बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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मणिप्रेरिततच्छक्ति द्रवशक्तिं तथैव च ।
समाहृत्य विशेषेण रुचिकद्रवसंस्थिते ॥ १०६ ॥
मणौ सन्धारयेत् पश्चात् तच्छक्तिं पूर्ववत् क्रमात् ।
रुचिकादर्शमूलस्थरेखाकेन्द्रे नियोजयेत् ॥ ११० ॥
पश्चात् उन दोनों शक्तियों को पकड़ कर पारे के द्राव में नियुक्त कर दे, फिर दिशा देश केन्द्र
तक स्थित वस्तुओं के बिचार से—प्रभाव से वह द्रावक नाना चित्ररंग वाली प्रभा से युक्त हो जाता है,
सूर्यकिरणशक्ति को खींच कर पारे के द्राव वाली मणि में १५ लिक्ष (डिग्री) माप में यथाविधि युक्त
कर दे, पश्चात् पारे के द्राव में सम्यक् उस शक्ति को प्रविष्ट कर दे, मणिद्वारा प्रेरित उस शक्ति को तथा
द्रवशक्ति को लेकर विशेषत सञ्जीक्षार द्राव में स्थित मणि में जोड़ दे, पश्चात् उस शक्ति को पूर्व की
भांति सञ्जीक्षार द्रावदर्पण के मूल में स्थित रेखा केन्द्र में नियुक्त करे ॥ १०६-११० ॥
तच्छक्तिं रुचिकादर्शस्स्वस्मिन् सन्धारयेत् (सन्धार्यते ? ) ततः ।
मुखदर्पणमारभ्य रुचिकान्तं यथाविधि ॥ १११ ॥
लक्ष्यं कृत्वा सप्ततिमाद्दर्शनालात् क्रमं यथा ।
तथैव रूपाकर्षणयन्त्रकेन्द्रान्तमन्तरे ॥ ११२ ॥
लक्ष्यं प्रकल्पयेत् सम्यग् रुचिकादर्शकेन्द्रतः ।
पश्चात् पारद्रवमणिशक्ती संयोजयेत् समम् ॥ ११३ ॥
विश्वक्रियादर्शवामकेन्द्रलक्ष्यात् प्रयत्नतः ।
दिग्देशरेखाकेन्द्रान्तं गणितोक्तेन वर्त्मना ॥ ११४ ॥
पश्चात् सच्याप्य तच्छक्ती तत्रत्याना स्फुटं यथा ।
कार्यकारणकर्त्तृ स्वरूपमाकृष्य वेगतः ॥ ११५ ॥
उक्त शक्ति को रुचिक आदर्श अपने में धारण कर लेता है, मुखदर्पण को आरम्भ कर रुचिक
दर्पण पर्यन्त यथाविधि लक्ष्य करके ७० वें आदर्श नाल से यथाक्रम वैसे ही रूपाकर्षण यन्त्र के केन्द्र तक
अन्दर लक्ष्य को रुचिकादर्श केन्द्र से बनावे, पश्चात् क्रियादर्श वामकेन्द्र के लक्ष्य से प्रयत्न से दिशा देश
रेखा केन्द्र तक गणित शास्त्र में कहे मार्ग से पारे के द्राववाली मणि की दोनों शक्तियों को समान रूप
से युक्त करे पश्चात् वे दोनों शक्तियां व्याप कर वहा के कार्यकारण कर्ता के स्वरूप को वेग से आकर्षित
करके—॥१११-११५ ॥
प्रतिबिम्बाकारयुक्ता सा शक्ति पूर्ववत् पुन ।
परा गतिमवाप्याथ मुखदर्पणकेन्द्रतः ॥ ११६ ॥
आंगम्य रुचिकद्रावमणौ संविशति स्वयम् ।
तामाकृष्यातिवेगेन मणिशक्तिस्स्वभावतः ॥ ११७ ॥
स्वस्मिन् तत्प्रतिबिम्बस्वरूपं सन्धार्यते*स्फुटम् ।
पश्चात् तत्रत्यरुचिकद्रावकस्स्वप्रभावतः ॥ ११८ ॥
- व्यत्ययेन कर्मप्रत्यय कर्तरि ।