बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्त्यधिकरणम् ] [ ८६
ततस्तन्मणिगर्भस्थशक्त्या सा भिद्यते क्रमात् ।
पञ्चस्रोतस्स्वभावेन व्याप्य तत्रैव तिष्ठति ॥ ३७ ॥
तत्रत्यपञ्चस्रोतस्सु एकस्रोतस्ततः परम् ।
योजयेन्नालतन्त्रीभ्यां भारद्वाजमणौ क्रमात् ॥ ३८ ॥
तथैव पिङ्गलमणावेकस्रोतः प्रमाणतः ।
पञ्चज्योतिर्गर्भमणावेकं तस्तथैव हि ॥ ३९ ॥
एकस्रोतोमणौ शक्तिपञ्जराख्ये नियोजयेत् ।
एवं प्रवेशिताः पञ्च शक्तयो मणिषु स्वतः ॥ ४० ॥
उसे फिर नाल तार मुख से शास्त्रानुसार खींच कर पूर्ववत् सप्रमाण सौर मणि में युक्त करे
फिर वह मणिगर्भस्थ शक्ति से क्रमशः विभक्त हो जाती है पञ्चस्रोत स्वभाव से वहां पर ही व्याप कर
रहती है, वहां पांच स्रोतों में उससे आगे एक स्रोत को दो नालतारों से भारद्वाज मणि में जोड़ दे, उसी
प्रकार एक स्रोत तरङ्ग पिङ्गल मणि में एक स्रोत पञ्चज्योतिर्गर्भमणि में पुन एक स्रोत शक्तिपञ्जर नामक
मणि में नियुक्त कर दे । इस प्रकार मणियों में प्रवेश कराई हुई शक्तिया स्वतः—॥ ३६-४० ॥
एकैकमणिगर्भस्थशक्तिमाकृष्य वेगतः ।
बहिःप्रसारण पश्चात् कुर्वन्ति स्वेन तेजसा ॥ ४१ ॥
मणिसञ्जातशक्तीनां नामान्यत्र यथाक्रमम् ।
यथोक्तमत्रिणा साक्षात्रिरूप्यन्ते तथैव हि ॥ ४२ ॥
राजा मौक्तिकचुण्डीरशून्यगर्भविषोदरा ।
इत्येते मणिसञ्जातशक्तिनामान्यथाक्रमात् ॥ ४३ ॥
एतच्छक्तीस्समाहृत्य भ्राजस्वद्रावके क्रमात् ।
पूर्ववन्नालतन्त्रीभ्यां योजयेत् सप्रमाणतः ॥ ४४ ॥
इमा मणिसमुद्भूतशक्तय स्वेन तेजसा ।
भ्राजस्वद्रावक प्राप्य त्रेधा तत्र प्रभिद्यते* ॥ ४५ ॥
एक एक मणि के गर्भ में स्थित शक्ति को वेग से खींच कर पश्चात् तेज से बांहिर प्रसारित कर
देती है । मणियों में उत्पन्न शक्तियों के नामों को यथाक्रम जैसे अत्रि ने साक्षात् कहे हैं वैसे ही यहां
निरूपित किये जाते हैं । जो कि राजा, मौक्तिक, चुण्डीर, शून्य, गर्भ, विषोदर ये मणियों से उत्पन्न
शक्तियों के नाम यथाक्रम हैं । इन शक्तियों को लेकर क्रम से भ्राजस्व द्रावक ?—गन्धकद्राव ? में पूर्व
की भांति दो नालतारों द्वारा सप्रमाण जोड़ दे । मणि से उत्पन्न ये शक्तियां अपने तेज से भ्राजस्व द्रावक
को प्राप्त कर तीन स्थानों में भिन्न भिन्न हो जाती हैं ॥ ४१--४५ ॥
अत्रिणोक्तप्रकारेण नाम तासा निरूप्यते ।
मार्तण्डरोहिणी भद्रा चेति नामान्यथाक्रमम् ॥ ४६ ॥
- वचनव्यत्ययोऽत्र ।