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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 368 में से

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पृष्ठ 94

प्रथम रजिस्टर कापी संख्या ३ वस्तुत कापी संख्या ५ —
तत्र तावच्छौनकसूत्रम्—विमानस्थ यन्त्र की शक्तियों के सम्बन्ध में शौनक सूत्र है—
अदिनिक्ष्मावाय्वर्केन्द्वमृताम्बरशक्तयस्सप्त वैमानिका इति तासा नामान्य-
नुक्रमिष्याम । उद्गमा पञ्जरा सूर्यशक्त्यपकर्षिणी विद्युद्द्वादशका परशक्त्यप-
कर्पिणी† कुण्टिणी मूलशक्तिश्चेति ॥
अदिति-अग्नि, क्ष्मा—पृथिवी, वायु, सूर्य, इन्दु-चन्द्रमा, अमृत-जल, अम्बर—आकाश, ये
७ शक्तियां है जिन के नाम कहेंगे—कहते हैं जो कि उद्गमा, पञ्जरा, सूर्यशक्त्यपकर्षिणी,विद्युद्द्वादशका
परशक्त्यपकर्षिणी, कुण्टिणी, मूलशक्ति ॥
सौदामिनीकलायामपि—सौदामिनीकला में भी कहा है—
सू० मलयसवनशक्तयो वैमानिका इति ॥
बो० गृ०
मकारोदितिशक्तिस्स्यादुद्गमेति प्रचक्षते ।
लकार पृथिवीशक्ति पञ्जरेत्यभिधीयते ॥ १ ॥
यकरो वायुशक्तिस्स्यात्सूर्यशक्त्यपकर्षिणी ।
रकारस्सूर्यशक्तिस्स्याद् विद्युद्द्वादशकस्मृत ॥२॥
सकारस्त्विन्दुशक्तिस्स्यात् परशक्त्यपकर्षिणी ।
जलशक्तिर्वकारस्स्यात् कुण्टिणीत्यभिधीयते ॥ ३ ॥
नकारोम्बरशक्तिस्स्यान्मूलशक्तिरिति स्मृत । इत्यादि ।
म, ल, य, र, स, व, न शक्तियां विमान की है । म अदिति—उद्गमा है ऐसा कहते हैं ल
पृथिवी-पञ्जरा कही जाती है, य वायु--सूर्यशक्त्यपकर्षिणी, र सूर्य—विद्युद्द्वादशक शक्ति कही है, स
इन्दु-परशक्त्यपकर्षिणी, व जलशक्ति—कुण्टिणी कही जाती है, न अम्बर-मूलशक्ति कही है॥१-३।
एवमुक्त्वा सप्तशक्तिस्वरूप शास्त्रत स्फुटम् ।
तत्तत्कृत्य यथाशास्त्र सग्रहेण निरूप्यते ॥ ४ ॥
इस प्रकार ७ शक्तियों के स्वरूप को शास्त्र से स्फुट कहकर उनके कार्य शास्त्र से संक्षेप से कहे
जाते हैं ।
† 'परशक्त्यपकर्षिणी' शब्द छूट गया हस्तपाठ में ।