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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

दर्पणाधिकरण ] [ ८१
रन्ध्रतन्त्रीन् द्रावशुद्धान् किरणाकर्षकान् तत ।
एतन्मणिमुखात् पूर्वमण्यन्त योजयेत् क्रमात् ॥ ८६ ॥
पुनस्तद्दण्डान्तरीयमध्यभागे दृढ यथा ।
योजयेद् भास्करादर्शं सार्षपे(फे?)न सुशोधितम् ॥६०॥
इस प्रकार विश्वक्रियादर्श यन्त्र संक्षेप से कह दिया, उसका प्रयोग संक्षेप से यथामति
कहूँगा । प्रथम खोल चला कर दण्ड-नालदण्ड को खोल दे उसके मुख में क्रियादर्शदर्पण लगा दे, उसके
मूल में पारे का द्राव मध्य केन्द्र के समान की-पेंच से स्थापित कर दे, उसमें एक मणि नियुक्त कर दे,
द्राव से शुद्ध किरणाकर्षक सिद्ध तारों को इस मणिमुख से पूर्व मणि के अन्त तक युक्त कर दे फिर
उस दण्ड के भीतरी मध्य भाग में--सरसों के तेल से शोधित भास्कर दर्पण-सूर्यकान्त को
लगावे ॥ ८६-६० ॥
पूर्ववत्तन्मूलभागे विन्यसेद् रुचिकद्रवम् ।
तस्मिन्नेकमणि कीलतन्त्रीयोगात् सुनिक्षिपेत् ॥ ६१ ॥
तथैव रुचिकादर्शं तन्मूले स्थापयेद् दृढम् ।
सूर्यस्य किरणाकर्षणदर्पणं मूलकेन्द्रके ॥ ६२ ॥
चषकाकारतस्सम्यग्वातुलं ह्य योजयेत् तथा ।
रूपाकर्षणयन्त्र तत्पश्चाद्भागे प्रकल्पयेत् ॥ ६३ ॥
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