सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 103

८० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विश्वोदरलोहमयान् दण्डनालान् यथाक्रमम् ।
पूर्वोक्तदिक्प्रदर्शनरेखासंस्थितशक्तिषु ॥ ७९ ॥
सन्धार्यावरणं कुर्यात् तस्योपरि तत परम् ।
मूले मध्ये तथा चास्ये दण्डनालान्तरस्य हि ॥ ८० ॥
मध्य केन्द्र के सामने वाले भाग से लेकर रेखा तक शास्त्र के क्रम से अन्दर के आवरण में
पांच घूमने वाली कीलों से युक्त खोलने बन्द करने की कीलों के अन्तर्गत और औदुम्बर—ताम्बे, आर—
मुण्ड लोहे, आर—पित्तल, नाग-सीसे की पट्टिकाओं से युक्त ६ अङ्गुल माप बनाए हुए विश्वोदर लोहे
के बने दण्ड नालों को यथाक्रम पूर्व कही दिशा को दिखाने वाली रेखाओं में स्थित शक्तियों में लगा
कर उसके ऊपर आवरण करे फिर दण्डनाल के भीतरी भाग के मूल में तथा मध्य में—॥ ७६--८० ॥
रुचिर भास्कर विश्वक्रियादर्शनदर्पणम् ।
सन्धारयेद् दृढ तत्तत्कीलकैशशास्त्रमानत ॥ ८१ ॥
सकीलविद्युद्यन्त्र तु दण्डमूले नियोजयेत् ।
आरारनालसङ्क्लृप्तकीलसमावर्तक पुन ॥ ८२ ॥
कृत्वा समन्ताद् यन्त्रस्य विमाने स्थापयेद् दृढम् ।
कान्तकाचमणीन् पश्चान्मूले मध्ये तथोर्ध्वके ॥ ८३ ॥
दण्डान्तरे वा पार्श्वे वा तत्तत्स्थाने नियोजयेत् ।
किरणप्रकाशाकर्षणदर्पण मूलकेन्द्रके ॥ ८४ ॥
वार्तुल्यं चषकाकार दृढ सस्थापयेत् तत ।
रूपाकर्षणयन्त्र तु तत्पश्चाद्भागतो न्यसेत् ॥ ८५ ॥
सुन्दर तथा प्रकाश करने वाले विश्वक्रियादर्शन दर्पण को उन उन कीलों से शास्त्रमान से
दृढ़ रूप में लगावे । दण्ड के मूल में कीलसहित विद्युद्यन्त्र लगावे । आरार ? आर—मुण्ड लोहे, पुन
आर—पित्तल की नाल से सम्बद्ध घूमने वाली कील को बना कर यन्त्र के सब ओर विमान में स्थापित
कर दे । पश्चात्-क्रान्त काच की बनी मणियों को मूल में मध्य में तथा ऊपरले भाग में दण्ड के अन्दर
या पार्श्व में या उस उस स्थान में नियुक्त कर दे । किरण-प्रकाशाकर्षण दर्पण गोल पात्र जैसे को मूल
केन्द्र में संस्थापित कर दे फिर रूपाकर्षण यन्त्र को तो उसके पिछले भाग में रखे ॥ ८१--८५ ॥
इति विश्वक्रियादर्शनयन्त्रमुक्त समासतः ।
तत्प्रयोग प्रवक्ष्यामि सग्रहेण यथामति ॥ ८६ ॥
दण्ड प्रसारयेदादौ कीलीचालनतस्तथा ।
मूले तस्य क्रियादर्शदर्पण योजयेद् दृढम् ॥ ८७ ॥
तन्मूले पारदद्राव मध्यकेन्द्रसम यथा ।
कीलकात् सन्यसेत् तस्मिन् मणिमेक नियोजयेत् ॥८८॥