बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयन्त्राधिकरणम् ] [ ७७
एकशक्त्या सर्वकार्यनिर्वाहस्सर्वथा न हि ।
प्रमादाद् यदि कुर्वीत तदनर्थाय केवलम् ॥५०॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूर्वोक्तास्सप्त शक्तयः ।
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाहे संयोज्या इति निर्णयः ॥५१॥
कार्यभेद प्रदर्शन से वह असङ्गत ही है, विमान का ऊपर गमन उद्गमा शक्ति से कहा है
इस कथनके आरम्भ से मूलशक्ति के लिये अत्यन्त स्वभाव से पूर्वोक्त ७ शक्तियों का कार्यनिर्वाह क्रम
पृथक् पृथक् क्रियासार ग्रन्थ में प्रमाण से निर्णय करने से ३२ कार्य निर्वाह कसे एक शक्ति से हो, एक
शक्ति से कार्यनिर्वाह सर्वथा नहीं हो सकता, प्रमाद् से यदि करे तो केवल अनर्थ के लिये हो, अतः
सब प्रयत्न से पूर्वोक्त ७ शक्तिया ३२ कार्य निर्वाह में लगाने योग्य हैं ॥ ४७–५१ ॥
अथ यन्त्राधिकरणम्
अब यन्त्रों का अधिकरण प्रस्तुत है ।
तथोपयन्त्राणि ॥ अ० ५ सू० १ ॥
बो० वृ०
यथोक्ताश्शक्तयः पूर्वसूत्रे यानक्रियाविधौ ।
तथैव यानोपयन्त्राण्यस्मिन् सम्यग् विविच्यते ॥ ५२ ॥
तदर्थबोधकपद्द्वयमत्र निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् रीतिवाचकस्सम्प्रदर्शितः ॥ ५३ ॥
द्वितीयपदतो यानाङ्गोपयन्त्राणि च क्रमात् ।
पदार्थमेव कथितं विशेषाथौधुनोच्यते ॥ ५४ ॥
याभिर्विमानो द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाहको भवेत् ।
तच्छक्तयः क्रमात् पूर्वसूत्रे सम्यक् प्रदर्शिताः ॥ ५५ ॥
तत्तत्कार्योपकरणा ऽङ्गोपयन्त्रान्यथाक्रमम् ।
द्वात्रिंशदिति यानस्य सूत्रे ऽस्मिन् सम्प्रगृह्यते ॥ ५६ ॥
विमान क्रियाविधि के निमित्त पूर्वसूत्र में जैसे शक्तियां कही हैं वैसे ही विमानयान के उप-
यन्त्रों का इस सूत्र में भली प्रकार विवेचन किया जाता है । उसके अर्थबोधक दो पद यहां निरूपित किए
हैं, उनमें आदिपद रीतिवाचक कहा है दूसरे पद से विमान के अङ्गोपयन्त्र क्रम से कहे हैं । इस प्रकार
पदों का अर्थ कह दिया अब विशेष अर्थ कहा जाता है। जिन शक्तियों से विमान ३२ कार्यों का निर्वा-
हक होवे—होता है वे शक्तियां पूर्वसूत्र में भली प्रकार दिखलाई गई, उन कार्यों के उपकरण अङ्गोपयन्त्र
विमान के यथाक्रम ३२ इस सूत्र में दिखलाए जाते हैं ॥ ५२–५६ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह कथन क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
विमानाङ्गोपयन्त्राणि द्वात्रिंशदिति शास्त्रतः ।
यथोक्तं यन्त्रसर्वस्वे भरद्वाजेन धीमता ॥ ५७ ॥