सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

८८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्थाननिर्णयमाह स एव — वह ही स्थाननिर्णय कहता है—
शङ्कुमूलस्थच (छ ?) षके न्यसेत् सौम्यमणिं तथा ।
कुड्यात्रिकोणमध्ये तु मणिं साञ्जनिकं न्यसेत् ॥ २७ ॥
विस्तृतास्यादर्शपिण्डे न्यसेत् पैङ्गलकं मणिम् ।
नालदण्डस्थछिद्रे ऽथ भारद्वाजमणिं तथा ॥ २८ ॥
भ्राजस्वद्रावके पञ्चज्योतिर्गर्भमणिं न्यसेत् ।
कान्तपाराभ्रजोर्क चुक्रद्रावे शक्तिपञ्जरमिति ॥ २९ ॥
एवं मणीन् स्थापयित्वा तत्तत्स्थाने यथाविधि ।
आदर्शनालसयुक्तान् सर्वकीलान्तरे क्रमात् ॥ ३० ॥
सौम्य मणि को शंकुमूलस्थ पात्र में डाल दे, साञ्जनिक मणि को भित्तित्रिकोण के मध्य में
रख दे, पैङ्गलक मणि को विस्तृतास्य आदर्श पिण्ड में धर दे, पञ्चज्योतिर्गर्भ मणि को भ्राजस्व द्रावक में
रखदे, शक्तिपञ्जर मणि को कान्त पारे अभ्रक से पूर्ण अम्लवेतस द्राव में रखे । इस प्रकार उस उस स्थान
में यथाविधि मणियों को आदर्शनाल सहित सब कीलों के अन्दर क्रम से स्थापित करके—॥ २७-३० ॥
तन्त्रीन् सन्धारयेत् पश्चान्मूलकेन्द्राद् यथाक्रमम् ।
पश्चात् सञ्चालयेच्चक्रत्रयकीलं यथाविधि ॥ ३१ ॥
तेन दर्पणगोलस्थपिण्डयोरुभयोः क्रमात् ।
परस्परघर्षणं स्यादिति वेगात् स्वभावतः ॥ ३२ ॥
तस्मात् सञ्जायते शक्तिश्शतकक्ष्यौष्णमानतः ।
अथ तच्छक्तिमादाय स्थापयित्वा यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
मणौ साञ्जनिके पश्चात् तन्त्रिभ्यां नालमार्गतः ।
संयोजयेत् ततश्शक्तिस्तन्मणौ लयमेष्यते ॥ ३४ ॥
मणिगर्भस्थशक्त्या सा मिलित्वाथ स्वयं पुनः ।
निस्सरेन्मणिगर्भस्थमुखकेन्द्राद् विशेषतः ॥ ३५ ॥
पश्चात् मूल केन्द्र से यथाक्रम तारों को जोड़ दे, पश्चात् तीन चक्रों की कील को यथाविधि
चलावे उससे दर्पण गोल में स्थित दो पिण्डों का परस्पर घर्षण अति वेग से स्वभाव से हो जावे उससे
सौ दर्जे की उष्णता मान से शक्ति उत्पन्न हो जाती है फिर उस शक्ति को लेकर यथाक्रम स्थापित करके
पश्चात् दो तारों से नालमार्ग द्वारा साञ्जनिक मणि में संयुक्त करे फिर वह शक्ति उस मणि में लय को
प्राप्त हो जाती है । मणिगर्भस्थ शक्ति से वह मिलकर पुनः स्वयं मणिगर्भस्थ मुख केन्द्र से विशेषतः
निकल जावे ॥ ३१-३५ ॥
तमाकृष्य यथाशास्त्रं नालतन्त्रीमुखात् पुनः ।
संयोजयेत् सौरमणौ पूर्ववत् सप्रमाणतः ॥ ३६ ॥