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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 368 में से

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पृष्ठ 113

६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र

मार्तण्डशक्तिमाकृष्य पश्चाच्छास्त्रविधानतः ।
संयोजयेत् कान्तपाराभ्रौजकञ्चुकद्रावके ॥ ४७ ॥
तत्रत्यकान्तशक्त्या सा मिलित्वा चञ्चला सती (मति?) ।
अतिवेगात् समुड्डीय गगनाभिमुखी भवेत् ॥ ४८ ॥
तां समाहृत्य विधिवन्नालतन्त्रीमुखात् पुनः ।
विस्तृतास्यादर्शपिण्डगर्भकेन्द्रे नियोजयेत् ॥ ४९ ॥
सूर्यांशून् खतरङ्गस्थशक्तिगर्भान् यथाविधि ।
सच्छिद्रनालदण्डस्योर्ध्वनालात् ततः परम् ॥ ५० ॥

अत्रि के कहे प्रकार से उनका नाम कहा जाता है। मार्तण्ड, रौहिणी, भद्रा ये यथाक्रम हैं।
मार्तण्डशक्ति को खींच कर पश्चात् शास्त्रविधान से कान्त पारा अभ्रक पूर्ण कंचुलीद्राव या अम्बुवेतस-
द्राव में युक्त कर दे, वहां की कान्तशक्ति से मिल कर चञ्चल हुई अतिवेग से उठ कर गगनाभिमुखी हो
जावे। फिर उसे लेकर विधि नालतार के मुख से विस्तृतास्य आदर्श पिण्ड के गर्भकेन्द्र में जोड़ दे,
आकाशतरङ्गों—आकाशमण्डलों में स्थित शक्तिगर्भ वाली सूर्यकिरणों को यथाविधि छिद्रसहित नाल
दण्ड के ऊपर वाले नाल से—॥ ४६-५० ॥

समाहृत्य विशेषेण तत्रैव स्थापयेद् दृढम् ।
पश्चात् तन्नालमूलस्थकेन्द्रमार्गात् प्रमाणतः ॥ ५१ ॥
विस्तृतास्यादर्शपिण्डमुखकेन्द्रे प्रवेशयेत् ।
सूर्यांशुशक्तितत्पिण्डं पश्चात् सव्याप्य वेगत ॥ ५२ ॥
तद्गर्भस्थितमार्तण्डशक्त्या सम्मिलिता स्वयम् ।
आकाशाभिमुखी भूत्वा परिभ्राम्यति वर्तुलम् ॥ ५३ ॥
ता समाहृत्य वेगेन विमानखपथि क्रमात् ।
वियत्तरङ्गप्रवाहमुखमध्ये नियोजयेत् ॥ ५४ ॥
एव कृतेथ तच्छक्तिर्व्योमयानविनाशकम् ।
आकाशवीचीसङ्घातविषशक्ति समूलत ॥ ५५ ॥
आकृष्य पीत्वा वेगेन विमान रक्षति स्वयम् ।

—लेकर विशेषतः वहीं पर दृढ़ स्थापित करे, पश्चात् नालमूल में स्थित केन्द्रमार्ग से प्रमाण
से विस्तृतास्य आदर्श पिण्डमुख के केन्द्र मे प्रविष्ट कर दे, सूर्य किरणशक्ति उस पिण्ड को व्याप्त कर वेग
से उसके गर्भ में स्थित मार्तण्डशक्ति से मिली हुई स्वयं आकाशाभिमुखी होकर गोलरूप में घूमती है
उसे वेग से लेकर विमान के आकाशमार्ग में क्रमशः आकाशतरङ्गों के प्रवाहमुख के मध्य में नियुक्त
करे। ऐसा करने पर वह शक्ति आकाशतरंग से उत्पन्न विमानविनाशक विषशक्ति को समूलतः स्वयं
वेग से सर्वथा खींच पीकर विमान की रक्षा करती है ॥ ५१-५५ ॥

अथ तद्रोहिणीशक्तिं समाहृत्य च पूर्ववत् ॥ ५६ ॥