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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 368 में से

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पृष्ठ 109

[ ८६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वेगपंक्ति पूर्ण वात और आकाश के तरङ्गरूप मण्डलों से उत्पन्न तीन प्रकार की विषशक्तियां
विमान को नष्ट करने वाली कही हैं। उन्हें अपनी शक्ति से निवृत्त करके जो विमान की स्वत रक्षा करे
वह शक्त्याकर्षण दर्पण यन्त्र कहा है । यन्त्र के स्वभाव को इस प्रकार संक्षेप से यथामति कह कर अब
उस यन्त्र की रचनाविधि यहां निरूपित की जाती है । तीन बालिश्त लम्बा दो बालिश्त चौड़ा पीठ शुद्ध
क्रौञ्च लोहे से शास्त्र से बनावे ॥ ४-७ ॥
द्वाविंशदङ्गुलायाममङ्‌गुलत्रयविस्तृतम् ॥ ८ ॥
सप्तविंशतिमादर्शकृतशङ्कुं यथाविधि ।
तन्मध्ये स्थापयेत् पश्चात् तस्य पूर्वदिशि क्रमात् ॥६॥
केन्द्रत्रय कल्पयित्वा तथैवोत्तरदक्षिणो ।
द्वौ द्वौ केन्द्रौ तथा कुर्यात् समरेखाप्रमाणत ॥ १० ॥
पूर्ववत् पश्चिमे केन्द्रत्रय कुर्यात् यथाविधि ।
प्रदक्षिणावर्तकीलान् स्थापयेत् प्रतिकेन्द्रके ॥ ११ ॥
पश्चात् सप्तोत्तरशततमादर्शकृतान् दृढान् ।
नालान् सन्धारयेत् पश्चात् सतन्त्रीन् द्रवशोधितान् ॥१२॥
१२ अंगुल लम्बे ३ अंगुल चौड़े २७ वें आदर्श से किये हुए शङ्कु को उसके मध्य मे यथा-
विधि स्थापित करके फिर उसकी पूर्वदिशा मे क्रम से तीन केन्द्र बनाकर वैसे ही उत्तर दक्षिण में दो दो
केन्द्र समान रेखा में करे, पूर्व की भांति पश्चिम में तीन केन्द्र यथाविधि करे । प्रत्येक केन्द्र में घूमने
वाली कीलों—पेंचों को स्थापित करे पश्चात् १०७ वें आदर्श से बने दृढ़ नालों को तारोंसहित द्रव से
शोधित लगावे—॥ ८-१२ ॥
प्रदक्षिणावर्तकीलमूलस्थानावधि क्रमात् ।
च (छ ?) षकाकारवत्पञ्चदशागुलप्रमाणत ॥ १३ ॥
पूर्वोक्तदर्पणात् सम्यक्कृतपात्र यथाविधि ।
सस्थापयेच्छङ्कुमुलस्थकीलकोपरि पूर्वके ॥ १४ ॥
वितस्त्यायाम सङ्क्लृप्तं विस्तृते तथाविधम् ।
तथैवादर्शगोलं च छिद्रत्रयसमन्वितम् ॥ १५ ॥
स्थापयेन्मध्यकेन्द्रस्थकीलकोपरि पूर्ववत् ।
द्वादशागुलायाम द्वादशागुलविस्तृतम् ॥ १६ ॥
त्रिकोणकुण्ड्याकारेण कृतमादर्शंत क्रमात् ।
तृतीयकेन्द्रस्थकीलोपरि सस्थापयेत् तथा ॥ १७ ॥
कान्तोदुम्बरसम्मिश्रचक्रद्वय क्रमात् ।
घूमने वाली कील की अवधि तक । पात्र—लोटा गिलास के आकार जैसा १५ अंगुल माप में
पूर्वोक्त दर्पण से सम्यक् यथाविधि बने पात्र को शंकुमूलस्थ पूर्व कील – पेंच के ऊपर बालिश्त भर लम्बा