बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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से पञ्जराशक्ति ही कही है, अग्नि से स्फुलिङ्ग -चिनगारियों की उत्पत्ति जैसे होवे वैसे ही चालन
आदियों की उत्पत्ति पञ्जराशक्ति से कही है ॥ ३७–३९ ॥
तदुक्तं शक्तिबीजे—वह कहा है शक्तिबीज ग्रन्थ में—
सद्योजातसमुद्भूतपञ्जराशक्तित क्रमात् ।
उद्भवञ्चालनादीनामुक्त तच्छास्त्रवित्तमै ॥४०॥
सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न हुई पञ्जराशक्ति से क्रमशः चालनादि शक्तियों की उत्पत्ति उस
शास्त्र के विद्वानों ने कही है ॥४०॥
सद्योजातात् समुत्पन्नपञ्जराशक्तित क्रमात् ॥४१॥
चालनाद्यास्समुद्भूता क्रमाच्चत्वारिशक्तय ।
इति शक्तिकौस्तुभे ।
सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न पञ्जराशक्ति से क्रम से चालन आदि प्रकट हुईं क्रम से चार
शक्तियां हैं । यह शक्ति-कौस्तुभ ग्रन्थ में कहा है ॥४१॥
एतेन पञ्जरोद्भूतशक्तयश्चालनादय ॥४२॥
तदंशत्वात् तत्स्वरूपा एवेत्युक्तास्स्फुलिङ्गवत् ।
तस्मात् प्रधानत्वमपि तासामत्र प्रदर्शितम् ॥४३॥
सा पञ्जरा चित्रिणी च पूर्वोक्तसप्तशक्तिषु ।
अन्तर्भावात् प्रधानत्वेनोक्ता एव स्वभावत ॥४४॥
यतस्तयो प्रधानत्व सप्तशक्तिषु वर्णितम् ।
ततस्समञ्जसमिति मतद्वयमपि स्मृतम् ॥४५॥
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाहे पूर्वोक्तसप्तशक्तिषु ।
एकैकशक्तेरेवालमिति केचिद् वदन्ति हि ॥४६॥
इस कारण पञ्जराशक्ति से प्रकट हुई चालना आदि शक्तियां उसके अंश होने से तत्स्वरूप
ही स्फुलिङ्ग जैसी कही हैं । अत उनकी प्रधानता भी यहां दिखलाई है, उन पूर्वोक्त ७ शक्तियों में यह
पञ्जरा और चित्रिणी अन्तर्भूत होने से प्रधानता से स्वभावतः कही हैं, जिसे सात शक्तियों में प्रधान
वर्णित किया है इससे दोनों मत ठीक है यह कहा है, ३२ कार्य निर्वाह में पूर्वोक्त ७ शक्तियों में एक-
एक शक्ति ही पर्याप्त है ऐसा कुछ कहते हैं ॥ ४२–४६ ॥
तदसङ्गतमेव स्यात् कार्यभेदप्रदर्शनात् ।
विमानस्योध्वंगमनमुद्गमाशक्तितस्मृतम् ॥४७॥
इत्यारभ्य क्रमान्मूलशक्तयैत्यन्त स्वभावत ।
पूर्वोक्तसप्तशक्तीना कार्यनिर्वहणक्रम. ॥४८॥
पृथक् पृथक् क्रियासारे निर्णितत्वात् प्रमाणत ।
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाह कथं स्यादेकशक्तित. ॥४९॥