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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

व्यासटिकाधिकरण ] [ ५१
निर्यास—गोन्द ६ भाग, रुरुक ? -वनरोहेडा २ भाग, क्षार—यवक्षार-जौखार ३ भाग या सज्जीखार
जौखार सुहागा मिश्रित ३ भाग, ओषधि ?—गेहूं ५ भाग, इङ्गाल—अङ्गारे बुझे कोयले या राख ६ भाग
सृणिकायड ? ५ भाग, शालीतुषाभस्म—शालीधान के तुषों की राख ४ भाग, शिला—दूब घास या
गेरू ? २ भाग, नागमुख ? —नागकेसर का मूल ? २ भाग, वरोलिका ?-कुन्दपुष्प सुहागा ५ भाग, बाल—
सुगन्धवाला २ भाग, रस ? सिन्दूर या शङ्करफ ५ भाग, गुञ्जा—घूंघची ( सफेद घूंघची ? ) २ भाग,
समुद्रफेन ४ भाग। इन्हें मिलाकर पेषणीयन्त्र-चक्की के अन्दर डाल वे अत्यन्त सूक्ष्म कोमल शुद्ध पीस
कर उसमें गोन्द और मृत्तिका ५ भाग, पोली मिट्टी बराबर अंश मिलाकर पाचक—पकानेवाले यन्त्र से
शिवारितैल ? से तीन पहर पकावे. पाक को देखकर अच्छे पके हुए को मूषा बोतल में नालमुख से भर
दे । ऐसा करने

५२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
५३२ कुण्ड क्रम से प्राय. शास्त्र में कुण्डखननकुशल जनों द्वारा कहे गए हैं । सब बीज लोहों
के गलाने में शास्त्रवेत्ताओं ने उनमें कूर्मव्यासटिका को अच्छा कहा है ॥ ७१–७२ ॥
तदुक्त कुण्डकल्पे—वह कहा है कुण्डकल्प में—
सर्वेषां बीजलोहानां गालनार्थं यथाविधि ॥ ७३ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतव्यासटिकास्स्मृता ।
तासां वर्गविभागस्तु सप्तधा वर्णितो (त ?) बुधै ॥७४॥
तेष्वेकेकवर्गस्थितकुण्डाऽष्टसप्तति स्मृता ।
तेषु सप्तमवर्गीयकुण्डेषु यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
नवमी कुण्डिका या स्यात् कूर्मव्यासटिकति हि ।
संबोच्यते बीजलोहगालने शस्त्रवित्तमै ॥ ७६ ॥ इति
सब बीजलोहों के गलाने के लिये यथाविधि ५३२ व्यासटिकाएं-कुण्डिया-भट्टिया कही हैं उनमें वर्ग-
विभाग तो ७ प्रकार का विद्वानों ने कहा है। उनमें एक एक वर्ग में स्थित ७६ कही हैं उनमें ७वें वर्ग के
कुण्डों में यथाक्रम नौवीं कुण्डिका-भट्टी जो है वह कूर्म व्यासटिका बीज लोहों के गलाने में शास्त्रवेत्ताओं
ने कही है ॥ ७४-७६ ॥
नारायणोपि--नारायण ने भी कहा है--
उक्तेषु सर्वकुण्डेषु कूर्मव्यासटिका विना ।
सर्वेषां बीजलोहाना गालनं न कदाचन ॥ ७७ ॥
कूर्मव्यासटिकामेवमुक्त्वा शास्त्रानुसारत ।
तत्स्वरूपपरिज्ञानार्थमाकार सम्प्रचक्षते ॥ ७८ ॥
उक्त सब कुण्डों में कूर्मव्यासटिका के बिना सब बीज लोहों का गलाना कभी नहीं होता।
शास्त्रानुसार इस प्रकार कूर्मव्यासटिका कहकर उसके स्वरूप ज्ञानार्थ आकार को कहते हैं ॥ ७७-७८ ॥
उक्तं हि कुण्डनिर्णये—कुण्डनिर्णय में कहा है—
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा कूर्माकारं यथाविधि ।
वित्तिस्तदशकं कुण्ड कारयेद् भुवि शोभनम् ॥ ७९ ॥
भस्त्रिकास्थापनाय तत्पुरोभागतस्स्फुटम् ।
कूर्माङ्गवत्पञ्चमुखं पीठमेकं प्रकल्पयेत् ॥ ८० ॥
तत्कुण्डस्यान्तराले तु मूषाकुण्डं च वर्त्तुलम् ।
कल्पयित्वा बहिर्भागे कुण्डस्यावरणद्वयम् ॥ ८१ ॥
इङ्गालपूरणार्थाय यथाशास्त्रं प्रकारयेत् ।
पार्श्वयोरुभयोस्तस्य यन्त्रस्थापनं प्रकल्पयेत् ॥ ८२ ॥
सम्यग्गालितलोहाद्वा रससम्पूर्णे सुधीः ।
रचनां कूर्मकुण्डस्य उक्तमेवं महर्षिभिः ॥ ८३ ॥

भस्त्रिकाधिकरण ] [ ५३
एवमुक्त्वा व्यासटिका यथाशास्त्र समासतः ।
अथेदानीं तद्भस्त्रिकाजातिनिर्णयमुच्यते ॥ ८४ ॥
चौरस या गोल कूर्माकार—कछुवे के आकार वाला यथाविधि भूमि में १० बालिश्त सुन्दर
कुण्ड बनावे भस्त्रिकास्थापन के लिये, उसके सामने वाले भाग में कूर्माङ्गी पांच मुख वाला एक पीठ
बनावे, उस कुण्ड के भीतरी भाग में गोलमूषा कुण्ड बना कर कुण्ड के बाहिरी भाग में दो आवरण
बना कर अङ्गारे भरने को यथाशास्त्र करे, उसके दोनों पाश्र्वों में गलाये हुए लोहे के पिघले रस को
भरने के लिए यन्त्रस्थान बनावे । इस प्रकार महर्षियों ने कूर्मकुण्ड की रचना विधि कही । इस प्रकार
यथाशास्त्र संक्षेप से व्यासटिका को कह कर अब उसकी भस्त्रिका जाति का निर्णय कहा जाता
है ॥ ७६—८४ ॥
अथ भस्त्रिकाधिकरणम्
अब भस्त्रिका का अधिकरण कहते हैं ।
स्याद् भस्त्रिकाष्टमे षोडशी ॥ अ० २ सू० ५ (अ० १ । सू० १२ ॥?)
बो० वृ०
कूर्मव्यासटिकामुक्त्वा पूर्वसूत्रे यथाविधि ।
भस्त्रिकानिर्णयार्थं सूत्रोय प्रकीर्तित ॥ ८५ ॥
भस्त्राप्रबोधकपदान्यस्मिन् सूत्रे चतु *क्रमात् ।
तेष्वादिमपदात् तत्र क्रियार्थस्सन्निरूपित ॥ ८६ ॥
द्वितीयपदनो भस्त्रालक्षण सूचित भवेत् ।
तथैव तद्वर्गमख्या तृतीयपदतस्स्मृता ॥ ८७ ॥
एव भस्त्रिकसख्या च चतुर्थपदत क्रमात् ।
पदार्थमेव कथित विशेषाथोधुनोच्यते ॥ ८८ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतभस्त्रा प्रकीर्तिता ।
कूर्मभस्त्रा तेषु मुख्या बीजलोहविगालने ॥ ८९ ॥
पूर्वसूत्र में कूर्म व्यासटिका को यथाविधि कहकर भस्त्रिका निर्णयार्थ यह सूत्र कहा है । इस
सूत्र मे भस्त्राप्रबोधक चार पद हैं, उनमें आदिम पद से क्रियार्थ का निरूपण किया है, दूसरे पद से
भस्त्रा का लक्षण सूचित किया, वैसे ही उसकी वर्गसंख्या तीसरे पद से कही है । इस प्रकार भस्त्रिका
संख्या चौथे पद से बतलाई । इस प्रकार पदों का अर्थ कह दिया, विशेष अर्थ अब कहा जाता है । ५३२
भस्त्रिकाएं कही हैं उनमें कूर्मभस्त्रा बीज लोहों के गलाने में मुख्य है—प्रमुख है ॥ ८५—८९ ॥
तदुक्तं भस्त्रिकानिबन्धने—वह कहा है भस्त्रिकानिबन्धन में—
यावन्त्य कुण्डिका प्रोक्तास्तावन्त्येव हि भस्त्रिका ।
कूर्मभस्त्रा तासु कूर्मकुण्डिकाया प्रकीर्तिता ॥ ९० ॥
जितनी कुण्डिकाएं —व्यासटिकाए कही हैं उतनी ही भस्त्रिकाएं भी हैं । उनमें कूर्म भस्त्रिका
कूर्मकुण्डिका—कूर्म व्यासटिका की कही है ॥ ९० ॥

  • 'चतु' अविभक्तिकनिर्देशश्छान्दस प्रार्षो वा ।

५४ ] [ बृहद्विमानशास्त्र
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है—
सर्वेषां लोहवर्गाणां गालनार्थं विशेषतः ।
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतभस्त्रा इतीरिताः ॥ ६१ ॥
तासां वर्गभेदस्तु अष्टधा सम्प्रकीर्तितः ।
वर्गेष्वष्टमवर्गीयाम्भस्त्रिकासु यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
निर्णिता कूर्मकुण्डस्य षोडशी कूर्मभस्त्रिका । इति
सर्वेषां भस्त्रिकानां तु रचनाक्रमनिर्णयं. ॥ ६३ ॥
भस्त्रिकानिबन्धनाख्यग्रन्थे सम्यङ् निरूपितः ।
तत्सङ्गृह्य यथाकामं किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ ६४ ॥
सब लोहवर्गों के गलाने के अर्थ ५३२ भस्त्रिकाएं कही गई हैं, उनका वर्गभेद तो ८ प्रकार
का कहा है, वर्गों में आठवें वर्ग की भस्त्रिकाओं में यथाक्रम कूर्मकुण्ड—कूर्म व्यासटिका की १६ वीं
कूर्मभस्त्रिका उपयुक्त है। सब भस्त्रिकाओं का रचनाक्रम निर्णय भस्त्रिका निबन्धन नामक ग्रन्थ में
भली प्रकार कहा है वहां से लेकर यथाकाम—जितनी इच्छा है उतना—यहां निरूपित किया जाता
है ॥ ६१–६४ ॥
उक्तं हि भस्त्रिकानिबन्धने—भस्त्रिकानिबन्धन ग्रन्थ में कहा है—
सुवल्कलेश्चर्मपटप्रवर्ग्यैः क्षीरादित्वग्भिर्वरपूगवल्ककैः ।
त्रिनेत्रशुण्डीरसुरङ्गिशालमलीशेणीरमुञ्जाकरघुण्टिकाशणैः ॥६५॥
कृतैस्सुसस्कारजशक्तिमद्भिः पटैश्च पञ्चोत्तरषट्शतैः क्रमात् ।
तथैव लोहैर्वरदारुताम्रविकारकीलैस्सुदृढं यथाविधि ॥ ६६ ॥
प्रकल्पयेच्चित्रविचित्रवक्त्रामुखादिभिशोभितभस्त्रिका क्रमात् ॥ ६७ ॥ इत्यादि
अच्छी वृक्ष की छालों, चर्म—चमड़ों, वस्त्रों, वृक्ष के दूध की परतों, सुपारी वृक्ष की छालों से
त्रिनेत्र ? शुण्डीर ?—हाथीशुण्डी ?, सुरङ्गि—मरोरफली या श्वेत काकमाची ?, शालमली—सिम्बल,
शेणीर ?, मुञ्जाकर--मूंज की जड़, घुण्टिका—कंघी घास, शण से किए सुसंस्कार से उत्पन्न शक्ति वाले
६०५ पटों—वस्त्रों से क्रम से लोहों से अच्छे काष्ठों, ताम्बे के पत्रों कीलों—पेचों से सुदृढ़ चित्र विचित्र
रंग मुख आदि से सुन्दर भस्त्रिका बनावे ॥ ६५–६७ ॥
कूर्मभस्त्रिकालक्षणं तु तत्रैवोक्तम्—कूर्मभस्त्रिका लक्षण तो वहां ही कहा है—
पञ्चाङ्गपञ्चास्यसुपक्षपञ्चकोशैस्तथा कीलकपञ्चकैर्युता ।
विचित्रवर्णैस्सुविराजिता या साकूर्मभस्त्रा इति वर्णिता स्यात् ॥
पांच अङ्गों पाँच मुखों अच्छे पक्ष वाले पांच कोशों से तथा पांच कीलों से युक्त विचित्र वर्णों
से युक्त लोहे की कूर्मभस्त्रिका हो ॥

भस्त्रिकाधिकरण ] [ ५५
लल्लोपि—लल्ल ने भी कहा है—
शास्त्र)क्ताष्टमवर्गीयभस्त्रिकासु यथाक्रमम् ।
या षोडशी भवेद् भस्त्रा कूर्मभस्त्रेति सा स्मृता ॥ ६८ ॥
कूर्मव्यासाटिकायास्तु सैव भस्त्रा न चान्यथा ॥ ६६ ॥ इत्यादि ॥
शास्त्र में कहे आठवें वर्ग वाली भस्त्रिकाओं में यथाक्रम जो १६वीं भस्त्रा है वह कूर्मभस्त्रा
कही है । कूर्मव्यासटिका—कूर्माकार कुण्डी की भस्त्रिका वह ही है अन्य नहीं ॥ ६६ ॥
इति महर्षिभरद्वाजप्रणीते वैमानिकप्रकरणे प्रथमोऽध्यायः ॥?
“इति महर्षि भरद्वाज प्रणीत वैमानिक प्रकरण में प्रथम अध्याय समाप्त हो गया” (यह
कापी करने वाले का वचन प्रामाणिक जचता है )

प्रथम रजिस्टर कापी संख्या २ वस्तुतः कापी संख्या ४—
तृतीयाध्यायप्रारम्भः†
दर्पणाधिकरणम्
दर्पणाधिकरण प्रस्तुत है ।
दर्पणाश्च ॥ अध्याय ३ । सूत्रम् १ ॥
बोधानन्दवृत्तिव्याख्याश्लोकाः ॥
पूर्वाध्याये भस्त्रिकान्तमुक्तंवा सूत्रैर्यथाक्रमम् ।
अथ तृ (द्वि?)तीयाध्यायेस्मिन्नुच्यन्ते यानदर्पणाः ॥ १ ॥
पदद्वयं भवेदस्मिन् सूत्रे दर्पणबोधकम् ।
तत्रादिमपदात् सम्यग्दर्पणास्सूचितास्तथा ॥ २ ॥
तद्विशेषप्रभेदाद्याश्चकारात् सन्निदर्शिताः ।
पदार्थमेवं कथितं विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ ३ ॥
वैमानिकाङ्गमुकुरास्सप्तोक्ताश्शास्त्रत क्रमात् ।
तेषां नामानि वक्ष्यामि लल्लोक्तानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
पूर्वाध्याय में सूत्रों से भस्त्रिकापर्यन्त विषय कहकर अब इस द्वितीय अध्याय में विमान के
दर्पण कहे जाते हैं । इस सूत्र में दो पद दर्पण बोधक हैं । उनमें आदिम पद से सम्यक् दर्पण सूचित
किये हैं, उसके विशेष भेदादि 'च' से दिखलाये हैं । पदों का अर्थ इस प्रकार कह दिया, विशेष अर्थ
अब कहा जाता है । विमान के अङ्ग मुकुर—दर्पण शास्त्र से सात कहे हैं उनके नाम लल्ल के कहे हुए
यथाक्रम कहूंगा ॥ १–४ ॥
उक्तं हि मुकुरकल्पे—मुकुरकल्प में कहा है—
विश्वक्रियादर्पणोथ शक्त्याकर्षणदर्पणः ।
वैरुप्यदर्पणस्तद्वत्कुण्टिणीदर्पणस्तथा ॥ ५ ॥
† पूना फोटो के अनुसार यह कापी २ होने से द्वितीयाध्याय दिया है परन्तु पूर्व की दक्षिण कापी होने से
तृतीयाध्याय है ।

दर्पणाधिकरण ] [ ५७
पिञ्जलादर्पणश्चैव गुहागर्भव्यदर्पणः ।
रौद्रीदर्पण इत्येते(इत्येतत् ?)सप्तोक्ता यानदर्पणा ॥६॥
तेषु विश्वक्रियादर्श इति यत्सम्प्रकीर्तित ।
तद्यानपीठोर्ध्वमुखस्थाने आवर्तनक्रमात् ॥ ७ ॥
प्रपञ्चे प्राणिभिस्सर्वैर्यत्कर्म कृत भवेत् ।
तत्साक्षाद् वीक्षणार्थ यद् यन्त्रेणा स्थापितो भवेत् ॥८॥
विश्वक्रियादर्श इति तमेवाहुर्मनीषिण ।
विश्वक्रियादर्पण, शक्त्याकर्षणदर्पण, वैरुथ्यदर्पण, कुण्टिणीदर्पण, पिञ्जलादर्पण, गुहागर्भदर्पण,
रौद्रीदर्पण ये सात विमान के दर्पण कहे हैं। उनमें विश्वक्रियादर्श जो कहा है उसे विमान के पीठस्थान
के उपस्थान में आवर्तन क्रम से मनुष्यों द्वारा प्रपञ्च—सहार के निमित्त जो जो कार्य किया गया हो उसे
साक्षात् देखने के लिए चालकों की ओर से स्थापित किया जाना चाहिए, इसे विश्वक्रियादर्श मनीषियों
ने कहा है ॥ १-८ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
सत्त्वद्वय शुण्डिलकद्वय च गृध्रास्थिमेक वरपारपञ्चकम् ।
सिङ्घोरणीपादनखद्वय तथा शुद्धाभ्रषट्क वरशोणपञ्चकम् ॥ ९ ॥
मुक्ताष्टक सौम्यमीननेत्रमष्टादशाङ्गारकसत्त्वमेकम् ।
सर्पत्वगञ्जनिकत्रयं तथा मातृणषट्क वरशर्करा दश ॥ १० ॥
क्षाराष्टक नागचतुष्टय च फेनद्वय गारुडवल्कलत्रयम् ।
वैणव्यक सप्त तथा सुशोधित वैराजश्वेतोदुम्बरपञ्चक च ॥ ११ ॥
एतानि संशोध्य यथाविधि क्रमात् सन्तोप्य चञ्चुपुटमूषिकायाम् ।
सम्पूर्य चण्डोदरकुण्डमध्ये विन्यस्य कव्याष्टशतोष्णवेगत ॥ १२ ॥
सङ्गालयित्वा करदर्पणास्ययन्त्रोर्ध्वनालस्य मुले प्रपूरयेत् ।
एव कृते विश्वक्रियारूपदर्पणो भवेत् सुशुद्धो दृढसूक्ष्मरूप ॥१३॥
सत्त्व ?—क्षार—सज्जीखार ? २ भाग, शुण्डिलक ?—हाथीशुण्डावृत्त २ भाग ?, गृध्रास्थि—
गिद्ध की हड्डी १ भाग, वरपार—शुद्धपारा ५ भाग, सिङ्घोरणी ? के पैर का नाखून २ भाग, शुद्ध अभ्रक
६ भाग, वरशोण—अच्छा सिन्दूर ५ भाग, मोती ८ भाग, सौम्यक मीन नेत्र ? १८ भाग, अङ्गार का
सत्त्व १ भाग, सर्पत्वक्—केंचुली ८ भाग, आञ्जनिक—सुरमा ३ भाग, मातृण ?—काणतृण ?—गन्ध-
तृण ? ६ भाग, अच्छा पाषाण चूरा १० भाग, क्षार—सुहागा ८ भाग, नाग—सीसा ४ भाग, फेन—
समुद्रफेन २ भाग, गरुड वल्कल ?—गरुड़शालि का वल्कल—छिलके ? ३ भाग, वैणव्यकं—वंशलोचन ७
भाग, शोधितवैराज श्वेत उदुम्बर का दूध या गोंद या क्षार ? ५ भाग, इन्हें क्रम से यथाविधि शोध कर
तोल कर चञ्चुपुट मूषिका—बोतल में भर कर चण्डोदर कुण्ड के मध्य रख कर ८ दर्जे की उष्णता के
वेग से गला कर बड़े दर्पण के मुख्ययन्त्र के उपरिनाल के मुख में भर दे। ऐसा करने पर विश्वक्रियादर्पण
सुशुद्ध दृढ़ सूक्ष्म हो जावे ॥ ६-१३ ॥

५८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणनिर्णयः—अथ शक्त्याकर्षण दर्पण का निर्णय देते हैं—
उक्त्वा विश्वक्रियादर्शस्वरूपं शास्त्रतःस्फुटम् ।
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणस्सन्निरूप्यते ॥ १४ ॥
विश्वक्रियादर्श—विश्वक्रियादर्पण का स्वरूप शास्त्र से स्फुट कह कर अथ शक्त्याकर्षण दर्पण
निरूपित किया जाता है ॥ १४ ॥
तदुक्तं दर्पणकल्पे—वह कहा है दर्पणकल्प ग्रन्थ में—
आकाशपरिधिकेन्द्रस्थितयानपथि क्रमात् ।
देहनाशकरा या स्युस्त्रिवर्गविषशक्तयः ॥ १५ ॥
आकृष्य तास्स्वशक्त्या यन्नाशयति स्वभावतः ।
तच्छक्त्याकर्षणादर्श इति शास्त्रान्निरूपितः ॥ १६ ॥
आकाश परिधि के केन्द्र में स्थित विमान के मार्ग में क्रम से देह को नष्ट करने वाली जो
तीन विषशक्तियां हैं उन्हें अपनी शक्ति से स्वभावत खींच कर जो नष्ट करता है वह शक्त्याकर्षण-
दर्पण शास्त्र से निरूपित किया गया है ॥ १५-१६ ॥
धुण्ढिनाथोपि—धुण्ढिनाथ ने भी कहा है—
वातार्काश्वन्यशास्त्रे त्रिवर्गा इति वर्णिताः ।
प्रतिवर्गसमुद्भूता यन्तॄणां देहनाशकाः ॥ १७ ॥
द्वाविंशदुत्तरशतसंख्याका विषशक्तयः ।
तास्समाहृत्यनिशेषं स्वशक्त्या यत् पिवेत् क्रमात् ॥ १८॥
तच्छक्त्याकर्षणादर्श इति नाम्ना प्रकीर्तितः ॥ १६ ॥
वात सूर्यकिरण अग्नि ये तीन वर्ग शास्त्र में कहे हैं । प्रतिवर्ग में उठे हुए चालक यात्रियों के
देह के नाशक हैं । १२२ संख्या वाली विष शक्तियां हैं उन्हें अपनी शक्ति से लेकर सर्वथा क्रम से जिससे
पी लेता है इससे वह शक्त्याकर्षण दर्पण नाम से कहा गया है ॥ १७-१६ ॥
पराङ्कुशोपि—पराङ्कुश में भी कहा है—
आकाशपरिधिकेन्द्रे ऽप्वाताकीश्वग्निसम्भवाः ।
द्वाविंशदुत्तरशतसंख्याका विषशक्तयः ॥ २० ॥
विमानपथसन्मध्यन्तं प्रवहन्ति विशेषतः ।
विमानचारिणां देहमारका इति तास्स्मृताः ॥ २१ ॥
उक्तस्स्यात् तद्विनाशार्थं शक्त्याकर्षणदर्पण इति ।
एवमुक्त्वा तस्य नामनिर्णयंशास्त्रतस्स्फुटम् ॥ २२ ॥
मथैव तत्पाकविधिः किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ २३ ॥
† केन्द्रे ऽपु वातः=केन्द्रे ऽप्वातः—पुरातनसन्धिः ।

नेत्रान्तमगलिततद्रस? Wait, let's look at the letter: ने त्रा न्त म ग लि त त द्र स? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look at the letter: नेत्रान्तमगलिततद्रस? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look at the letter: नेत्रान्तमगलिततद्रस? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look at the letter: नेत्रान्तमगलिततद्रस? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look

६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सप्तविंशद्विकाराणि शास्त्रोक्तानि यथाक्रमम् ।
तत्स्वरूपप्रबोधार्थं संग्रहेण निरूप्यते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार यथाशास्त्र शक्त्याकर्षण दर्पण कहकर वैरूप्यदर्पण अब यहां यथामति कहूँगा। अपने
विमान को रोकने को परविमान से क्रोध भरे भय मूर्छा आदि नाना उपायों में कुशल शत्रुजन आ गये हों
उनकी विस्मृति को जो देता है वह वैराजित दर्पण—वैरूप्यदर्पण विद्वानों द्वारा कहा गया है। शास्त्रोक्त
२७ विकार यथाक्रम हैं उनके स्वरूप प्रबोधनार्थ संक्षेप से निरूपित किया जाता है ॥ २६--३२ ॥
तदुक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डे—यह कहा है सम्मोहनक्रियाकाण्ड में—
अग्निवाताम्ब्वशनिविद्युद्धूमसागरपर्वता ।
सर्पवृश्चिकभल्लूकसिंहव्याघ्रादयस्तथा ॥ ३३ ॥
भूतप्रेतपिशाचाश्च पक्षिणोति* भयङ्करा ।
इति सप्तदशोक्तानि विकाराणि यथाक्रमम् ॥ ३४ ॥
अग्नि, वायु, जल, अशनि—पतनशील विद्युत्, विद्युत्--चमकने वाली विद्युत्, धूम, सागर,
पर्वत, सर्प, वृश्चिक, रीछ, सिंह, बाघ आदि तथा भूत, प्रेत, पिशाच‡ पक्षी ये १७ विकार यथाक्रम
कहे हैं ॥ ३३-३४ ॥
एवमुक्तवा दर्पणस्य गुणनामादय क्रमात् ।
इदानीं तत्पाकविधिसंग्रहेण निरूप्यते ॥ ३५ ॥
इस प्रकार दर्पण के गुण नाम आदि क्रम से कह कर अब उसकी पकाने की विधि संक्षेप से
निरूपित की जाती है ॥ ३५ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे--यह कहा है दर्पण प्रकरण में--
शल्यक्षारं पञ्चश्विङ्गात्रय च लाक्षात्रय सोमकान्तशरात्रय-
राजकुरण्टिकाद्वयमिङ्गालसाराष्टक टङ्कणत्रयम् ॥ ३६ ॥
नखाष्टकवालुकसप्तक च मातृणणष्टक रविचुम्बकद्वयम् ।
पूरत्रय पारदपञ्चविंशक तालत्रय रोप्यचतुष्टय च ॥ ३७ ॥
क्रव्यादषट्क गरदाष्टक च विष्टत्रय कन्दचतुष्टय च ।
वाराहविष्यत्रयसारपञ्चक गुञ्जातैल पञ्चविंशत् क्रमेण ।
सगृह्य तान् सप्तसस्कारशुद्धान् सम्पूरयेन्मूषकमूषिकाय्याम् ॥ ३८ ॥
मूषास्यकुण्डेष्टशतोष्णकक्ष्यात् सङ्गालयेन्नेत्रनिमीलनान्तम् ॥ ३९ ॥
पश्चाद् गृहीत्वा वरदर्पणास्ययन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखे नियोजयेत् ।
एव कृते वैराजकदर्पणो दृढशुद्धस्सुसूक्ष्मोभवति प्रसिद्ध ॥ ४० ॥
शल्यक्षार-हड्डियों का क्षार ५ भाग, श्विङ्गा-लोहविशेष सम्भवतः जस्ता ३ भाग, लाक्ष ३ भाग,

  • पक्षिण इति—पक्षिणेति सन्धिरापं ।
    ‡ भूत, प्रेत, पिशाच यहा प्राणिविशेष हैं ।

दर्पणाधिकरण ] [ ६१
सोमक?-कपूर या लोहा विशेष ८ भाग, शेश-बोल-गन्धबोल ३ भाग, राजकुटिका-पीलीकटसरिया या
कुटज २ भाग, अङ्गारों का सार-भस्मक्षार ८ भाग, सुहागा ३ भाग, नखी ओषधि ८ भाग, बालू ७ भाग,
मातृएण-कालुण-गन्धतृणं ८ भाग, रवितुम्बक-सूर्यकान्तमणि २ भाग, पूर-दाह अगर या बीजपूर
निम्बु ? ३ भाग, पारा २५ भाग, हरिताल ३ भाग, रौप्य--रूपा धातु ४ भाग, ऋव्याद् ? ८ भाग, गरद्-
वच्छनाग ८ भाग, विष्ट-विष्ठा ३ भाग, कन्द-सूरणकन्द ४ भाग, वाराहपिन्थ--कृष्ण मदन वृक्ष का
क्षार या सूअर पशु का पित्त ३ भाग, सार-वज्रक्षार या यवक्षार या नवसार नौसादर ५ भाग, गुञ्जा-रत्ति
का तैल २५ भाग क्रम से इन्हें लेकर सात संस्कार करके मूषक मूषिका बोतल में भर दे । मूषास्य कुण्ड
में ८०० दर्जे की उष्णता से नेत्र निमीलन तक गलावे पश्चात् लेकर बड़े दर्पणगास्य यन्त्र के ऊपर नाल
के मुख में नियुक्त करे । ऐसा करने पर वैराजदर्पण-वैरूप्यदर्पण शुद्ध सूक्ष्म हो जाता है ॥३६-४०॥
अथ कुण्टिणीदर्पण निर्णय-अब कुण्टिणीदर्पण का निर्णय देते हैं-
इत्युक्त्या वैराजकाख्यदर्पणं शास्त्रतस्स्फुटम् ।
इदानीं कुण्टिणीदर्पणस्वरूपं प्रचक्षते ॥ ४१ ॥
यदशुभासन्निधानात् सर्वबुद्धिविकल्पनम् ।
भवेत् कुण्टिणीदर्पणं इति प्रोच्यते बुधै ॥ ४२ ॥
इस प्रकार वैराजकाख्यदर्पण-वैरूप्यदर्पण शास्त्र से स्फुट कह कर अब कुण्टिणी दर्पण का
स्वरूप कहते हैं। अंशुभा-किरणज्योति के संसर्ग से सब की बुद्धियों का विपर्यास हो जाता है अत
कुण्टिणी दर्पण विद्वानों ने कहा है ॥ ४१-४२ ॥
तदुक्तं पराङ्कुशे--वह कहा है पराङ्कुश में-
आकाशविद्युत्तरङ्गसन्धिमार्गं स्वभावतः ।
सप्तस्रोतावर्तं वातविषसयोगत क्रमात् ॥ ४३ ॥
बुद्धेर्विकल्पदासप्त जायन्ते विषशक्तय ।
तासा निवारणार्थाय यत्कृत शास्त्रवित्तमैः ॥ ४४ ॥
तत्कुण्टिणीदर्पण इत्युक्त नाम्ना विशेषत ।
आकाश की विद्युत्तरङ्गों के सन्धिमार्ग में स्वभावत ७ स्रोतोंवाला आवर्त घुमेर करने वाले
वायु के विषसंयोग से क्रम से बुद्धि का विपर्यास करने वाली ७ विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं। उनके
निवारणार्थ जो शास्त्रों के विशेषज्ञों ने किया है, वह कुण्टिणीदर्पण नाम से विशेषतः कहा है ॥४३-४४॥
विषशक्तिविनिर्णयस्तु-उक्तं हि सम्मोहनक्रियाकाण्डे-विषशक्ति विनिर्णय तो सम्मोहन
क्रियाकाण्ड में कहा है-
मेदोसृङ्मासमज्जास्थित्वग्बुद्धीना विकल्पदाः ।
गालिनी कुण्टिणी कालीस्पिञ्जुला उल्बणामरा ॥ ४५ ॥

६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
आकाशविद्युत्तरङ्गसन्धिमार्गादिषु स्वतः ।
सप्तस्रोतावर्तवातविषसम्बन्धतः क्रमात् ॥ ४५ ॥
एतास्सप्त प्रजायन्ते दुःखदा विषशक्तयः ।
मेद-मास के ऊपर सफेद चिकनी वस्तु, असृक्-रक्त, मांस, मज्जा-चर्बी, अस्थि-हड्डी,
त्वचा, बुद्धि को विपरीत कर देने वाली गालिनी कुण्टिणी काली पिञ्जुला उल्बणा, मरा ये सात स्रोत
वाले आवर्त वायु के विष सम्बन्ध से क्रम से आकाश विद्युत्तरङ्गों के सन्धिमार्ग आदि में स्वतः ७ दुःख-
दायक विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं ॥ ४५-४६ ॥
एवमुक्त्वा कुण्टिणीदर्पणानामाद्यं क्रमात् ॥ ४७ ॥
इदानीं तत्पाकविधिसङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ४८ ॥
इस प्रकार कुण्टिणी दर्पण आदि नाम क्रम से कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप से
कही जाती है ॥ ४७-४८ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—यह कहा है दर्पण प्रकरण में—
मृत्पञ्चकं कञ्चुकसप्तकं च फेनत्रयं षण्मुखसारपञ्चकम् ।
श्वित्राष्टकं खड्गनखत्रयं च क्षाराष्टकं बालुकसप्तकं च ।
पाराष्टकं शङ्कचतुष्टयञ्च मातुलुङ्गाष्टकं वरतालकत्रयम् ॥ ४९ ॥
गजोष्ट्रयोः क्षारचतुष्टयं च सुरन्धिकासप्तक पञ्चतैलम् ॥ ५० ॥
मुक्तात्वगष्टत्रितयं च शुक्ति क्षारं तथेन्दुचतुष्टयं च ।
एतान् शुद्धान् क्रमतो गृहीत्वा सम्पूरयेच्छिङ्गिकमूपमध्ये ॥ ५१ ॥
संस्थाप्य शिञ्जीरककुण्डमध्ये संगालयेत् सप्तशतोष्णकक्ष्ये ।
पूर्वोक्तमार्गेण नियोजयेत् तद्रस यथाशास्त्रविधानतस्तत ॥ ५२ ॥
अत्यन्तसूक्ष्म सुदृढ भवेद् रुच बालार्कवत् कुण्टिणीकाख्य दर्पणम् ॥५३॥
मृत्—सौराष्ट्र मृत्तिका ५ भाग, कञ्चुक—सर्प की केंचुली ७ भाग, समुद्रफेन ३ भाग, षण्मुख-
सार—खरबूजे के बीज ५ भाग, श्वित्रा—लोहविशेष-जस्ता ? ८ भाग, गेण्डे का नाखून खुर ३ भाग, क्षार-
यवखार ८ भाग या आठों क्षार एक एक भाग, रेत ७ भाग, पारा ८ भाग, शङ्ख ४ भाग, मातुलुङ्ग ?—
कातुण-गन्धतृण ? ६ भाग, शुद्ध हरिताल ३ भाग, गज—गजपिप्पली और उष्ट्र—ऊंट कटीला के क्षार
४ भाग या गज—हाथी और उष्ट्र—ऊण्ट की हड्डी का क्षार ४ भाग, सुरन्धिका ?—बड़े नलशर का क्षार
७ भाग, तैल—तिल तेल ५ भाग, मुक्ता त्वक्—मोती की त्वचा ८ भाग, शुक्ति क्षार—सीपी का क्षार ३
भाग, इन्दु—कपूर ४ भाग । इन शुद्ध द्रव्यों को क्रम से लेकर शिङ्गिक मूषा मध्य में भर कर शिञ्जीरक
कुण्ड मध्य में ७०० दर्जे की उष्णता से गलावे । पूर्वोक्त मार्ग से पिघले रस को शास्त्रविधान से नियुक्त
करे, अत्यन्त सूक्ष्म दृढ चमकदार बाल सूर्य की भांति सुदृढ़ कुण्टिणी नामक दर्पण बन जावे ॥४९-५३॥
अथ पिञ्जलादर्पणनिर्णयः—अब पिञ्जुलादर्पण का निर्णय देते हैं—

दर्पणाधिकरण ] [ ६३
अर्कांशुयुद्धसञ्जातशक्तिस्स्यात् पिञ्जुलेति हि ।
सा नेत्रकृष्णताराग्रप्रभाग्राहिति वर्णिता ॥ ५४ ॥
यतो निगृह्य तच्छक्तिं वेगेन स्वीयशक्तितः ।
यन्तॄणां कृष्णताराग्रप्रकाशं पालयत्यत । ॥ ५५ ॥
पिञ्जुलादर्पणं इति नाम शास्त्रे निरूपितं ।
सूर्यकिरणों के युद्ध से उत्पन्न शक्ति पिञ्जुला है वह नेत्र के काले तारे के अग्र की ज्योति
को ले लेने वाली कही है, जिससे अपनी शक्ति से यात्रियों के कृष्णताराम्र प्रकाश को वेग से लेकर
पालन करती है। इसलिए पिञ्जुलादर्पण नाम से शास्त्र में वर्णित है ॥ ५४-५५ ॥
तदुक्तमंशुबोधििन्याम्— यह कहा है अंशुबोधिनी में--
अग्ने पूर्वदिशस्य स्थानमारभ्य संख्यतः ।
उपदिश्यस्य स्थानान्तमष्टधा दिग्विनिर्णय ॥ ५६ ॥
यजुरारण्यके प्रोक्तमंशूनां जातिनिर्णये* ।
एकैकदिशि सञ्जाता रश्मयो भिन्नशक्तयः ॥ ५७ ॥
इति शास्त्रेऽग्निभेदात्प्रवदन्ति मनीषिणः ।
ऋतुकालप्रभेदेन पञ्चवातप्रवेशतः ॥ ५८ ॥
तेषामन्योन्यसंसर्गो वारुणोयोगतो भवेत् ।
अतोऽशूनां भवेद् युद्धं शक्तिभेदत्वकारणात् ॥ ५९ ॥
तस्मिन् परस्परं वेगात् तत्तद्दिशि विशेषतः ।
मघर्षणात् प्रजायन्ते चत्वारि विषशक्तयः ॥ ६० ॥
अन्धान्धकारपिञ्जूरतारपा इति तत् क्रमात् ।
रक्तजाठरताराग्रप्रभाक्षाक्षिक्षयं हनेन् ॥ ६१ ॥ इत्यादि ॥
इस अग्नि के पूर्व दिशा में स्थान को आरम्भ कर संख्या से उपदिशा में इसके स्थान के
अन्त तक ८ प्रकार से निर्णय है, यजुर्वेद के आरण्यक में किरणों के जाति निर्णय में कहा है। एक एक
दिशा में उत्पन्न किरणें भिन्न-भिन्न शक्तिया शास्त्रों में अग्नि के भेद से, ऋतुकाल के भेद से, पांच
वायुओं के प्रवेश से उनका अन्योन्य संसर्ग वारुणी—मेघस्थ वैद्युत शक्ति के योग से होता है अत
किरणों का युद्ध शक्तिभेद के कारण हो जाता है। वहा परस्पर वेग से उस उस दिशा में विशेष संघर्ष
से ४ विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं। अन्ध, अन्धकार, पिञ्जूष, तारपा क्रम से रक्त जाठर ताराम्र प्रभा
दोनों आंखों का नाश कर दे ॥ ५६--६१ ॥
उक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डेऽपि— सम्मोहनक्रियाकाण्ड में भी कहा है—
सूर्याशुयुद्धात् (द्ध ?) सञ्जाताश्चत्वारि विषशक्तयः ।
अन्धान्धकारपिञ्जूषनेत्रघ्ना इति वर्णिता ॥ ६२ ॥

  • "धनु न जातमष्टरोदसी" (तै० ब्रा० १।७।५।)

६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अन्धशक्तिर्हन्ति रक्तमन्धकारा तु जाठरम् ।
पिञ्जूषा कृष्णताराग्रप्रभा नेत्रद्वय तथा ॥ ६३ ॥
निहन्ति तारपा शक्तिस्स्वकीयविषवेगत ॥ ६४ ॥ इत्यादि ॥
सूर्य किरणों के युद्ध से चार विषशक्तियां उत्पन्न हुई हुईं अन्ध, अन्धकार, पिञ्जूष, नेत्रघ्ना
कही गई हैं । अन्ध शक्ति रक्त को नष्ट करती है, अन्धकारा तो जठराग्नि को, पिञ्जूषा कृष्णताराम की
ज्योति को और तारपा शक्ति अपने विष वेग से दोनों आंखों को नष्ट करती है ॥ ६२-६४ ॥
पि(म ?) ञ्जुलादर्पणस्यैवमुक्त्वा नामविनिर्णयं ।
इदानी तत्पाकविधिसङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६५ ॥
पिञ्जुलादर्पण का नाम निर्णय इस प्रकार कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप से कही
जाती है ॥ ६५ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पण प्रकरण में—
वार्ध्वीकपटकं वरशोणपञ्चकं क्षाराष्टकं वालुकसप्तक च ।
निर्यासमुत्पञ्चकटङ्कणाष्टकं दम्भोलिसारद्वयमष्टपारदम् ॥ ६६ ॥
शुद्धाभ्रकं पञ्चक रवित्रिपुद्वयं सुरोलिकासत्त्वचतुष्टय च ।
त्वगष्टकं वार्धुधिकत्रय तथा कन्दत्रय पिष्टचतुष्टय च ॥ ६७ ॥
तालत्रय माक्षिकसप्तकं च वृकोदरीवीतचतुष्टय क्रमात् ।
अष्टादशैतान् वरशुद्धवस्तून संगृह्य सम्यक् परिशोधयेत् क्रमात् ॥ ३८ ॥
सम्पूर्य पश्चात् सुकपालमूषामुखे न्यसेद् व्यामटिकान्तरे दृढम् ।
संगालयैत् सप्तशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो नेत्रनिमीलनान्तम् ॥ ६६ ॥
संगृह्य संगालितद्रस शनैर्यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखात् प्रपूरयेत् ।
पश्चाद् दृढ सूक्ष्ममतीवशुद्ध मनोहर पिञ्जुलदर्पण भवेन् ॥ ७० ॥ इत्यादि ॥
वार्ध्वीक—सृष्टिका—भेड़ का दूध ? ६ भाग, वरशोण—अच्छा सिन्दूर ५ भाग, क्षार—यवक्षार
८ भाग या आठों क्षार एक एक भाग, रेत ७ भाग, निर्यासमुत्—वृक्ष का दूध जमा हुआ ? ५ भाग, सुहागा
८ भाग, दम्भोलि—लोह विशेष का चूरा २ भाग, पारा ८ भाग, शुद्ध अभ्रक और ताम्बा ५ भाग, त्रपु—सीसा
२ भाग, सुरोलिका सत्त्व ?—सुन्दर शूण्ड या हल्दी का सत्त्व ? ४ भाग, त्वक्—दारचीनी ८ भाग, वार्धु-
षिक ? वार्द्धय—द्रोणीलवण ? ३ भाग, कन्द—सूरणकन्द ३ भाग, पिष्ट—तिलखल ४ भाग, हरिताल
३ भाग, सोनामाखी ७ भाग, वृकोदरीवीत ? ४ भाग । इन १८ शुद्ध वस्तुओं को लेकर सुकपालमूषा मुख
में भर कर व्यासटिका के अन्दर रख दे । ७०० दर्जे की उष्णता के प्रमाण से नेत्र खुलने तक गलावे,
गलाये हुए पिघले रस को यन्त्र के उपरिनाल के—मुख से धीरे से भर देवे फिर सूक्ष्म अधिक शुद्ध
मनोहर पिञ्जुल दर्पण हो जावे ॥ ६६-७० ॥
अथ गुहागर्भदर्पणनिर्णयः—अब गुहागर्भ दर्पण का निर्णय देते हैं—
वारुणीवातकिरणशक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
जायन्ते रोगदा नॄणा गुहाद्या विशेषशक्तय ॥ ७१ ॥

दर्पणाधिकरण ] [ ६५
तास्समाहृत्य वेगेन विद्युत्संयोगत पुन ।
प्रसार्य परयानस्थजनोपरि विशेषत ॥ ७२ ॥
य प्रयच्छति दुखानि विषरोगादिभिस्त्वत ।
स गुहादर्पण इति प्रवदन्ति मनीषिण ॥ ७३ ॥
बारुणी-अश्रविद्युच्छक्ति वायु किरण शक्तियों के संघर्ष के कम से मनुष्यों को रोग देने
वाली गुहादि विषशक्तिया उत्पन्न हो जाती हैं। उन्हें विद्युत् के संयोग से वेग से लेकर दूसरे शत्रु के
विमान के ऊपर प्रसारित करके-डाल कर जो विषरोग आदि से दुःखों को देती है। अत गुहादर्पण-
गुहागर्भदर्पण मनीषी कहते है ॥ ७१-७३ ॥
तदुक्त प्रपञ्चसारे-वह कहा है प्रपञ्चसार ग्रन्थ में-
कश्यपोर्ध्वकपालाभ्या मध्ये तिष्ठति वारुणी ।
कपालवारुणीमध्ये वाता पञ्चसहस्रका ॥ ७४ ॥
तथैव कश्यपारोगकिरणाश्चाष्टकोटय ।
तत्तद्वातसमायोगात् प्रभिन्ना किरणा पुन ॥ ७५ ॥
अनुलोमविलोमाभ्या वहन्ति विशेषत ।
शक्तिवाताशुसंयोगो यदा स्यात् खे परस्परम् ॥ ७६ ॥
महादु खकरास्तत्र गुहाद्या विषशक्तय ।
जायन्ते वेगसयुक्ता जले बुद्बुदवत्स्वयम् ॥ ७७ ॥ इति
कश्यपो के ऊपर दो कपालों के मध्य वारुणी शक्ति रहती है, कपाल और वारुणी के मध्य
पाच सहस्र वायुए हैं तथा कश्यप ओर रोगकिरण आठ करोड़ हैं, उस उस वायु के सम्मेल से फिर
किरणें पृथक् पृथक् अनुलोम और विलोम के द्वारा विशेषत चलती हैं। जब शक्ति-वारुणी शक्ति वायु
और किरणो का सयोग आकाश में परस्पर हो जावे तो वहां महादु ख करने वाली गुहा आदि शक्तिया
वेगवश जल में बुद्बुद की भांति स्वयं उत्पन्न हो जाती है ॥ ७४ -७७ ॥
लल्लोपि- लल्ल ने भी कहा है-
दशोत्तरशतन्यायमनुसृत्य यथाक्रमम् ।
शक्तिवाताशुसंयोगो यदा भवति वेगत ॥ ७८ ॥
तदा सघर्षण तेषामतिवेगाद् भविष्यति ।
जायन्ते तेन विविधा गुहाद्या विषशक्तय ॥ ७६ ॥
तत्प्रयोगान्नृणा लोके ॐभवेन्नानाविधामया ॥ इत्यादि ।
११० न्याय ? को अनुसरण कर यथाक्रम शक्ति-वारुणी शक्ति वायु और किरणों का सयोग
जब वेग से होता है तब उनका संघर्ष वेग से होगा-हो जाता है, उससे विविध गुहादि विषशक्तिया
उत्पन्न हो जाती हैं उनके प्रयोग से मनुष्यों के लोक में नानाविध रोग हो जावे ॥ ७८- ७६ ॥

  • भवेत्-बचनव्यत्यय-आर्ष ।

६६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्वतस्सिद्धन्यायमुक्तं वशिष्टेन—स्वत सिद्धन्याय कहा है वशिष्ठ ने—
विजातीयशक्तिसाङ्कर्यात् सजातीयविषशक्तिप्रवाहस्स्यात् कूर्माण्डवत् ॥ इति ॥
विजातीय शक्ति के साङ्कर्य—मेल से सजातीय विषशक्ति का प्रवाह कछवे के अण्डे के
समान हो जावे ॥
तदुक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डे—वह कहा है सम्मोहन क्रियाकाण्ड में—
त्रिलक्षपञ्चसहस्रस्तथा पञ्चोत्तर शतम् ।
शक्तिवातांशुशक्तीना परस्परविघटनात् ॥ ८० ॥
रोगप्रदा प्रजायन्ते गुहाद्या विषशक्तयः ।
कुष्ठापस्मारग्रह (हि ?) णीका (सा ?) सशूलप्रदा क्रमात् ॥८१॥
तासु मुख्या पञ्च इति शक्तय परिकीर्तिता ।
तस्मान्नामानि विधिवत्संग्रहेण निरूप्यन्ते ॥ ८२ ॥
गृध्री गोधा कुजा रौद्री गुहा इति पञ्चधा ।
एतत्प्रचोदनाद्रोगप्रदानार्थ तु यत्कृतम् ॥ ८३ ॥
तद्गुहागर्भदर्पण इत्युक्त शास्त्रवित्तमै ॥ इत्यादि ॥
तीन लाख पांच सहस्र एक सौ पांच शक्ति—वारुणी शक्ति वायु किरणों के परस्पर सघर्ष से
रोग देने वाली गुहा आदि विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं जो कि कुष्ठ-कोढ़, अपस्मार—मृगी, संग्रहणी,
खांसी, शूल—पीड़ा देनेवाली हैं । उनमें मुख्य पांच शक्तियां कही हैं । उनके नाम विधिवत् संक्षेप से कहे
जाते हैं । वे गृध्री, गोधा, कुजा, रौद्री, गुहा पांच हैं । इनके प्रेरण से रोगप्रदानार्थ जो किया है वह
गुहागर्भ दर्पण शास्त्रवेत्ताओं ने कहा है ॥ ८०-८३ ॥
एवमुक्त्वा गुहादर्शदर्पण शास्त्रतस्फुटम् ॥ ८४ ॥
तस्येदानी पाकविधिसंग्रहेण प्रकीर्त्यते ।
इस प्रकार गुहादर्शदर्पण शास्त्रानुसार स्फुटरूप से कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप
से कही जातो है ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पणप्रकरण में—
वराटिकासप्तक मञ्जुलत्रय डिम्भीरषट्क रजकाष्टक तथा ।
मण्डूरषट्क वरपारदाष्टक तालत्रय ब्राह्मिकसप्तक तत ॥ ८५ ॥
नागद्वय चाञ्जनिकाष्टक तथा मातृणषट्क वरबालुकाष्टकम् ।
किशोरषट्क मुतुकुन्दपञ्चक तैलद्वय लोहिकपञ्चविंशति ॥ ८६ ॥
मृडाणिगर्भोद्भवसत्त्वपञ्चक मृदष्टक स्फाटिकपञ्चक तथा ।
शल्यत्रय पञ्चदशेन्दुसत्त्वक दम्बोलिटाकाद्वयसत्त्वपञ्चकम् ॥ ८७ ॥
एतान् क्रमाद् द्वाविंशतिवस्तुवर्गान् शुद्धान् समादाय यथाविधि क्रमात् ।
सम्पूयं चञ्चूपुटमूषमध्ये चञ्चूपुटभ्यासटिकान्तरे न्यसेत् ॥ ८८ ॥

दर्पणाधिकरण ] [ ६७
संगालयेत् सप्तोष्णकक्ष्यैश्शास्त्रोक्तमार्गेण निमीलनान्तान् ।
पश्चात् समाहृत्य शनेश्शने क्रमाद् यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखे नियोजयेत् ॥ ५९ ॥
ततो गुहागर्भकदर्पणो भवेच्छुद्ध सुसूक्ष्म सुदृढ मनोहरम् ॥ ६० ॥
वराटिका—कौड़ी ७ भाग, मञ्जुल—मजीठ ३ भाग, डिम्भीर ?—डिण्डीर—समुद्रफेन ६ भाग,
रजक—रञ्जक—शिंगरफ ८ भाग, मण्डूर—लोहमल ६ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग, ताल—हरिताल ३ भाग,
ब्राह्मिका—भारङ्गी ७ भाग, नाग—सीसा २ भाग, आञ्जनिक—सुरमा ८ भाग, मातृण्ण—कातृण—गन्ध-
तृणण ६ भाग, अच्छा रेत ८ भाग, किशोर-तैलपर्णी या घोटक शिग्रु ( सोंजना ) ६ भाग, मुचुकुन्द—
मुचुकुन्द पुष्प ४ भाग, तिलतैल २ भाग, लोह्निक—सफेद सुहागा २५ भाग, मुडाणिगर्भोद्भव सत्त्व ?
५ भाग, मृत्—सौराष्ट्रमृत्तिका ८ भाग, स्फटिकमणि या फिटकरी ५ भाग, शल्य—हड्डी या लालखैर-कत्था
३ भाग, इन्दुसत्त्व—चन्द्रकान्त का सत्त्व या कपूर १५ भाग, दग्धोलिटाका ?—लोहा विशेष ५ भाग ।
इन २२ वस्तुओं को शुद्ध लेकर चक्रपुट मूषामध्य में चक्रपुट व्यासटिका के अन्दर डाल दे । ७०० दर्जे
की उष्णता से शास्त्रोक्त मार्ग से निमीलन तक गलावै, पश्चात् लेकर धीरे धीरे यन्त्र के उपरिनाल के मुख
में डाल दे फिर गुहागर्भ दर्पण शुद्ध सूक्ष्म सुदृढ़ मनोहर बन जावे ॥ ८५--६० ॥
अथ रौद्रीदर्पण निर्णय.—अब रौद्रीदर्पण का निर्णय देते हैं—
दर्शनादेव सर्वेषां द्रावणं येन जायते ।
तद्रौद्रीदर्पणं इति प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ६१ ॥
दर्शन से ही सब का द्रावण जिससे होता है वह रौद्रोदर्पण है ऐसा मनीषी कहते हैं ॥६१॥
तदुक्त पराङ्कुशे—वह पराङ्कुश में कहा है—
रुद्राण्योपराभ्रलिङ्गो यत्र सम्मेलनं भवेत् ।
रौद्रीनाम भवेत् काचिच्छक्तिस्तत्रोग्ररूपिणी ॥ ६२ ॥
अर्कशुयोगतस्सा तु सर्वान् सम्द्रावयेत् स्वयम् ।
यद् रुद्राण्योषराभ्रलिङ्गाभ्यां क्रियते क्रमात् ॥ ६३ ॥
तद् रुद्राणीदर्पण इत्युक्तं शास्त्रविदां वरै ।
रुद्राण्योषरा ? और अभ्रलिङ्ग ? जहां मिलें वहां रौद्री नामक कोई शक्ति उग्ररूपी प्रकट हो
जाती है । सूर्यकिरणों के योग से वह सब को द्रवित कर दे, जो कि रुद्राण्योषरा और अभ्रलिङ्ग से क्रम
से किया जाता है वह रुद्राणीदर्पण शास्त्रज्ञ विद्वानों ने कहा है ॥ ६२--६३ ॥
उक्तं च सम्मोहनक्रियाकाण्डे—कहा है सम्मोहनक्रियाकाण्ड में—
रौद्री भान्वंशसंयोगाज्जायते मारिकाभिधा ।
विषशक्तिस्तया सूर्यकिरणाशनिसम्भव ॥ ६४ ॥
तत्सदर्शनमात्रेण परयानविनाशनम् ।
यत् करोति विशेषेण तद्रौद्रीदर्पणो भवेदिति ॥ ६५ ॥
रौद्रीदर्पणनामादीनेवमुक्त्वा यथाविधि ।
तत्पाकविधिमद्यात्र सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६६ ॥

६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
रौद्री सूर्यकिरणों के संयोग से मारिका नाम की विषशक्ति उत्पन्न हो जाती है उससे सूर्यकिरण-
विघ्नू की उत्पत्ति हो जाती है। उसके दर्शनमात्र से परविमान का विनाश जो कर देता है वह रौद्री-
दर्पण हो जाता है। रौद्री दर्पण नाम आदि यथाविधि कह कर उसके पकाने की विधि अब संक्षेप से
कही जाती है ॥ ६४-६६ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे-वह कहा है दर्पण प्रकरण में-
नागाष्टक शाल्मलिकत्रय तथा दुर्वारषट्क कुरुपिञ्जराष्टकम् ।
द्रोण्ये कविशद्रविचुम्बकाष्टक रुद्राणिग्रावोत्तरसप्तविंशति ॥ ६७ ॥
शल्याकषट्क बरकौटिलाष्टक वीराभ्रलिङ्गत्रिशतिकस्तथैव ।
क्षाराष्टक सैकतसपाक तथा मातृणषट्क वरडिम्बिकात्रयम् ॥६८॥
छि्वङ्गाष्टक मञ्चुकमृत् त्रयोदश निर्यासषटक वरकुम्भिनीत्रयम् ।
तैलत्रय माक्षिकसप्तविंशतिर्गोधाम्लषट्क वरपिञ्जुलाष्टकम् ॥ ६६ ॥
वैरञ्जसत्त्वाष्टकन्दपञ्चक तालत्रय कार्मुकसप्तक तथा ।
षड्विंशदेतान् विधिवत् सुशोधितान् सम्पूरयेत् कूष्माण्डकमूषिकायाम् ॥१००॥
कूष्माण्डकुण्डे सुदृढ निधाय संगालयेद्दशतोष्णकथ्यै ।
उन्मीलिताक्षान्तसुगालित रस यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखे निसिञ्चेत् ॥ १०१ ॥
एव कृते रौद्रिकदर्पणो भवेत् सूक्ष्मस्सुशुद्धस्सुदृढो मनोहर ॥ १०२ ॥
नाग-सीसा धातु या हाथी दान्त ८ भाग, शाल्मलिक-रोहेडा ३ भाग, दुर्वार-दुर्वरा-भारगी
६ भाग, कुरुपिञ्जर-कटेली का सूखा पेड़ ? ८ भाग, द्रोणी-द्रोणीलवण २१ भाग, रविचुम्बक-सूर्यकान्त
८ भाग, रुद्राणि-रुद्रजटा ७ भाग, मोवोषर-पाषाणक्षार २० भाग, शल्याक-रक्तखैर या नागवल्ली ६ भाग,
कौटिल-शंखसार ८ भागवीराभ्रलिङ्ग? ३० भाग, क्षार ८ या सब ८ क्षार एक एक भाग, सैकतसपाक-पकारेत
८ भाग, मातृण ? कातृण-गन्धतृण ६ भाग, वरडिम्बिका-श्योनाक वृक्ष या बड़ी जल मक्खी ३ भाग, छि्वङ्गा
लोहविशेष ८ भाग, कञ्चुकमृत्-केंचुलीमिट्टी १३ भाग, निर्यास-गोन्द ६ भाग, वरकुम्भिनी-श्वेत-
इन्द्रवारुणी-सौधिनी ३ भाग, माक्षिक-सोना माखी २७ भाग, गोधाम्ल-मन शिलाद्राव ६ भाग, वरपिञ्जुला
अच्छी रुई ? ८ भाग वैरञ्ज - विरञ्जि-कोआ का सत्त्व ८ भाग, कन्द-सूरणकन्द ५ भाग, ताल-हरिताल
३ भाग, कार्मुक-श्वेतखदिर या महानिम्ब ७ भाग। इन विधिवत् शोधी हुई २६ वस्तुओं को कूष्माण्डमूषक
में भर दे फिर कूष्माण्ड कुण्ड में सुदृढ़ रखकर १०० दर्जे की उष्णता से गलावे आंख खोलने तक
गलाया हुआ रसयन्त्र के ऊर्ध्व नाल के मुख में सींच दे-डाल दे ऐसा करने पर रौद्रीदर्पण सूक्ष्म शुद्ध
दृढ़ मनोहर हो जावे ॥ ६७-१०२ ॥
शक्त्यधिकरणम् ।
शक्ति का अधिकरण प्रस्तुत है ।
शक्तयस्सप्त ॥ अ० ४ सू० १ ॥
बो० गृ०

शक्त्यधिकरणम् ] [ ६९
एवमुक्त्वा विमानस्य दर्पणान् शास्त्रतस्स्फुटम् ।
इदानीं तच्छक्तिभेदनिर्णयस्सम्प्रचक्षते ॥ १०३ ॥
पदद्वयं भवेदस्मिन् शक्तिभेदप्रबोधकम् ।
तत्रादिमपदाच्छक्तिस्वरूपस्सम्प्रदर्शित ॥ १०४ ॥
संख्यातस्तत्प्रभेदस्तु द्वितीयपदत स्मृत ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ १०५ ॥
उद्गमा पञ्जरा तद्वत् सूर्यशक्त्यपकर्षिणी ।
परशक्त्याकर्षिणी च तथा द्वादश शक्तय ॥ १०६ ॥
कुण्टिणी मूलशक्तिश्चेत्येतास्स्यूस्सप्त शक्तय ।
इमा विमानकार्येषु प्रधानत्वेन वर्णिता ॥ १०७ ॥
इस प्रकार विमान के दर्पणो को शास्त्र से स्पष्ट कहकर अब उनके शक्तिभेद का निर्णय कहते
है। इस सूत्र में शक्तिभेद के बोधक दो पद है उनमे आदिम पद से शक्ति का स्वरूप प्रदर्शित किया
दूसरे पद से उसके भेद गिनाए है। पदों के अर्थ इस प्रकार कहे अब विशेषार्थ कहा जाता है। उद्गमा
पञ्जरा, सूर्यशक्त्यपकर्षिणी, परशक्त्यपकर्षिणी, द्वादशशक्तिया, कुण्टिणी, मूलशक्ति ये ७ शक्तियां हैं, ये
विमानकार्यों में प्रधानरूप से कही हैं ॥ १०३—१०७ ॥
विमानस्योक्तस्थानेषु तत्तद्यन्त्राण्यथाविधि ।
सकीलकान् तन्त्रियुक्तानतिशुद्धान् सचक्रकान् ॥ १०८ ॥
स्थापयेत् केन्द्ररेखासख्यामार्गानुसारत ।
विमान के उक्त स्थानों मे उन उन चक्रों को यथाविधि कीलसहित और तारयुक्त चक्रसहित
केन्द्ररेखा की संख्या के अनुसार स्थापित करे ॥ १०८ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्वग्रन्थ में—
तुन्दिलो पञ्जरस्तद्वदंशुपाश्चापकर्षक ।
सन्धानिको दार्पणिकश्शक्तिप्रभवक क्रमात् ॥ १०९ ॥
सज्जैते † यानशक्तीना यन्त्राणीति विनिर्मिता ।
तत्तद्यन्त्रमुखादेव तत्तच्छक्तिक्रियादय ॥ ११० ॥
तुन्दिलादुद्गमा शक्ति पञ्जरात् पञ्जराभिधा ।
अंशुपात् सूर्यशक्त्यपकर्षिणी शक्तिरीरिता ॥ १११ ॥
अपकर्षकयन्त्रेण परशक्त्यपकर्षिणी ।
सन्धानयन्त्राद् द्वादशशक्तयस्सन्निरूपिता ॥ ११२ ॥
कुण्टिणीनामिका शक्तिरुक्ता दार्पणिकादित ।
† 'एते—एतानि' लिङ्गव्यत्यय ।

७० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिप्रसवयन्त्रेण मूलशक्तिरुदीरिता ॥ ११३ ॥
एवं क्रमात् सप्त यन्त्रशक्तय परिकीर्तिताः ।
तुन्दिल, पञ्जर, अं'शुप, अपकर्षक, सान्धानिक, दार्पणिक, शक्तिप्रसवक, ये ७ विमान शक्तियों
के यन्त्र निर्णय किये गए हैं । उन यन्त्रों के मुख से ही उनकी शक्ति की किया आदि होती है जो कि
तुन्दिल से उद्गमा शक्ति, पञ्जर से पञ्जरा, शक्तिर से सूर्य्यशक्त्यपकर्षिणी शक्ति, अपकर्षक यन्त्र से पर-
शक्त्यपकर्षिणी, सन्धान यन्त्र से द्वादश शक्तियां, दार्पणिक से कुण्टिणी नामक शक्ति, शक्तिप्रसवयन्त्र
से मूलशक्ति कही है इस प्रकार क्रम से ७ यन्त्रशक्तियां कही हैं ॥ १०६—११३ ॥