
- विभक्तिलोप आर्षं ।
७४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
मतान्तर विचारार्थ इस सूत्र में चार पद कहे, विमान की विचित्र गतियों के करने वाली
शक्तिया सद्योजातात्मकयन्त्र से उत्पन्न हुई ५ हैं यह नारायण मुनि ने अपने अनुभव से कहा है । उसके
मत के अभिप्राय को इस सूत्र में प्रदर्शित किया है उनमें आदिम पद से शक्तिस्वरूप दिखलाया,
संख्या से भेद दूसरे पद से कहा, मतान्तर—अन्य मत का प्रकाश तीसरे पद से, प्रवर्तकमुनि चतुर्थ
पद से दिखलाया, इस प्रकार पदार्थ कहे विशेषार्थ अब कहा जाता है, सद्योजातयन्त्र से उत्पन्न हुई पांच
प्रकार की शक्तिया कही हैं इन से विमान की विचित्र गति क्रियाएं होवें ॥ २०-२५ ॥
तदुक्तं शक्तिसर्वस्वे—वह कहा है शक्तिसर्वस्व ग्रन्थ में—
चालनगालनपञ्जरस्फोरणवक्रापसर्पणाञ्चेति ।
गतिवैचित्र्यविधान यानस्योक्ता महर्षिभिशास्त्रे ॥२६॥ इत्यादि
चालन, गालन, पञ्जरप्रेरण, वक्रापसर्पण, विचित्रगति करना ये पाच बातें विमान की महर्षियों
ने कही हैं
चित्रिण्येवेति स्फोटायनः ॥ अ० ४, सू० ३ ॥
बो० वृ०
स्फोटायनमतं वक्तु सूत्रोय परिकीर्तित ।
तदर्थबोधकपदान्युक्तान्यस्मिन् चतु ❋ क्रमात् ॥२७॥
तत्रादिमपदाच्छक्तिनिर्णयस्सम्प्रदर्शित ।
द्वितीयपदतश्शक्तेर्निर्धारणमुदाहृतम् ॥२८॥
तथेत्थम्भावमुक्त स्यात् तृतीयपदत क्रमात् ।
मतप्रवर्तकमुनिश्चतुर्थपदत स्मृत ॥२६॥
एष पदार्थ कथितो विशेषार्थ प्रकीर्त्यते ।
विमानगतिवैचित्र्यकार्यनिर्वहणक्रिया ॥३०॥
एकया चित्रिणीशक्त्या भवत्येवेति विनिर्णय ।
यह सूत्र स्फोटायन के मत को कहने के लिये कहा गया है, उसके बोधक पद क्रम से चार
कहे हैं। उनमें आदिम पद से शक्ति का निर्णय दिखलाया दूसरे पद से शक्ति का निर्धारण बतलाया,
तीसरे पद से इत्थम्भाव कहा गया, चौथे पद से मतप्रवर्तक मुनि कहा है। इस प्रकार पदार्थ कह दिया
विशेषार्थ कहा जाता है, विमान की विचित्र गति कार्य करने वाली क्रिया केवल एक चित्रिणी शक्ति से
होती है ऐसा निश्चय है ॥ २७–३०॥
तदुक्तं शक्तिसर्वस्वे—वह कहा है शक्तिसर्वस्व में—
वैमानिकगतिवैचित्र्याद्विद्वात्रिंशत्क्रियायोगे ।
एकैव चित्रिणीशक्त्यलमिति शास्त्रे विनिर्णित भवति ।
इत्यनुभवतश्शास्त्राच्च मन्यते स्फोटायनाचार्य. ॥६१॥ इत्यादि ॥
❋ विभक्ते लुक् आर्षं ।
शक्त्यधिकरणम् ] [ ७५
विमान की विचित्र गति आदि ३२ क्रियाओं के सम्बन्ध में एक ही चित्रिणी शक्ति पर्याप्त है
यह शास्त्र में निर्णय है । इस प्रकार अनुभव से और शास्त्र से स्फोटायन आचार्य मानता है ॥३१॥
क्रियासारेपि-क्रियासार में भी कहा है—
चित्रिणी नामिका विद्युच्छक्तिस्सप्तदशात्मिका ।
एकैव यानद्वात्रिंशत्कार्यनिर्वहणक्षमा ॥३२॥ इत्यादि ॥
चित्रिणी नामक विद्युत्-शक्ति १७ रूप में है या १७ वीं है वह अकेली ही विमान के ३२
कार्यों के निर्वाहार्थ समर्थ है ॥३२॥
तदन्तर्भावात् सप्तैवेति भरद्वाजः ॥ अ० ४, सू० ४॥
बो० वृ०
उक्त्वा सूत्रद्वयैरेव † मतान्तरमत परम् ।
स्वसिद्धान्तद्योतनार्थं सूत्रोयं परिकीर्तित ॥३३॥
तदर्थबोधकपदान्यस्मिन् पञ्च भवन्ति हि ।
तत्रादिमपदादन्तर्भावित्व सप्त शक्तिषु ॥३४॥
पूर्वसूत्रोक्तशक्तीना सम्यक् सन्दर्शित भवेत् ।
तथैव सप्तशक्तीना प्रधानत्वं द्वितीयत ॥३५॥
उक्तार्थनिर्धारणं तु तृतीयपदत कृत ‡ ।
चतुर्थपदतस्सम्यगित्थम्भाव प्रदर्शित ॥३६॥
तथैव पञ्चमपदाद् भरद्वाजमहामुनिम् ।
स्वसिद्धान्तप्रवक्तार सूचित ❄ भवति क्रमात् ॥३७॥
पदार्थमेव कथित विशेपार्थोधुनोच्यते ।
सद्योजातसमुद्भूतपञ्चशक्तिषु शास्त्रत ॥३८॥
प्रधानत्वेन सम्प्रोक्ता पञ्चराशक्तिरेव हि ।
अग्नेस्सकाशादुत्पत्तिस्स्फुलिङ्गाना यथा भवेत् ॥३६॥
तथैव चालनादीना पञ्चराशक्तितस्स्मृत ।
दो सूत्रों से अन्यों के मत को कहकर इससे आगे अपना सिद्धान्त प्रकट करने को यह सूत्र
कहा है, उसके अर्थबोधक पद इसमें पांच हैं उनमें आदिम पद से अन्तर्भाव सात शक्तियों में ही होता
है । पूर्व सूत्र में कही शक्तियों का भलीभांति ज्ञान या ज्ञापन हो अतः दूसरे पद से उन ७ शक्तियों की
प्रधानता कही तीसरे पद से कहे अर्थ का निर्धारण और चतुर्थ पद से इत्थम्भाव ऐसा कथन पुन. पांचवें
पद से भरद्वाज मुनि सिद्धान्त प्रवक्ता अपने को सूचित किया किया है । इस प्रकार पदों का अर्थ कह
दिया अब विशेष अर्थ कहा जाता है । सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न पांच शक्तियों में शास्त्रद्वारा प्रधानता
† 'सूत्रद्वये ' वचनव्यत्यय । ‡ लिङ्गव्यत्यय । ❄ व्यत्ययो वा लेखकप्रमादो वा
७६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
से पञ्जराशक्ति ही कही है, अग्नि से स्फुलिङ्ग -चिनगारियों की उत्पत्ति जैसे होवे वैसे ही चालन
आदियों की उत्पत्ति पञ्जराशक्ति से कही है ॥ ३७–३९ ॥
तदुक्तं शक्तिबीजे—वह कहा है शक्तिबीज ग्रन्थ में—
सद्योजातसमुद्भूतपञ्जराशक्तित क्रमात् ।
उद्भवञ्चालनादीनामुक्त तच्छास्त्रवित्तमै ॥४०॥
सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न हुई पञ्जराशक्ति से क्रमशः चालनादि शक्तियों की उत्पत्ति उस
शास्त्र के विद्वानों ने कही है ॥४०॥
सद्योजातात् समुत्पन्नपञ्जराशक्तित क्रमात् ॥४१॥
चालनाद्यास्समुद्भूता क्रमाच्चत्वारिशक्तय ।
इति शक्तिकौस्तुभे ।
सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न पञ्जराशक्ति से क्रम से चालन आदि प्रकट हुईं क्रम से चार
शक्तियां हैं । यह शक्ति-कौस्तुभ ग्रन्थ में कहा है ॥४१॥
एतेन पञ्जरोद्भूतशक्तयश्चालनादय ॥४२॥
तदंशत्वात् तत्स्वरूपा एवेत्युक्तास्स्फुलिङ्गवत् ।
तस्मात् प्रधानत्वमपि तासामत्र प्रदर्शितम् ॥४३॥
सा पञ्जरा चित्रिणी च पूर्वोक्तसप्तशक्तिषु ।
अन्तर्भावात् प्रधानत्वेनोक्ता एव स्वभावत ॥४४॥
यतस्तयो प्रधानत्व सप्तशक्तिषु वर्णितम् ।
ततस्समञ्जसमिति मतद्वयमपि स्मृतम् ॥४५॥
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाहे पूर्वोक्तसप्तशक्तिषु ।
एकैकशक्तेरेवालमिति केचिद् वदन्ति हि ॥४६॥
इस कारण पञ्जराशक्ति से प्रकट हुई चालना आदि शक्तियां उसके अंश होने से तत्स्वरूप
ही स्फुलिङ्ग जैसी कही हैं । अत उनकी प्रधानता भी यहां दिखलाई है, उन पूर्वोक्त ७ शक्तियों में यह
पञ्जरा और चित्रिणी अन्तर्भूत होने से प्रधानता से स्वभावतः कही हैं, जिसे सात शक्तियों में प्रधान
वर्णित किया है इससे दोनों मत ठीक है यह कहा है, ३२ कार्य निर्वाह में पूर्वोक्त ७ शक्तियों में एक-
एक शक्ति ही पर्याप्त है ऐसा कुछ कहते हैं ॥ ४२–४६ ॥
तदसङ्गतमेव स्यात् कार्यभेदप्रदर्शनात् ।
विमानस्योध्वंगमनमुद्गमाशक्तितस्मृतम् ॥४७॥
इत्यारभ्य क्रमान्मूलशक्तयैत्यन्त स्वभावत ।
पूर्वोक्तसप्तशक्तीना कार्यनिर्वहणक्रम. ॥४८॥
पृथक् पृथक् क्रियासारे निर्णितत्वात् प्रमाणत ।
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाह कथं स्यादेकशक्तित. ॥४९॥
यन्त्राधिकरणम् ] [ ७७
एकशक्त्या सर्वकार्यनिर्वाहस्सर्वथा न हि ।
प्रमादाद् यदि कुर्वीत तदनर्थाय केवलम् ॥५०॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूर्वोक्तास्सप्त शक्तयः ।
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाहे संयोज्या इति निर्णयः ॥५१॥
कार्यभेद प्रदर्शन से वह असङ्गत ही है, विमान का ऊपर गमन उद्गमा शक्ति से कहा है
इस कथनके आरम्भ से मूलशक्ति के लिये अत्यन्त स्वभाव से पूर्वोक्त ७ शक्तियों का कार्यनिर्वाह क्रम
पृथक् पृथक् क्रियासार ग्रन्थ में प्रमाण से निर्णय करने से ३२ कार्य निर्वाह कसे एक शक्ति से हो, एक
शक्ति से कार्यनिर्वाह सर्वथा नहीं हो सकता, प्रमाद् से यदि करे तो केवल अनर्थ के लिये हो, अतः
सब प्रयत्न से पूर्वोक्त ७ शक्तिया ३२ कार्य निर्वाह में लगाने योग्य हैं ॥ ४७–५१ ॥
अथ यन्त्राधिकरणम्
अब यन्त्रों का अधिकरण प्रस्तुत है ।
तथोपयन्त्राणि ॥ अ० ५ सू० १ ॥
बो० वृ०
यथोक्ताश्शक्तयः पूर्वसूत्रे यानक्रियाविधौ ।
तथैव यानोपयन्त्राण्यस्मिन् सम्यग् विविच्यते ॥ ५२ ॥
तदर्थबोधकपद्द्वयमत्र निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् रीतिवाचकस्सम्प्रदर्शितः ॥ ५३ ॥
द्वितीयपदतो यानाङ्गोपयन्त्राणि च क्रमात् ।
पदार्थमेव कथितं विशेषाथौधुनोच्यते ॥ ५४ ॥
याभिर्विमानो द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाहको भवेत् ।
तच्छक्तयः क्रमात् पूर्वसूत्रे सम्यक् प्रदर्शिताः ॥ ५५ ॥
तत्तत्कार्योपकरणा ऽङ्गोपयन्त्रान्यथाक्रमम् ।
द्वात्रिंशदिति यानस्य सूत्रे ऽस्मिन् सम्प्रगृह्यते ॥ ५६ ॥
विमान क्रियाविधि के निमित्त पूर्वसूत्र में जैसे शक्तियां कही हैं वैसे ही विमानयान के उप-
यन्त्रों का इस सूत्र में भली प्रकार विवेचन किया जाता है । उसके अर्थबोधक दो पद यहां निरूपित किए
हैं, उनमें आदिपद रीतिवाचक कहा है दूसरे पद से विमान के अङ्गोपयन्त्र क्रम से कहे हैं । इस प्रकार
पदों का अर्थ कह दिया अब विशेष अर्थ कहा जाता है। जिन शक्तियों से विमान ३२ कार्यों का निर्वा-
हक होवे—होता है वे शक्तियां पूर्वसूत्र में भली प्रकार दिखलाई गई, उन कार्यों के उपकरण अङ्गोपयन्त्र
विमान के यथाक्रम ३२ इस सूत्र में दिखलाए जाते हैं ॥ ५२–५६ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह कथन क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
विमानाङ्गोपयन्त्राणि द्वात्रिंशदिति शास्त्रतः ।
यथोक्तं यन्त्रसर्वस्वे भरद्वाजेन धीमता ॥ ५७ ॥
७८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तथैवात्र प्रवक्ष्यामि सङ्ग्रहेण यथामति ।
यन्त्रं विश्वक्रियादर्शशक्त्याकर्षणयन्त्रकम् ॥ ५८ ॥
परिवेषक्रियायन्त्रं प्रोक्तं पश्चात् तथैव हि ।
अङ्गोपसंहारकाख्ययन्त्रं सर्वाङ्गसुन्दरम् ॥ ५९ ॥
पश्चाद् विस्तृतक्रियाख्यं ततो वैरूप्यदर्पणम् ।
पद्मचक्रमुखं नाम यन्त्रं पश्चाद् विचित्रकम् ॥ ६० ॥
कुण्टिणीशक्तियन्त्रं च तथा पुष्पिणिकं स्मृतम् ।
तथैव पिञ्जुलादर्शयन्त्रं पश्चान्मनोहरम् ॥ ६१ ॥
नालपञ्चकयन्त्रं च गुहागर्भाभिधं तथा ।
तमोयन्त्रं पञ्चवातस्कन्धनालमतः परम् ॥ ६२ ॥
विमान के अङ्गोपयन्त्र ३२ शास्त्र से जैसे 'यन्त्रसर्वस्व' में बुद्धिमान् भरद्वाज मुनि ने कहे हैं
वैसे ही यहां भी संक्षेप में, यथामति मैं कहूंगा, यन्त्र में विश्वक्रियादर्श, शक्त्याकर्षण यन्त्र, परिवेष-
क्रियायन्त्र, अङ्गोपसंहारयन्त्र, सर्वाङ्गसुन्दर, विस्तृतक्रियानामक यन्त्र फिर वैरूप्यदर्पण, पद्मचक्रमुखयन्त्र,
फिर विचित्रक, कुण्टिणीशक्तियन्त्र, तथा पुष्पिणिक यन्त्र कहा है, पिञ्जुलादर्शयन्त्र पश्चात् मनोहर, नाल-
पञ्चकयन्त्र, गुहागर्भानामक, तमोयन्त्र, पञ्चवातस्कन्धनाल ॥ ५७–६२ ॥
पश्चाद् वातस्कन्धनालकीलकं यन्त्रमीरितम् ॥ ६३ ॥
ततो विद्युद्यन्त्रमतश्शब्दकेन्द्रमुखाभिधम् ।
ततो विद्युद्द्वादशकयन्त्रं प्रोक्तं ततः परम् ॥ ६४ ॥
प्राणकुण्डलिनीनामयन्त्रं शक्त्युद्गमं तथा ।
वक्रप्रसारणं तद्वच्छक्तिपञ्जरकीलकम् ॥ ६५ ॥
शिरःकीलकयन्त्रं च शब्दाकर्षणयन्त्रकम् ।
पटप्रसारणं नाम यन्त्रं तद्वद् दिशाम्पतिः ॥ ६६ ॥
पट्टिकाभ्रकयन्त्रं च सूर्यशक्त्यपकर्षणम् ।
तथापस्मारधूमप्रसारणाख्यमतः परम् ॥ ६७ ॥
तथा स्तम्भनयन्त्रं चोक्तं पश्चात् तथैव हि ।
वैश्वानरयन्त्रमिति द्वात्रिंशति क्रमात् ॥ ६८ ॥
विमानस्याङ्गोपयन्त्राणीति शास्त्रविनिर्णयं ॥ इत्यादि ।
पश्चात् वातस्कन्ध नाल कील यन्त्र कहा है, फिर विद्युद्यन्त्र, शब्दकेन्द्रमुखनामक, फिर
विद्युद्द्वादशक यन्त्र कहा है, फिर प्राणकुण्डलिनीनामक यन्त्र, शक्त्युद्गमयन्त्र, वक्रप्रसारणयन्त्र, फिर
शक्ति पञ्जरकीलक, शिरःकीलकायन्त्र, शब्दाकर्षणयन्त्र, पटप्रसारणयन्त्र, दिशाम्पतियन्त्र, पट्टिकाभ्रकयन्त्र,
सूर्यशक्त्यपकर्षणयन्त्र, अपस्मारधूमप्रसारण यन्त्र, फिर स्तम्भनयन्त्र कहा, पश्चात् वैश्वानरनाल यन्त्र ।
ये विमान के क्रम से ३२ अङ्गोपयन्त्र हैं यह शास्त्र का निर्णय है ॥ ६३–६८ ॥
यन्त्राधिकरण ] [ ७६
एवमुक्त्वा विमानस्याङ्गोपयन्त्राण्यथाक्रमम् ॥ ६९ ॥
तेषां स्वरूपविज्ञाननिर्णयार्थं यथामति ।
यथा भगवता] प्रोक्तं भरद्वाजेन धीमता ॥ ७० ॥
तथैवात्र ' प्रवक्ष्यामि सप्रहाद् यन्त्रनिर्णयम् ।
इस प्रकार विमान के अङ्गोपयन्त्रों को यथाक्रम कहकर उनके स्वरूप विज्ञान के लिये यथामति
जैसे श्रीमान् बुद्धिमान भरद्वाज ने कहा है वैसे संक्षेप से यन्त्रों का निर्णय कहूंगा ॥ ६९-७० ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है 'यन्त्र सर्वस्व' ग्रन्थ में—
अथाङ्गयन्त्राणि ॥ अ० ७ सू० १ ? ॥
बो० वृ०
यन्त्रसंख्याविमानाङ्गयन्त्राणां शास्त्रवित्तमैः ।
विश्वक्रियाकर्षणादर्शयन्त्रादितः क्रमात् ॥ ७१ ॥
वैश्वानरनालयन्त्रान्तं द्वात्रि (वि ?) शदिति स्मृतम् ।
तेषु विश्वक्रियाकर्षणादर्शयन्त्रं विविच्यते ॥ ७२ ॥
चतुरश्रं वर्त्तुलं वा वितस्त्येकप्रमाणतः ।
पीठं प्रकल्प्य विधिवद् दारुणा दर्पणेन च ॥ ७३ ॥
पश्चात् तन्मध्यप्रदेशे केन्द्रं कुर्याद् यथाविधि ।
सार्द्धाङ्गुलं विहायाथ मध्यकेन्द्राद् यथाक्रमम् ॥ ७४ ॥
ईशान्यादिक्रमेणाष्टदिक्षु रेखान् प्रकल्पयेत् ।
प्रसारणोपसंहारकीलशङ्कून् दृढं यथा ॥ ७५ ॥
क्रमादेकैकरेखायां द्वौ द्वौ संस्थापयेत् ततः ।
विमानाङ्गयन्त्रों की यन्त्रसंख्या ऊंचे शास्त्रवेत्ताओं ने विश्वक्रियाकर्षणादर्पण यन्त्र से आरम्भ
कर वैश्वानर नाल तक ३२ कही हैं। उनमें विश्व क्रियाकर्षणादर्पणयन्त्र का विवेचन किया जाता है।
चौकोण या गोल एक बालिश्त माप से विधिवत् लकड़ी से और दर्पण से बनाकर पश्चात् उसके मध्य-
प्रदेश में यथाविधि केन्द्र करे—बनावे डेढ़ अङ्गुल छोड़कर मध्यकेन्द्र से यथाक्रम ईशान्य आदि क्रम से
आठ दिशाओं में रेखाएं बनावे, खोलने और बन्द करने के पेचों के शङ्कुओं—चाभियों को दृढ़ लगावे
क्रम से एक एक रेखा में दो दो को संस्थापित करे ॥ ७१-७५ ॥
मध्यकेन्द्रपुरोभागाद्रे खान्तं शास्त्रत क्रमात् ॥ ७६ ॥
अन्तरावरणे पञ्चाशंतकीलसमन्वितान् ।
प्रसारणोपसंहारकीलकान्तांन् दृढान् ॥ ७७ ॥
श्रोदुम्बरादिरानागपट्टिकाभिर्विराजितान् ।
अङ्ग·लीना षष्टितमप्रमाणेन प्रकल्पितान् ॥ ७८ ॥
८० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विश्वोदरलोहमयान् दण्डनालान् यथाक्रमम् ।
पूर्वोक्तदिक्प्रदर्शनरेखासंस्थितशक्तिषु ॥ ७९ ॥
सन्धार्यावरणं कुर्यात् तस्योपरि तत परम् ।
मूले मध्ये तथा चास्ये दण्डनालान्तरस्य हि ॥ ८० ॥
मध्य केन्द्र के सामने वाले भाग से लेकर रेखा तक शास्त्र के क्रम से अन्दर के आवरण में
पांच घूमने वाली कीलों से युक्त खोलने बन्द करने की कीलों के अन्तर्गत और औदुम्बर—ताम्बे, आर—
मुण्ड लोहे, आर—पित्तल, नाग-सीसे की पट्टिकाओं से युक्त ६ अङ्गुल माप बनाए हुए विश्वोदर लोहे
के बने दण्ड नालों को यथाक्रम पूर्व कही दिशा को दिखाने वाली रेखाओं में स्थित शक्तियों में लगा
कर उसके ऊपर आवरण करे फिर दण्डनाल के भीतरी भाग के मूल में तथा मध्य में—॥ ७६--८० ॥
रुचिर भास्कर विश्वक्रियादर्शनदर्पणम् ।
सन्धारयेद् दृढ तत्तत्कीलकैशशास्त्रमानत ॥ ८१ ॥
सकीलविद्युद्यन्त्र तु दण्डमूले नियोजयेत् ।
आरारनालसङ्क्लृप्तकीलसमावर्तक पुन ॥ ८२ ॥
कृत्वा समन्ताद् यन्त्रस्य विमाने स्थापयेद् दृढम् ।
कान्तकाचमणीन् पश्चान्मूले मध्ये तथोर्ध्वके ॥ ८३ ॥
दण्डान्तरे वा पार्श्वे वा तत्तत्स्थाने नियोजयेत् ।
किरणप्रकाशाकर्षणदर्पण मूलकेन्द्रके ॥ ८४ ॥
वार्तुल्यं चषकाकार दृढ सस्थापयेत् तत ।
रूपाकर्षणयन्त्र तु तत्पश्चाद्भागतो न्यसेत् ॥ ८५ ॥
सुन्दर तथा प्रकाश करने वाले विश्वक्रियादर्शन दर्पण को उन उन कीलों से शास्त्रमान से
दृढ़ रूप में लगावे । दण्ड के मूल में कीलसहित विद्युद्यन्त्र लगावे । आरार ? आर—मुण्ड लोहे, पुन
आर—पित्तल की नाल से सम्बद्ध घूमने वाली कील को बना कर यन्त्र के सब ओर विमान में स्थापित
कर दे । पश्चात्-क्रान्त काच की बनी मणियों को मूल में मध्य में तथा ऊपरले भाग में दण्ड के अन्दर
या पार्श्व में या उस उस स्थान में नियुक्त कर दे । किरण-प्रकाशाकर्षण दर्पण गोल पात्र जैसे को मूल
केन्द्र में संस्थापित कर दे फिर रूपाकर्षण यन्त्र को तो उसके पिछले भाग में रखे ॥ ८१--८५ ॥
इति विश्वक्रियादर्शनयन्त्रमुक्त समासतः ।
तत्प्रयोग प्रवक्ष्यामि सग्रहेण यथामति ॥ ८६ ॥
दण्ड प्रसारयेदादौ कीलीचालनतस्तथा ।
मूले तस्य क्रियादर्शदर्पण योजयेद् दृढम् ॥ ८७ ॥
तन्मूले पारदद्राव मध्यकेन्द्रसम यथा ।
कीलकात् सन्यसेत् तस्मिन् मणिमेक नियोजयेत् ॥८८॥
दर्पणाधिकरण ] [ ८१
रन्ध्रतन्त्रीन् द्रावशुद्धान् किरणाकर्षकान् तत ।
एतन्मणिमुखात् पूर्वमण्यन्त योजयेत् क्रमात् ॥ ८६ ॥
पुनस्तद्दण्डान्तरीयमध्यभागे दृढ यथा ।
योजयेद् भास्करादर्शं सार्षपे(फे?)न सुशोधितम् ॥६०॥
इस प्रकार विश्वक्रियादर्श यन्त्र संक्षेप से कह दिया, उसका प्रयोग संक्षेप से यथामति
कहूँगा । प्रथम खोल चला कर दण्ड-नालदण्ड को खोल दे उसके मुख में क्रियादर्शदर्पण लगा दे, उसके
मूल में पारे का द्राव मध्य केन्द्र के समान की-पेंच से स्थापित कर दे, उसमें एक मणि नियुक्त कर दे,
द्राव से शुद्ध किरणाकर्षक सिद्ध तारों को इस मणिमुख से पूर्व मणि के अन्त तक युक्त कर दे फिर
उस दण्ड के भीतरी मध्य भाग में--सरसों के तेल से शोधित भास्कर दर्पण-सूर्यकान्त को
लगावे ॥ ८६-६० ॥
पूर्ववत्तन्मूलभागे विन्यसेद् रुचिकद्रवम् ।
तस्मिन्नेकमणि कीलतन्त्रीयोगात् सुनिक्षिपेत् ॥ ६१ ॥
तथैव रुचिकादर्शं तन्मूले स्थापयेद् दृढम् ।
सूर्यस्य किरणाकर्षणदर्पणं मूलकेन्द्रके ॥ ६२ ॥
चषकाकारतस्सम्यग्वातुलं ह्य योजयेत् तथा ।
रूपाकर्षणयन्त्र तत्पश्चाद्भागे प्रकल्पयेत् ॥ ६३ ॥
[L18
).
- Line 33:
पश्चात् पारद्रवे सम्यक् तच्छक्ति सम्प्रवेशयेत् ॥ १०८ ॥
Noticeतच्छक्ति(no bindu).
- Double check Line 6 word
रुचिद्रावक-सञ्जो...:- Wait, is it
सञ्जोच्चार? - Let's re-examine that word:
रुचिद्रावक-सञ्जोच्चार के द्रावक की मणि के मूल से
Wait, in line 6:सञ्जो...
Wait, could it beसञ्जोच्चार?
Wait, let's look at the letters:
स
ञ्जो
च्चाorवा?
Wait! In line 15:विधिवच्छक्तिद्वयमत-> look atच्छ.
In line 6: look at the glyph afterञ्जो:
It's aव? No, wait! Is itसञ्जोच्चारorसञ्जोचार?
Wait, look atच्चार:चhas a loop? No,चhas a flat top, curved bottom.
Wait, look at the glyph: does it look likeच्चार?
Wait, could it be `सञ्जो
- Wait, is it
दर्पणशधिकरण ] [ ८३
मणिप्रेरिततच्छक्ति द्रवशक्तिं तथैव च ।
समाहृत्य विशेषेण रुचिकद्रवसंस्थिते ॥ १०६ ॥
मणौ सन्धारयेत् पश्चात् तच्छक्तिं पूर्ववत् क्रमात् ।
रुचिकादर्शमूलस्थरेखाकेन्द्रे नियोजयेत् ॥ ११० ॥
पश्चात् उन दोनों शक्तियों को पकड़ कर पारे के द्राव में नियुक्त कर दे, फिर दिशा देश केन्द्र
तक स्थित वस्तुओं के बिचार से—प्रभाव से वह द्रावक नाना चित्ररंग वाली प्रभा से युक्त हो जाता है,
सूर्यकिरणशक्ति को खींच कर पारे के द्राव वाली मणि में १५ लिक्ष (डिग्री) माप में यथाविधि युक्त
कर दे, पश्चात् पारे के द्राव में सम्यक् उस शक्ति को प्रविष्ट कर दे, मणिद्वारा प्रेरित उस शक्ति को तथा
द्रवशक्ति को लेकर विशेषत सञ्जीक्षार द्राव में स्थित मणि में जोड़ दे, पश्चात् उस शक्ति को पूर्व की
भांति सञ्जीक्षार द्रावदर्पण के मूल में स्थित रेखा केन्द्र में नियुक्त करे ॥ १०६-११० ॥
तच्छक्तिं रुचिकादर्शस्स्वस्मिन् सन्धारयेत् (सन्धार्यते ? ) ततः ।
मुखदर्पणमारभ्य रुचिकान्तं यथाविधि ॥ १११ ॥
लक्ष्यं कृत्वा सप्ततिमाद्दर्शनालात् क्रमं यथा ।
तथैव रूपाकर्षणयन्त्रकेन्द्रान्तमन्तरे ॥ ११२ ॥
लक्ष्यं प्रकल्पयेत् सम्यग् रुचिकादर्शकेन्द्रतः ।
पश्चात् पारद्रवमणिशक्ती संयोजयेत् समम् ॥ ११३ ॥
विश्वक्रियादर्शवामकेन्द्रलक्ष्यात् प्रयत्नतः ।
दिग्देशरेखाकेन्द्रान्तं गणितोक्तेन वर्त्मना ॥ ११४ ॥
पश्चात् सच्याप्य तच्छक्ती तत्रत्याना स्फुटं यथा ।
कार्यकारणकर्त्तृ स्वरूपमाकृष्य वेगतः ॥ ११५ ॥
उक्त शक्ति को रुचिक आदर्श अपने में धारण कर लेता है, मुखदर्पण को आरम्भ कर रुचिक
दर्पण पर्यन्त यथाविधि लक्ष्य करके ७० वें आदर्श नाल से यथाक्रम वैसे ही रूपाकर्षण यन्त्र के केन्द्र तक
अन्दर लक्ष्य को रुचिकादर्श केन्द्र से बनावे, पश्चात् क्रियादर्श वामकेन्द्र के लक्ष्य से प्रयत्न से दिशा देश
रेखा केन्द्र तक गणित शास्त्र में कहे मार्ग से पारे के द्राववाली मणि की दोनों शक्तियों को समान रूप
से युक्त करे पश्चात् वे दोनों शक्तियां व्याप कर वहा के कार्यकारण कर्ता के स्वरूप को वेग से आकर्षित
करके—॥१११-११५ ॥
प्रतिबिम्बाकारयुक्ता सा शक्ति पूर्ववत् पुन ।
परा गतिमवाप्याथ मुखदर्पणकेन्द्रतः ॥ ११६ ॥
आंगम्य रुचिकद्रावमणौ संविशति स्वयम् ।
तामाकृष्यातिवेगेन मणिशक्तिस्स्वभावतः ॥ ११७ ॥
स्वस्मिन् तत्प्रतिबिम्बस्वरूपं सन्धार्यते*स्फुटम् ।
पश्चात् तत्रत्यरुचिकद्रावकस्स्वप्रभावतः ॥ ११८ ॥
- व्यत्ययेन कर्मप्रत्यय कर्तरि ।
८४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रत्यक्षवत् तत्स्वरूपं विशदीक्रियते* स्फुटम् ।
रूपाकर्षणयन्त्रेण पश्चात् तत्प्रतिबिम्बकम् ॥ ११९ ॥
समादाय विशेषेण सप्तमाभ्रकदर्पणात् ।
प्रतिबिम्बस्वरूपेण कर्तृ कार्यादिकान् क्रमात् ॥ १२० ॥
वह प्रतिबिम्बाकारयुक्त शक्ति पूर्व की भांति परा गति को प्राप्त होकर मुखदर्पण केन्द्र से आकर
रुचिक द्राववाली मणि में स्वयं घुस जाती है, उसे मणिशक्ति स्वभावतः अतिवेग से अपने अन्दर
आकर्षित कर प्रकट रूप में प्रतिबिम्बस्वरूप धारण कर लेती है, पश्चात् वहां के रुचिक द्राव स्वप्रभाव से
प्रत्यक्ष जैसा उसके स्वरूप को विशद करता है, पश्चात् रूपाकर्षण यन्त्र से उस प्रतिबिम्ब को सातवें
अभ्रक दर्पण से लेकर प्रतिबिम्बस्वरूप से कर्ता कार्य आदि को क्रम से—॥ ११९-१२० ॥
द्रष्टुं यथावद् योग्यं स्यात् पृथक् पृथक् स्वरूपतः ।
तस्मिन् दृष्ट्वा विमानस्य सम्भवापायसञ्चयान् ॥ १२१ ॥
विज्ञाय शास्त्रतस्सम्यक् सर्वापायनिवारणम् ।
कृत्वा निर्मूलमथ तद्विमानं प्रेषयेत् पुनः ॥ १२२ ॥
एतत्कायोपयोगार्थं वर्णितं शास्त्रतः क्रमात् ।
विश्वक्रियाकर्षणदर्पणयन्त्रं समासतः ॥ १२३ ॥
पृथक् पृथक् स्वरूपतः यथावत् देखने योग्य हो जावे, उसमें विमान के सम्भावनीय–होने
वाले अनिष्ट सञ्चयों को देख कर शास्त्र से सब अनिष्टों के निवारणप्रकार को जान कर पुन निर्मूल कर
उस विमान को चलावे । इस कार्य के उपयोगार्थ शास्त्र से क्रम से विश्वक्रियाकर्षण दर्पण यन्त्र संक्षेप से
वर्णित किया है ॥ १२१-१२३ ॥
- व्यत्ययेन कर्तरि कर्मप्रत्यय ।
पूना फोटो संख्या ४ वस्तुत. हस्तलेख प्रथम रजिस्टर कापी संख्या ६—
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रनिर्णयः—अब शक्त्याकर्षण दर्पणयन्त्र का निर्णय है--
इत्युक्त्वा विश्वक्रियाकर्षणयन्त्रमत परम् ।
शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमत्र प्रचक्षते ॥ १ ॥
इस प्रकार विश्वक्रियाकर्षण यन्त्र को कह कर इससे आगे शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र यहां
कहते हैं ॥ १ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
वियत्तरङ्गपवनरौद्रीसञ्जातशक्तय. ।
ऋतुकालानुसारेण खेटयानविनाशका ॥ २ ॥
तास्समाकृष्य वेगेन नाशयित्वा खमण्डले ।
यत् स्वशक्त्या पालयति व्योमयानान् विशेषत ॥३॥
तच्छक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमिति कीर्त्यते ।
वियत्तरङ्ग - आकाश के स्तरों मण्डलों और पवन रौद्री-वायु की वेग पंक्तियों से उत्पन्न शक्तियां
ऋतुकाल के अनुसार विमान का विनाश करने वाली हैं । उन्हें अपने वेग से खींच कर आकाश में नष्ट
करके जो अपनी शक्ति से विमानों की रक्षा करता है वह शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र कहा जाता है ॥२-३॥
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है--
रौद्रवाताकाशवीचिसञ्जाता विश्वरूपका ॥ ४ ॥
शक्तयस्त्रिविधा प्रोक्ता व्योमयानविनाशका ।
तन्निवृत्य स्वशक्त्या यद्विमानं पालयेत् स्वत ॥ ५ ॥
तच्छक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमित्युदीर्यते ।
यन्त्रस्वभावमुक्त्वैवं सग्रहेण यथामति ॥ ३ ॥
अथ तद्यन्त्ररचनाविधिरत्र निरूप्यते ।
वितस्तित्रयमायामं वितस्तिद्वयविस्तृतम् ॥ ७ ॥
पीठ प्रकल्पयेच्छुद्धक्रौञ्चलोहेन शाश्वत ।
[ ८६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वेगपंक्ति पूर्ण वात और आकाश के तरङ्गरूप मण्डलों से उत्पन्न तीन प्रकार की विषशक्तियां
विमान को नष्ट करने वाली कही हैं। उन्हें अपनी शक्ति से निवृत्त करके जो विमान की स्वत रक्षा करे
वह शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र कहा है । यन्त्र के स्वभाव को इस प्रकार संक्षेप से यथामति कह कर अब
उस यन्त्र की रचनाविधि यहां निरूपित की जाती है । तीन बालिश्त लम्बा दो बालिश्त चौड़ा पीठ शुद्ध
क्रौञ्च लोहे से शास्त्र से बनावे ॥ ४-७ ॥
द्वाविंशदङ्गुलायाममङ्गुलत्रयविस्तृतम् ॥ ८ ॥
सप्तविंशतिमादर्शकृतशङ्कुं यथाविधि ।
तन्मध्ये स्थापयेत् पश्चात् तस्य पूर्वदिशि क्रमात् ॥६॥
केन्द्रत्रय कल्पयित्वा तथैवोत्तरदक्षिणो ।
द्वौ द्वौ केन्द्रौ तथा कुर्यात् समरेखाप्रमाणत ॥ १० ॥
पूर्ववत् पश्चिमे केन्द्रत्रय कुर्यात् यथाविधि ।
प्रदक्षिणावर्तकीलान् स्थापयेत् प्रतिकेन्द्रके ॥ ११ ॥
पश्चात् सप्तोत्तरशततमादर्शकृतान् दृढान् ।
नालान् सन्धारयेत् पश्चात् सतन्त्रीन् द्रवशोधितान् ॥१२॥
१२ अंगुल लम्बे ३ अंगुल चौड़े २७ वें आदर्श से किये हुए शङ्कु को उसके मध्य मे यथा-
विधि स्थापित करके फिर उसकी पूर्वदिशा मे क्रम से तीन केन्द्र बनाकर वैसे ही उत्तर दक्षिण में दो दो
केन्द्र समान रेखा में करे, पूर्व की भांति पश्चिम में तीन केन्द्र यथाविधि करे । प्रत्येक केन्द्र में घूमने
वाली कीलों—पेंचों को स्थापित करे पश्चात् १०७ वें आदर्श से बने दृढ़ नालों को तारोंसहित द्रव से
शोधित लगावे—॥ ८-१२ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलमूलस्थानावधि क्रमात् ।
च (छ ?) षकाकारवत्पञ्चदशागुलप्रमाणत ॥ १३ ॥
पूर्वोक्तदर्पणात् सम्यक्कृतपात्र यथाविधि ।
सस्थापयेच्छङ्कुमुलस्थकीलकोपरि पूर्वके ॥ १४ ॥
वितस्त्यायाम सङ्क्लृप्तं विस्तृते तथाविधम् ।
तथैवादर्शगोलं च छिद्रत्रयसमन्वितम् ॥ १५ ॥
स्थापयेन्मध्यकेन्द्रस्थकीलकोपरि पूर्ववत् ।
द्वादशागुलायाम द्वादशागुलविस्तृतम् ॥ १६ ॥
त्रिकोणकुण्ड्याकारेण कृतमादर्शंत क्रमात् ।
तृतीयकेन्द्रस्थकीलोपरि सस्थापयेत् तथा ॥ १७ ॥
कान्तोदुम्बरसम्मिश्रचक्रद्वय क्रमात् ।
घूमने वाली कील की अवधि तक । पात्र—लोटा गिलास के आकार जैसा १५ अंगुल माप में
पूर्वोक्त दर्पण से सम्यक् यथाविधि बने पात्र को शंकुमूलस्थ पूर्व कील – पेंच के ऊपर बालिश्त भर लम्बा
शक्त्यधिकरण ] [ ८७
चौड़ा सिद्ध वैसा ही आदर्श गोल तीन छिद्रों से युक्त मध्य केन्द्रस्थ पेंच के ऊपर पूर्व की भांति स्थापित
करे, १२ अं'गुल लम्बे १२ अं'गुल चौड़े त्रिकोण भित्ति के आकार में आदर्शदर्पण से बने हुए को तीसरे
केन्द्र में स्थित पेंच के ऊपर संस्थापित कर दे, तथा कान्त—अयस्कान्त लोहे, उदुम्बर अर्थात् तांबे से
मिश्रित दो चक्रदण्ड क्रम से—॥ १३-१७ ॥
पूर्वोक्तादर्शगोलस्य गर्भकेन्द्रे यथाविधि ॥ १८ ॥
सन्धारयेद् यथा सम्यग् भवेत् सङ्घर्षणं तयो ।
पश्चात् तत्पश्चिमे भागे वातपादार्पणात् कृतम् ॥ १९ ॥
पिण्डमेक विस्तृतास्यमित्थं मूलस्थकीलके ।
स्थापयेद् विधिवत् पश्चात् पञ्चस्रोतोमुख दृढम् ॥ २० ॥
शक्तिपादर्पणकृतमन्तःप्रवाहिकं तथा ।
मूल सूक्ष्म तथा मध्ये वर्तुलं कण्ठसूक्ष्मकम् ॥ २१ ॥
विस्तृतास्य मध्यकीलोपरि संस्थापयेन् तत ।
तदत्यन्तकीलके तद्वद् भ्राजस्वद्रावकं न्यसेत् ॥ २२ ॥
अथ तद्दक्षिणपार्श्वस्थितकीलद्वये तत ।
स्थापयेदन्योन्यसंघर्षण चक्रत्रयं क्रमात् ॥ २३ ॥
तयोवोदीचिदिशिस्थकीलद्वयमध्यमे ।
कान्तपाराभ्रसत्वार्कं चुकद्रावकं न्यसेत् ॥ २४ ॥
पश्चान्मणीन् यथाशास्त्रं तत्तत्स्थाने नियोजयेत् ।
पूर्वोक्त आदर्श गोल के गर्भ केन्द्र में यथाविधि लगा दे, जिससे उन दोनों का संघर्षण हो,
पश्चात् उसके पश्चिम भाग में वातपादर्पण से बने विस्तृत मुख वाले एक पिण्ड को मूलस्थ पेंच में विधि-
वत् स्थापित कर दे, पुन पांच स्रोत मुख वाले दृढ़ शक्तिपा दर्पण से बने अन्दर बहने वाले सूक्ष्म मूल
बीच में गोल सूक्ष्म कण्ठ वाले विस्तृत मुख वाले को मध्य कील के ऊपर रख दे, उसी भांति उसके
अन्तिम कील पर भ्राजस्वद्रावक ?—गन्धक द्राव ? डाल दे और उसके दक्षिण में पार्श्वस्थित दो कीलों
में स्थापित करे, पश्चात् अन्योऽन्य—परस्पर तीन संघर्षण चक्र स्थापित करे, वैसे ही उत्तर दिशा में दो
कीलों के मध्य में कान्त—अयस्कान्त या सूर्यकान्त ?, पारा, अभ्रक के सत्व से कञ्चुक द्राव--सांप की
केंचुली के द्राव ? या चुक—चुक—अम्लवेतस के द्राव में डाल दे, फिर मणियों को यथाशास्त्र उस उस
स्थान में नियुक्त करे ।' १८-२४ ॥
उक्तं हि मणिरत्नाकरे—कहा ही मणिरत्नाकर ग्रन्थ में—
भारद्वाजो साङ्खनिकस्सोर्य्यपिङ्गुलको तथा ॥ २५ ॥
शक्तिपञ्जरक पञ्चज्योतिर्गर्भे इति क्रमात् ।
मणय षड्विधा ज्ञेयाश्शक्त्याकर्षणयन्त्रके ॥ २६ ॥ इत्यादि ॥
भारद्वाज, साङ्खनिक, सौर्य्य, पिङ्गुलक, शक्तिपञ्जरक, पञ्चज्योतिर्गर्भ, ये क्रम से छ' प्रकार की
मणियां शक्त्याकर्षण यन्त्र में जाननी चाहिए ॥ २५-२६ ॥
८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्थाननिर्णयमाह स एव — वह ही स्थाननिर्णय कहता है—
शङ्कुमूलस्थच (छ ?) षके न्यसेत् सौम्यमणिं तथा ।
कुड्यात्रिकोणमध्ये तु मणिं साञ्जनिकं न्यसेत् ॥ २७ ॥
विस्तृतास्यादर्शपिण्डे न्यसेत् पैङ्गलकं मणिम् ।
नालदण्डस्थछिद्रे ऽथ भारद्वाजमणिं तथा ॥ २८ ॥
भ्राजस्वद्रावके पञ्चज्योतिर्गर्भमणिं न्यसेत् ।
कान्तपाराभ्रजोर्क चुक्रद्रावे शक्तिपञ्जरमिति ॥ २९ ॥
एवं मणीन् स्थापयित्वा तत्तत्स्थाने यथाविधि ।
आदर्शनालसयुक्तान् सर्वकीलान्तरे क्रमात् ॥ ३० ॥
सौम्य मणि को शंकुमूलस्थ पात्र में डाल दे, साञ्जनिक मणि को भित्तित्रिकोण के मध्य में
रख दे, पैङ्गलक मणि को विस्तृतास्य आदर्श पिण्ड में धर दे, पञ्चज्योतिर्गर्भ मणि को भ्राजस्व द्रावक में
रखदे, शक्तिपञ्जर मणि को कान्त पारे अभ्रक से पूर्ण अम्लवेतस द्राव में रखे । इस प्रकार उस उस स्थान
में यथाविधि मणियों को आदर्शनाल सहित सब कीलों के अन्दर क्रम से स्थापित करके—॥ २७-३० ॥
तन्त्रीन् सन्धारयेत् पश्चान्मूलकेन्द्राद् यथाक्रमम् ।
पश्चात् सञ्चालयेच्चक्रत्रयकीलं यथाविधि ॥ ३१ ॥
तेन दर्पणगोलस्थपिण्डयोरुभयोः क्रमात् ।
परस्परघर्षणं स्यादिति वेगात् स्वभावतः ॥ ३२ ॥
तस्मात् सञ्जायते शक्तिश्शतकक्ष्यौष्णमानतः ।
अथ तच्छक्तिमादाय स्थापयित्वा यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
मणौ साञ्जनिके पश्चात् तन्त्रिभ्यां नालमार्गतः ।
संयोजयेत् ततश्शक्तिस्तन्मणौ लयमेष्यते ॥ ३४ ॥
मणिगर्भस्थशक्त्या सा मिलित्वाथ स्वयं पुनः ।
निस्सरेन्मणिगर्भस्थमुखकेन्द्राद् विशेषतः ॥ ३५ ॥
पश्चात् मूल केन्द्र से यथाक्रम तारों को जोड़ दे, पश्चात् तीन चक्रों की कील को यथाविधि
चलावे उससे दर्पण गोल में स्थित दो पिण्डों का परस्पर घर्षण अति वेग से स्वभाव से हो जावे उससे
सौ दर्जे की उष्णता मान से शक्ति उत्पन्न हो जाती है फिर उस शक्ति को लेकर यथाक्रम स्थापित करके
पश्चात् दो तारों से नालमार्ग द्वारा साञ्जनिक मणि में संयुक्त करे फिर वह शक्ति उस मणि में लय को
प्राप्त हो जाती है । मणिगर्भस्थ शक्ति से वह मिलकर पुनः स्वयं मणिगर्भस्थ मुख केन्द्र से विशेषतः
निकल जावे ॥ ३१-३५ ॥
तमाकृष्य यथाशास्त्रं नालतन्त्रीमुखात् पुनः ।
संयोजयेत् सौरमणौ पूर्ववत् सप्रमाणतः ॥ ३६ ॥
शक्त्यधिकरणम् ] [ ८६
ततस्तन्मणिगर्भस्थशक्त्या सा भिद्यते क्रमात् ।
पञ्चस्रोतस्स्वभावेन व्याप्य तत्रैव तिष्ठति ॥ ३७ ॥
तत्रत्यपञ्चस्रोतस्सु एकस्रोतस्ततः परम् ।
योजयेन्नालतन्त्रीभ्यां भारद्वाजमणौ क्रमात् ॥ ३८ ॥
तथैव पिङ्गलमणावेकस्रोतः प्रमाणतः ।
पञ्चज्योतिर्गर्भमणावेकं तस्तथैव हि ॥ ३९ ॥
एकस्रोतोमणौ शक्तिपञ्जराख्ये नियोजयेत् ।
एवं प्रवेशिताः पञ्च शक्तयो मणिषु स्वतः ॥ ४० ॥
उसे फिर नाल तार मुख से शास्त्रानुसार खींच कर पूर्ववत् सप्रमाण सौर मणि में युक्त करे
फिर वह मणिगर्भस्थ शक्ति से क्रमशः विभक्त हो जाती है पञ्चस्रोत स्वभाव से वहां पर ही व्याप कर
रहती है, वहां पांच स्रोतों में उससे आगे एक स्रोत को दो नालतारों से भारद्वाज मणि में जोड़ दे, उसी
प्रकार एक स्रोत तरङ्ग पिङ्गल मणि में एक स्रोत पञ्चज्योतिर्गर्भमणि में पुन एक स्रोत शक्तिपञ्जर नामक
मणि में नियुक्त कर दे । इस प्रकार मणियों में प्रवेश कराई हुई शक्तिया स्वतः—॥ ३६-४० ॥
एकैकमणिगर्भस्थशक्तिमाकृष्य वेगतः ।
बहिःप्रसारण पश्चात् कुर्वन्ति स्वेन तेजसा ॥ ४१ ॥
मणिसञ्जातशक्तीनां नामान्यत्र यथाक्रमम् ।
यथोक्तमत्रिणा साक्षात्रिरूप्यन्ते तथैव हि ॥ ४२ ॥
राजा मौक्तिकचुण्डीरशून्यगर्भविषोदरा ।
इत्येते मणिसञ्जातशक्तिनामान्यथाक्रमात् ॥ ४३ ॥
एतच्छक्तीस्समाहृत्य भ्राजस्वद्रावके क्रमात् ।
पूर्ववन्नालतन्त्रीभ्यां योजयेत् सप्रमाणतः ॥ ४४ ॥
इमा मणिसमुद्भूतशक्तय स्वेन तेजसा ।
भ्राजस्वद्रावक प्राप्य त्रेधा तत्र प्रभिद्यते* ॥ ४५ ॥
एक एक मणि के गर्भ में स्थित शक्ति को वेग से खींच कर पश्चात् तेज से बांहिर प्रसारित कर
देती है । मणियों में उत्पन्न शक्तियों के नामों को यथाक्रम जैसे अत्रि ने साक्षात् कहे हैं वैसे ही यहां
निरूपित किये जाते हैं । जो कि राजा, मौक्तिक, चुण्डीर, शून्य, गर्भ, विषोदर ये मणियों से उत्पन्न
शक्तियों के नाम यथाक्रम हैं । इन शक्तियों को लेकर क्रम से भ्राजस्व द्रावक ?—गन्धकद्राव ? में पूर्व
की भांति दो नालतारों द्वारा सप्रमाण जोड़ दे । मणि से उत्पन्न ये शक्तियां अपने तेज से भ्राजस्व द्रावक
को प्राप्त कर तीन स्थानों में भिन्न भिन्न हो जाती हैं ॥ ४१--४५ ॥
अत्रिणोक्तप्रकारेण नाम तासा निरूप्यते ।
मार्तण्डरोहिणी भद्रा चेति नामान्यथाक्रमम् ॥ ४६ ॥
- वचनव्यत्ययोऽत्र ।
६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
मार्तण्डशक्तिमाकृष्य पश्चाच्छास्त्रविधानतः ।
संयोजयेत् कान्तपाराभ्रौजकञ्चुकद्रावके ॥ ४७ ॥
तत्रत्यकान्तशक्त्या सा मिलित्वा चञ्चला सती (मति?) ।
अतिवेगात् समुड्डीय गगनाभिमुखी भवेत् ॥ ४८ ॥
तां समाहृत्य विधिवन्नालतन्त्रीमुखात् पुनः ।
विस्तृतास्यादर्शपिण्डगर्भकेन्द्रे नियोजयेत् ॥ ४९ ॥
सूर्यांशून् खतरङ्गस्थशक्तिगर्भान् यथाविधि ।
सच्छिद्रनालदण्डस्योर्ध्वनालात् ततः परम् ॥ ५० ॥
अत्रि के कहे प्रकार से उनका नाम कहा जाता है। मार्तण्ड, रौहिणी, भद्रा ये यथाक्रम हैं।
मार्तण्डशक्ति को खींच कर पश्चात् शास्त्रविधान से कान्त पारा अभ्रक पूर्ण कंचुलीद्राव या अम्बुवेतस-
द्राव में युक्त कर दे, वहां की कान्तशक्ति से मिल कर चञ्चल हुई अतिवेग से उठ कर गगनाभिमुखी हो
जावे। फिर उसे लेकर विधि नालतार के मुख से विस्तृतास्य आदर्श पिण्ड के गर्भकेन्द्र में जोड़ दे,
आकाशतरङ्गों—आकाशमण्डलों में स्थित शक्तिगर्भ वाली सूर्यकिरणों को यथाविधि छिद्रसहित नाल
दण्ड के ऊपर वाले नाल से—॥ ४६-५० ॥
समाहृत्य विशेषेण तत्रैव स्थापयेद् दृढम् ।
पश्चात् तन्नालमूलस्थकेन्द्रमार्गात् प्रमाणतः ॥ ५१ ॥
विस्तृतास्यादर्शपिण्डमुखकेन्द्रे प्रवेशयेत् ।
सूर्यांशुशक्तितत्पिण्डं पश्चात् सव्याप्य वेगत ॥ ५२ ॥
तद्गर्भस्थितमार्तण्डशक्त्या सम्मिलिता स्वयम् ।
आकाशाभिमुखी भूत्वा परिभ्राम्यति वर्तुलम् ॥ ५३ ॥
ता समाहृत्य वेगेन विमानखपथि क्रमात् ।
वियत्तरङ्गप्रवाहमुखमध्ये नियोजयेत् ॥ ५४ ॥
एव कृतेथ तच्छक्तिर्व्योमयानविनाशकम् ।
आकाशवीचीसङ्घातविषशक्ति समूलत ॥ ५५ ॥
आकृष्य पीत्वा वेगेन विमान रक्षति स्वयम् ।
—लेकर विशेषतः वहीं पर दृढ़ स्थापित करे, पश्चात् नालमूल में स्थित केन्द्रमार्ग से प्रमाण
से विस्तृतास्य आदर्श पिण्डमुख के केन्द्र मे प्रविष्ट कर दे, सूर्य किरणशक्ति उस पिण्ड को व्याप्त कर वेग
से उसके गर्भ में स्थित मार्तण्डशक्ति से मिली हुई स्वयं आकाशाभिमुखी होकर गोलरूप में घूमती है
उसे वेग से लेकर विमान के आकाशमार्ग में क्रमशः आकाशतरङ्गों के प्रवाहमुख के मध्य में नियुक्त
करे। ऐसा करने पर वह शक्ति आकाशतरंग से उत्पन्न विमानविनाशक विषशक्ति को समूलतः स्वयं
वेग से सर्वथा खींच पीकर विमान की रक्षा करती है ॥ ५१-५५ ॥
अथ तद्रोहिणीशक्तिं समाहृत्य च पूर्ववत् ॥ ५६ ॥