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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

शक्त्यधिकरणम् ] [ ७५
विमान की विचित्र गति आदि ३२ क्रियाओं के सम्बन्ध में एक ही चित्रिणी शक्ति पर्याप्त है
यह शास्त्र में निर्णय है । इस प्रकार अनुभव से और शास्त्र से स्फोटायन आचार्य मानता है ॥३१॥
क्रियासारेपि-क्रियासार में भी कहा है—
चित्रिणी नामिका विद्युच्छक्तिस्सप्तदशात्मिका ।
एकैव यानद्वात्रिंशत्कार्यनिर्वहणक्षमा ॥३२॥ इत्यादि ॥
चित्रिणी नामक विद्युत्-शक्ति १७ रूप में है या १७ वीं है वह अकेली ही विमान के ३२
कार्यों के निर्वाहार्थ समर्थ है ॥३२॥
तदन्तर्भावात् सप्तैवेति भरद्वाजः ॥ अ० ४, सू० ४॥
बो० वृ०
उक्त्वा सूत्रद्वयैरेव † मतान्तरमत परम् ।
स्वसिद्धान्तद्योतनार्थं सूत्रोयं परिकीर्तित ॥३३॥
तदर्थबोधकपदान्यस्मिन् पञ्च भवन्ति हि ।
तत्रादिमपदादन्तर्भावित्व सप्त शक्तिषु ॥३४॥
पूर्वसूत्रोक्तशक्तीना सम्यक् सन्दर्शित भवेत् ।
तथैव सप्तशक्तीना प्रधानत्वं द्वितीयत ॥३५॥
उक्तार्थनिर्धारणं तु तृतीयपदत कृत ‡ ।
चतुर्थपदतस्सम्यगित्थम्भाव प्रदर्शित ॥३६॥
तथैव पञ्चमपदाद् भरद्वाजमहामुनिम् ।
स्वसिद्धान्तप्रवक्तार सूचित ❄ भवति क्रमात् ॥३७॥
पदार्थमेव कथित विशेपार्थोधुनोच्यते ।
सद्योजातसमुद्भूतपञ्चशक्तिषु शास्त्रत ॥३८॥
प्रधानत्वेन सम्प्रोक्ता पञ्चराशक्तिरेव हि ।
अग्नेस्सकाशादुत्पत्तिस्स्फुलिङ्गाना यथा भवेत् ॥३६॥
तथैव चालनादीना पञ्चराशक्तितस्स्मृत ।
दो सूत्रों से अन्यों के मत को कहकर इससे आगे अपना सिद्धान्त प्रकट करने को यह सूत्र
कहा है, उसके अर्थबोधक पद इसमें पांच हैं उनमें आदिम पद से अन्तर्भाव सात शक्तियों में ही होता
है । पूर्व सूत्र में कही शक्तियों का भलीभांति ज्ञान या ज्ञापन हो अतः दूसरे पद से उन ७ शक्तियों की
प्रधानता कही तीसरे पद से कहे अर्थ का निर्धारण और चतुर्थ पद से इत्थम्भाव ऐसा कथन पुन. पांचवें
पद से भरद्वाज मुनि सिद्धान्त प्रवक्ता अपने को सूचित किया किया है । इस प्रकार पदों का अर्थ कह
दिया अब विशेष अर्थ कहा जाता है । सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न पांच शक्तियों में शास्त्रद्वारा प्रधानता
† 'सूत्रद्वये ' वचनव्यत्यय । ‡ लिङ्गव्यत्यय । ❄ व्यत्ययो वा लेखकप्रमादो वा