बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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मतान्तर विचारार्थ इस सूत्र में चार पद कहे, विमान की विचित्र गतियों के करने वाली
शक्तिया सद्योजातात्मकयन्त्र से उत्पन्न हुई ५ हैं यह नारायण मुनि ने अपने अनुभव से कहा है । उसके
मत के अभिप्राय को इस सूत्र में प्रदर्शित किया है उनमें आदिम पद से शक्तिस्वरूप दिखलाया,
संख्या से भेद दूसरे पद से कहा, मतान्तर—अन्य मत का प्रकाश तीसरे पद से, प्रवर्तकमुनि चतुर्थ
पद से दिखलाया, इस प्रकार पदार्थ कहे विशेषार्थ अब कहा जाता है, सद्योजातयन्त्र से उत्पन्न हुई पांच
प्रकार की शक्तिया कही हैं इन से विमान की विचित्र गति क्रियाएं होवें ॥ २०-२५ ॥
तदुक्तं शक्तिसर्वस्वे—वह कहा है शक्तिसर्वस्व ग्रन्थ में—
चालनगालनपञ्जरस्फोरणवक्रापसर्पणाञ्चेति ।
गतिवैचित्र्यविधान यानस्योक्ता महर्षिभिशास्त्रे ॥२६॥ इत्यादि
चालन, गालन, पञ्जरप्रेरण, वक्रापसर्पण, विचित्रगति करना ये पाच बातें विमान की महर्षियों
ने कही हैं
चित्रिण्येवेति स्फोटायनः ॥ अ० ४, सू० ३ ॥
बो० वृ०
स्फोटायनमतं वक्तु सूत्रोय परिकीर्तित ।
तदर्थबोधकपदान्युक्तान्यस्मिन् चतु ❋ क्रमात् ॥२७॥
तत्रादिमपदाच्छक्तिनिर्णयस्सम्प्रदर्शित ।
द्वितीयपदतश्शक्तेर्निर्धारणमुदाहृतम् ॥२८॥
तथेत्थम्भावमुक्त स्यात् तृतीयपदत क्रमात् ।
मतप्रवर्तकमुनिश्चतुर्थपदत स्मृत ॥२६॥
एष पदार्थ कथितो विशेषार्थ प्रकीर्त्यते ।
विमानगतिवैचित्र्यकार्यनिर्वहणक्रिया ॥३०॥
एकया चित्रिणीशक्त्या भवत्येवेति विनिर्णय ।
यह सूत्र स्फोटायन के मत को कहने के लिये कहा गया है, उसके बोधक पद क्रम से चार
कहे हैं। उनमें आदिम पद से शक्ति का निर्णय दिखलाया दूसरे पद से शक्ति का निर्धारण बतलाया,
तीसरे पद से इत्थम्भाव कहा गया, चौथे पद से मतप्रवर्तक मुनि कहा है। इस प्रकार पदार्थ कह दिया
विशेषार्थ कहा जाता है, विमान की विचित्र गति कार्य करने वाली क्रिया केवल एक चित्रिणी शक्ति से
होती है ऐसा निश्चय है ॥ २७–३०॥
तदुक्तं शक्तिसर्वस्वे—वह कहा है शक्तिसर्वस्व में—
वैमानिकगतिवैचित्र्याद्विद्वात्रिंशत्क्रियायोगे ।
एकैव चित्रिणीशक्त्यलमिति शास्त्रे विनिर्णित भवति ।
इत्यनुभवतश्शास्त्राच्च मन्यते स्फोटायनाचार्य. ॥६१॥ इत्यादि ॥
❋ विभक्ते लुक् आर्षं ।