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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 368 में से

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पृष्ठ 110

शक्त्यधिकरण ] [ ८७
चौड़ा सिद्ध वैसा ही आदर्श गोल तीन छिद्रों से युक्त मध्य केन्द्रस्थ पेंच के ऊपर पूर्व की भांति स्थापित
करे, १२ अं'गुल लम्बे १२ अं'गुल चौड़े त्रिकोण भित्ति के आकार में आदर्शदर्पण से बने हुए को तीसरे
केन्द्र में स्थित पेंच के ऊपर संस्थापित कर दे, तथा कान्त—अयस्कान्त लोहे, उदुम्बर अर्थात् तांबे से
मिश्रित दो चक्रदण्ड क्रम से—॥ १३-१७ ॥
पूर्वोक्तादर्शगोलस्य गर्भकेन्द्रे यथाविधि ॥ १८ ॥
सन्धारयेद् यथा सम्यग् भवेत् सङ्घर्षणं तयो ।
पश्चात् तत्पश्चिमे भागे वातपादार्पणात् कृतम् ॥ १९ ॥
पिण्डमेक विस्तृतास्यमित्थं मूलस्थकीलके ।
स्थापयेद् विधिवत् पश्चात् पञ्चस्रोतोमुख दृढम् ॥ २० ॥
शक्तिपादर्पणकृतमन्तःप्रवाहिकं तथा ।
मूल सूक्ष्म तथा मध्ये वर्तुलं कण्ठसूक्ष्मकम् ॥ २१ ॥
विस्तृतास्य मध्यकीलोपरि संस्थापयेन् तत ।
तदत्यन्तकीलके तद्वद् भ्राजस्वद्रावकं न्यसेत् ॥ २२ ॥
अथ तद्दक्षिणपार्श्वस्थितकीलद्वये तत ।
स्थापयेदन्योन्यसंघर्षण चक्रत्रयं क्रमात् ॥ २३ ॥
तयोवोदीचिदिशिस्थकीलद्वयमध्यमे ।
कान्तपाराभ्रसत्वार्कं चुकद्रावकं न्यसेत् ॥ २४ ॥
पश्चान्मणीन् यथाशास्त्रं तत्तत्स्थाने नियोजयेत् ।
पूर्वोक्त आदर्श गोल के गर्भ केन्द्र में यथाविधि लगा दे, जिससे उन दोनों का संघर्षण हो,
पश्चात् उसके पश्चिम भाग में वातपादर्पण से बने विस्तृत मुख वाले एक पिण्ड को मूलस्थ पेंच में विधि-
वत् स्थापित कर दे, पुन पांच स्रोत मुख वाले दृढ़ शक्तिपा दर्पण से बने अन्दर बहने वाले सूक्ष्म मूल
बीच में गोल सूक्ष्म कण्ठ वाले विस्तृत मुख वाले को मध्य कील के ऊपर रख दे, उसी भांति उसके
अन्तिम कील पर भ्राजस्वद्रावक ?—गन्धक द्राव ? डाल दे और उसके दक्षिण में पार्श्वस्थित दो कीलों
में स्थापित करे, पश्चात् अन्योऽन्य—परस्पर तीन संघर्षण चक्र स्थापित करे, वैसे ही उत्तर दिशा में दो
कीलों के मध्य में कान्त—अयस्कान्त या सूर्यकान्त ?, पारा, अभ्रक के सत्व से कञ्चुक द्राव--सांप की
केंचुली के द्राव ? या चुक—चुक—अम्लवेतस के द्राव में डाल दे, फिर मणियों को यथाशास्त्र उस उस
स्थान में नियुक्त करे ।' १८-२४ ॥
उक्तं हि मणिरत्नाकरे—कहा ही मणिरत्नाकर ग्रन्थ में—
भारद्वाजो साङ्खनिकस्सोर्य्यपिङ्गुलको तथा ॥ २५ ॥
शक्तिपञ्जरक पञ्चज्योतिर्गर्भे इति क्रमात् ।
मणय षड्विधा ज्ञेयाश्शक्त्याकर्षणयन्त्रके ॥ २६ ॥ इत्यादि ॥
भारद्वाज, साङ्खनिक, सौर्य्य, पिङ्गुलक, शक्तिपञ्जरक, पञ्चज्योतिर्गर्भ, ये क्रम से छ' प्रकार की
मणियां शक्त्याकर्षण यन्त्र में जाननी चाहिए ॥ २५-२६ ॥