बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रत्यक्षवत् तत्स्वरूपं विशदीक्रियते* स्फुटम् ।
रूपाकर्षणयन्त्रेण पश्चात् तत्प्रतिबिम्बकम् ॥ ११९ ॥
समादाय विशेषेण सप्तमाभ्रकदर्पणात् ।
प्रतिबिम्बस्वरूपेण कर्तृ कार्यादिकान् क्रमात् ॥ १२० ॥
वह प्रतिबिम्बाकारयुक्त शक्ति पूर्व की भांति परा गति को प्राप्त होकर मुखदर्पण केन्द्र से आकर
रुचिक द्राववाली मणि में स्वयं घुस जाती है, उसे मणिशक्ति स्वभावतः अतिवेग से अपने अन्दर
आकर्षित कर प्रकट रूप में प्रतिबिम्बस्वरूप धारण कर लेती है, पश्चात् वहां के रुचिक द्राव स्वप्रभाव से
प्रत्यक्ष जैसा उसके स्वरूप को विशद करता है, पश्चात् रूपाकर्षण यन्त्र से उस प्रतिबिम्ब को सातवें
अभ्रक दर्पण से लेकर प्रतिबिम्बस्वरूप से कर्ता कार्य आदि को क्रम से—॥ ११९-१२० ॥
द्रष्टुं यथावद् योग्यं स्यात् पृथक् पृथक् स्वरूपतः ।
तस्मिन् दृष्ट्वा विमानस्य सम्भवापायसञ्चयान् ॥ १२१ ॥
विज्ञाय शास्त्रतस्सम्यक् सर्वापायनिवारणम् ।
कृत्वा निर्मूलमथ तद्विमानं प्रेषयेत् पुनः ॥ १२२ ॥
एतत्कायोपयोगार्थं वर्णितं शास्त्रतः क्रमात् ।
विश्वक्रियाकर्षणदर्पणयन्त्रं समासतः ॥ १२३ ॥
पृथक् पृथक् स्वरूपतः यथावत् देखने योग्य हो जावे, उसमें विमान के सम्भावनीय–होने
वाले अनिष्ट सञ्चयों को देख कर शास्त्र से सब अनिष्टों के निवारणप्रकार को जान कर पुन निर्मूल कर
उस विमान को चलावे । इस कार्य के उपयोगार्थ शास्त्र से क्रम से विश्वक्रियाकर्षण दर्पण यन्त्र संक्षेप से
वर्णित किया है ॥ १२१-१२३ ॥
- व्यत्ययेन कर्तरि कर्मप्रत्यय ।