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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 368 में से

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पृष्ठ 108

पूना फोटो संख्या ४ वस्तुत. हस्तलेख प्रथम रजिस्टर कापी संख्या ६—
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रनिर्णयः—अब शक्त्याकर्षण दर्पणयन्त्र का निर्णय है--
इत्युक्त्वा विश्वक्रियाकर्षणयन्त्रमत परम् ।
शक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमत्र प्रचक्षते ॥ १ ॥
इस प्रकार विश्वक्रियाकर्षण यन्त्र को कह कर इससे आगे शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र यहां
कहते हैं ॥ १ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
वियत्तरङ्गपवनरौद्रीसञ्जातशक्तय. ।
ऋतुकालानुसारेण खेटयानविनाशका ॥ २ ॥
तास्समाकृष्य वेगेन नाशयित्वा खमण्डले ।
यत् स्वशक्त्या पालयति व्योमयानान् विशेषत ॥३॥
तच्छक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमिति कीर्त्यते ।
वियत्तरङ्ग - आकाश के स्तरों मण्डलों और पवन रौद्री-वायु की वेग पंक्तियों से उत्पन्न शक्तियां
ऋतुकाल के अनुसार विमान का विनाश करने वाली हैं । उन्हें अपने वेग से खींच कर आकाश में नष्ट
करके जो अपनी शक्ति से विमानों की रक्षा करता है वह शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र कहा जाता है ॥२-३॥
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है--
रौद्रवाताकाशवीचिसञ्जाता विश्वरूपका ॥ ४ ॥
शक्तयस्त्रिविधा प्रोक्ता व्योमयानविनाशका ।
तन्निवृत्य स्वशक्त्या यद्विमानं पालयेत् स्वत ॥ ५ ॥
तच्छक्त्याकर्षणदर्पणयन्त्रमित्युदीर्यते ।
यन्त्रस्वभावमुक्त्वैवं सग्रहेण यथामति ॥ ३ ॥
अथ तद्यन्त्ररचनाविधिरत्र निरूप्यते ।
वितस्तित्रयमायामं वितस्तिद्वयविस्तृतम् ॥ ७ ॥
पीठ प्रकल्पयेच्छुद्धक्रौञ्चलोहेन शाश्वत ।