बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
२४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शब्दकेन्द्रमुखस्थानं वामभागे निरूपितम् ।
विद्युद्द्वा (द्वा?) दशकस्थानं विमानेशान्यकोणके ॥१३॥
गुहागर्भदर्श यन्त्र का स्थान कुक्षिमुख में क्रमश: कहा है, तमोयन्त्र (अन्धकार करनेवाले
यन्त्र ) का स्थान वायव्य केन्द्र में होना चाहिये । पञ्चवातास्कन्धनाल का स्थान पश्चिम केन्द्र में हो ।
रौद्रीदर्पण स्थान वातस्कन्ध नामक कील में विमान के अध केन्द्र में यथाक्रम जानना चाहिये । शब्द
केन्द्रमुख स्थान बाम भाग में निरूपित किया है बारह विद्युत् का स्थान विमान के ऐशानीकोण में होना
चाहिये ॥ १०–१३॥
प्राणकुण्डलिसंस्थानं यानमूले निरूपितम् ।
भवेच्छक्त्युद् गमस्थानं नाभिकेन्द्रे तथैव च ॥१४॥
वक्रप्रसारणस्थानं विमानाधारपार्श्वके ।
मध्यकेन्द्रे भवेच्छक्तिपञ्जरस्थानकीलकम् ॥ १५ ॥
स्थानं शिरःकीलाख्यं भवेद्यानशिरोपरि । ❋
शब्दाकर्षणयन्त्रस्य स्थानं पश्चिमपार्श्वके ॥ १६ ॥
रूपाकर्षणयन्त्रस्य स्थानं यानभुजे क्रमात् ।
पटप्रसारणस्थानं यानाधोभागमध्यमे ॥ १७ ॥
प्राणकुण्डलीस्थान ( गतियन्त्र ) यान के मूल में निरूपित किया है तथा शक्त्युद्गमस्थान
नाभिकेन्द्र में कहा है । वक्रप्रसारण स्थान विमानाधारपार्श्व में और शक्तिपञ्जरस्थान कील मध्य केन्द्र में
होना चाहिये । शिरःकील नामक स्थान यान के शिर के ऊपर हो, शब्दाकर्षण यन्त्र का स्थान पश्चिम
पार्श्व में होना चाहिये । पटप्रसारणस्थान यान के अधोभाग के मध्य में होना चाहिये ॥ १४-१७॥
दिशाम्पतियन्त्रस्थानं वामकेन्द्रभुजे विदुः ।
पट्टिकाक्रमसस्थानं (न ?) यानावरणमध्यमे ॥ १८ ॥
विमानस्योपरि सूर्यस्य शक्त्याकर्षणपञ्जरम् ।
अपस्मारधूमस्थानं सन्धिनालमुखोत्तरे ॥ १९ ॥
अधोभागे स्तम्भनारुख्ययन्त्रस्थानमितीर्यते ।
वैश्वानराख्यनालस्य स्थानं नाभिमुखे विदुः ॥ २० ॥
इत्येकत्रिंशत्तिकस्थाननिर्णयः परिकीर्तितः ।
दिशाम्पति (दिशाओं के पति) यन्त्र का स्थान वामकेन्द्रभुजा में जानें पट्टिकाभ्रक
(अभ्रक की पट्टिका) का स्थान यानावरण के मध्य में होना चाहिये । विमान के ऊपर सूर्य की शक्ति
को आकर्षण करने वाला पञ्जर हो, अपस्मार धूम का स्थान सन्धिनालमुख के उत्तर भाग में होना
चाहिये । अधोभाग में स्तम्भन नामक यन्त्र का स्थान कहा गया है और वैश्वानर नामक नाल का स्थान
नाभिमुख में जाने ॥ यह एकत्तीस अङ्गस्थानों का निर्णय कहा ॥ १८-२० ॥
—:०:—
❋ 'शिरोपरि' में 'शिर -उपरि' विसर्गलोप होकर सन्धि छन्द की पूर्ति के लिये है ।
कापी संख्या २—
अथ वस्त्राधिकरणम् ।
अब वस्त्र का अधिकरण प्रस्तुत करते हैं ।
यन्तृप्रावरणीयौ पृथक् पृथगृत्तुभेदात् ॥ अ० १ सू० ६ ॥
बो० वृ०
वस्त्रप्रबोधकपदान्यन्तॄ णामृतुभेदतः ।
उक्तानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् तेषामर्थो विविच्यते ॥ १॥
धारणाच्छादनवस्त्रप्रभेदो यन्तॄणा क्रमात् ।
सूत्रादिमपदेनोक्त द्वितीयपदतस्तथा ॥ २ ॥
तेषा सस्कारतद्वर्णगुणजात्यादय स्मृता ।
सूत्रतृतीयपदत कालभेदो निरूपित ॥ ३ ॥
इत्थ सूत्रार्थमुक्तवाथ विशेषार्थो निरूप्यते ।
अनन्तसूर्यकिरणशक्तिवैचित्र्यभेदत ॥ ४ ॥
वसन्ताद्याष्षडृतव प्रभवन्त्यदितेर्मुखात् ।
यजुराण्यके सूर्यानन्तत्वप्रतिपादने ॥ ५ ॥
यद् द्याव इन्द्र ते † शतमितिवाक्याच्छ्रु तिर्जगौ ।
ऋतुभेद से विमानचालक यात्रियों के वस्त्रों के प्रबोधक पद तीन सूत्र में कहे हैं उनके
अर्थ का विवेचन किया जाता है । यात्रियों के पहिनने और ओढने का वस्त्रभेद क्रम से सूत्र के
आदिम पद से कहा दूसरे पद से संस्कार उसके वर्ण गुण जाति आदि कहे हैं, तीसरे पद से कालभेद
कहा है इस प्रकार सूत्रार्थ कह कर विशेष अर्थ निरूपित किया जाता है, अदिति-व्यात अग्नि के मुख
से एवं अनन्त सूर्यकिरण शक्तियों की विचित्रता के भेद से वसन्त आदि छः ऋतुएं होती हैं । यजुर्वेद
के आरण्यक में सूर्य किरणों की अनन्तता प्रतिपादन होने से “यद् द्याव इन्द्र ते शतम्” ( तै० आ० १ ।
७ । ५) हे इन्द्र सूर्य तेरी किरणें सैकड़ों सहस्रों हैं † । इस प्रकार वाक्य श्रुति ने गान किया-कहा
है ॥ १-५ ॥
† “शत बहुनाम” ( निघ० )
२६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तस्मादनन्तसूर्याणामंशुशक्तिसमाकुलात् ।
विषामृतविभागेन भिद्यन्ते ऋतुशक्तयः ॥ ६ ॥
छेदिनी रक्तपामेधस्सिराहार्यादय क्रमात् ।
पञ्चविंशतिसंख्याका ऋतूना विषशक्तय ॥ ७ ॥
त्वङ् मांसमेधामज्जास्थिस्नायुरक्तरसादिकान् ।
वेरबीजान् नश्यन्ति खपथे यानयन्तॄणाम् ॥ ८ ॥
तस्मात्तद्वेरबीजादिरक्षणार्थं कपर्दिना ।
ऋतुशक्त्यनुसारेण वस्त्रभेदा निरूपिता ॥ ६ ॥
अत. अनन्त सूर्यों के शक्तिसमूह से विष और अमृत के विभाग से ऋतुशक्तियां भिन्न-भिन्न
हो जाती हैं । छेदिनी अङ्गछेदन करनेवाली, रक्तपा-रक्त पीनेवाली, मेधा-मद मांस चिकनाई सिरा आहार
वाली क्रम से सख्या में ऋतुओं की विषशक्तियां है जो कि आकाशमार्ग में विमानयात्रियों के त्वचा
मांस मेद मज्जा-चर्बी हड्डी नाडो रक्त सिरा आदि वेर वोजों-शरीर के तत्त्वों को नष्ट करती हैं । अत
शरीर के तत्त्वों की रक्षा के अर्थ कपर्दी ने ऋतुशक्ति के अनुसार वस्त्रों के भेद निरूपित किये हैं ।६-६।
उक्तं हि पटसंस्काररत्नाकरे—कहा ही है पटसंस्कार रत्नाकर ग्रन्थ में—
पट्टकार्पासशैवाललोमाभ्रकत्वगादिकान् ।
सप्तविंशतिसंस्कारशुद्धानभ्रकवारिणा ॥ १० ॥
क्षालयित्वात् तान् सर्वान् यन्त्रे संधाय शास्त्रत ।
गालवोक्तविधानेन तन्तून् सम्यक् प्रकल्पयेत् ॥ ११ ॥
केतकीवटतालार्कनारिकेलशणादय ।
तत्तच्छुद्धिप्रकारेण शोधयित्वाष्टवारत ॥ १२ ॥
एकोनविंशत्संस्कारैस्सस्कृत्य विधिवत् क्रमात् ।
तत्तद्वल्कलमादाय यन्त्रे तन्तुमुखाभिधे (दे?) ॥ १३ ॥
समग्रैणाथ संधायं तन्तून् कृत्वा यथाविधि ।
गालवोक्तेन मार्गेण कुर्याद् वस्त्राण्यथाक्रमम् ॥ १४ ॥
पश्चाद् वस्त्रान् समाहृत्य पञ्चतैलेस्तु पाचयेत् ।
अतसीतुलसीधात्रीशमीमालुरुचक्रिकाः ॥ १५ ॥
रेशम, रुई, जलकाई, बाल, अभ्रकपरत आदि को २७ संस्कार शुद्ध करे हुओं को अभ्रक-
जल या कपूरजल या नागरमोथे के जल से प्रक्षालित करके सबको शास्त्र से यन्त्र में रखकर गालव
की विधि से धागों को बनावे । केतकी—केवड़ा, ( बांस केवड़ा) वड़, ताड़, आक, नारियल, सण आदि
उस उसके शुद्धिप्रकार से ८ वार शोध कर १६ संस्कारों से विधिवत् करके उसके उस उसके वक्कल
लेकर तन्तुमुख नामक यन्त्र में रखकर तन्तुओं को बनाकर गालव के कहे मार्ग से वस्त्र यथाक्रम करे
पश्चात् वस्त्रों को लेकर पांच तेलों से पकावे जो कि पांच तैल हैं अलसी,'तुलसी, आमला, शमी, मालु-
काली तुलसी, रुचिका-सरसों ॥ १०—१५ ॥
वस्त्राधिकरण ] [ २७
एतदोषधिबीजानां तैलात् सप्ताहमातपे ।
प्रत्यहं पञ्चधाताप्त्वा शुष्कं कृत्वा ततं परम् ॥ १६ ॥
गोपीलाक्षाचण्डमुखीमधुपिष्टाभ्रकासमम् ।
सम्मेल्य एणाक्षारेण बृहन्मूषामुखे क्रमात् ॥ १७ ॥
सम्पूर्य विधिवत् सर्वं कूर्मव्यासटिकान्तरे ।
निधाय त्रिमुखीभस्त्राद् धमनेच्छिञ्जीरवेगत ॥ १८ ॥
तन्मध्येऽगस्तिपत्राणां रसप्रस्थाष्टकं न्यसेत् ।
माक्षिकाभ्रकसिञ्जीरवज्रटङ्कणवाकुटै ॥ १९ ॥
तैलमाहृत्य विधिवत् तस्मिन् पश्चान्नियोजयेत् ।
पश्चात् संगृह्य तत्काञ्जं गर्भतापनयन्त्रके ॥ २० ॥
सन्ताप्य तत्तैललिप्तवस्त्राण्यथ समाहरेत् ।
इन ओषधियों के बीजों के तैल से सप्ताहभर धूप में प्रतिदिन पांच बार तपाकर सुखाकर
गोपी-गोपिका-कृष्ण सारिवा, लाख चण्डमुखी-इमली, मधु, पिष्ट-तिल की खल, अभ्रक ये समान लेकर
एणक्षार ?-ऐणाक्षार हरिणशृङ्ग भस्म के क्षार से मिला कर बड़ी मूषा (कृत्रिम बोतल) के मुख में भर
कर कूर्मव्यासटिका-कछवे के आकारवाले कुण्ड के अन्दर रखकर तीन मुखवाली भस्त्रा से सिञ्जीर ? के
वेग से धमन करे। उसके मध्य मे अगस्त्य वृक्ष के पत्तों का ८ सेर रस डाल दे स्वर्णमाक्षिक अभ्रक
सिञ्जीर ? थूहर, सुहागा, वाकुट-वाकुची ? या बाकुज-वकुल का फल वस्तुओं से विधिवत् तैल लेकर उस
में डाल दे पश्चात् लेकर गर्भगत यन्त्र में उनके काञ्ज ?-रस तपाकर उस तैल से लिप्त वस्त्र लेले ॥१६-२०
अग्निमित्रोक्तविधिना पटजात्यनुसारत ।
ऋतुधर्मानुसारण कवचादीन् प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
तत्तत्कालोचितान् वस्त्रकवचादीन् यथाक्रमम् ।
यानयन्त्रत्वाधिकारवरिष्ठेभ्यो मनोहरान् ॥ २२ ॥
दत्त्वा स्वस्त्ययनं कृत्वा रक्षाकरणपूर्वकम् ।
पश्चात् सम्प्रेषयेद् यानयन्त्रकर्माणि हर्षत ॥ २३ ॥
सर्वदोषविनाशस्स्यात् तत्पट्टैर् बलवर्धनम् ।
मेधोवृद्धिर्धातुवृद्धि रङ्गपुष्टिरजाड्यता ॥ २४ ॥
अग्निमित्र की कही विधि में पट जाति के अनुसार ऋतु धर्मानुसार कवच आदि बनावें, उस
उस काल के योग्य वस्त्र कवच आदि यथाक्रम मनोहर विमानचालन अधिकार में श्रेष्ठों के लिये देकर
स्वरूपयन रक्षाकरणपूर्वक करके उन्हें हर्ष से विमानचालन के कार्य में प्रेरित करे, सर्व दोषों का विनाश
हो उन वस्त्रों से विमानयात्रियों का बल बढ़े, मेधा बढे, धातु वृद्धि हो अङ्ग पुष्टि स्फूर्ति अङ्गरक्षण आदि
हो ॥ २१–२४ ॥
२८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
आहाराधिकरणम् ।
भोजन का अधिकरण ।
आहारः कल्पभेदात् ॥ अ० १ सू० ७ ॥
बो० वृ०
यन्तॄणामाहारभेदनिर्णयार्थं पदद्वयम् ।
सूत्रेऽस्मिन् कथितं सम्यक् तदर्थस्सम्प्रचक्षते ॥ २५ ॥
कल्पशास्त्रोक्तरीत्यात्र ऋतुकालानुसारतः ।
यन्तॄणामाहारभेदास्त्रिविधा इति निर्णता ॥ २६ ॥
चालक यात्रियों के आहारभेद के लिये इस सूत्र में दो पद कहे हैं उनका अर्थ कहा जाता
है, कल्पशास्त्र में कही रीति से यहां ऋतुकाल के अनुसार चालक यात्रियों के आहारभेद तीन प्रकार के
निर्णीत किए हैं ॥ २५—२६ ॥
तदुक्तमशनकल्पे—यह भोजनकल्प ग्रन्थ में कहा है—
रसवर्गे माहिषीया धान्येष्वाढकशालीको ।
मासेष्वाविक (कि ?) मास च वसन्तग्रीष्मयोरिति ॥२७॥
रसेषु गव्यसम्बन्धा धान्ये गोधूममुद्गकाः ।
मासेषु कालज्ञानीय वर्षाशरदृतावपि ॥ २८ ॥
रसेष्वजा रसाश्चैव धान्येषु यवमुद्गकाः ।
मासेषु कलविंकाश्च हेमन्तशिशिरे क्रमात् ॥ २६ ॥ इत्यादि
विनामिषं द्विजातीनां भुक्तिस्सममितीरितम् ।
दुग्ध वर्ग में भैंस के दूध धान्य में अरहर शाली चावल मांसो में भेड़ का मांस भोजन है
वसन्त और ग्रीष्म ऋतु में । दुधों में गौ के दूध धान्य में गेहूं मूंग मांस में कालज्ञानीय-मुर्गे का मांस
वर्षा और शरद् ऋतु में । दूधों में बकरी के दूध धान्यों में जौ मूंग मांसों में चिड़िया कबूतर का मांस
हेमन्त शिशिर ऋतु में क्रम से हैं । द्विजों का मांस के बिना भोजन समान कहा है ॥ २७—२६ ॥
विषनाशास्त्रिभ्यः ॥ अ० १ सू० ८ ॥
बो० वृ०
सूत्रे पदद्वयं प्रोक्तं विषनाशार्थबोधकम् ।
तदर्थं सम्प्रवक्ष्यामि समासेन न विस्तरात् ॥३०॥
पञ्चविंशतिसंख्याका ऋतुजा विषशक्तय ।
पूर्वोक्ताहारभेदेन विनाशं यान्ति नान्यथा ॥३१॥
सूत्र में विषनाशार्थ बोधक दो पद कहे हैं उनके अर्थ संक्षेप से कहूंगा विस्तार से नहीं ।
आहाराधिकरण ] [ २६
ऋतु से उत्पन्न होने वाली २५ विषशक्तियां हैं जो पूर्व कहे आहार के भेद से विनाश को प्राप्त हो
जाती हैं अन्यथा नहीं ॥ ३०–३१ ॥
तदुक्तं विषनिर्णयाधिकारे—वह कहा है विषनिर्णयाधिकार में—
ऋतवष्षड्विधास्तेषा कालशक्त्यादय क्रमात् ।
बहुधा सम्प्रभिद्यन्ते रयवारुणचापलात् ॥३२॥
मरुच्चापलशक्त्य शशतैक तद्गदेव हि ।
वारुणायाप्योडशैकभागाशस्सप्तमेन्तरे ॥३३॥
सम्मेलन यदि भवेत् तदानन्तप्रकारत ।
सिनीवालीकुहूर्योगाद् विषामृतप्रभेदत ॥३४॥
प्रभिद्यन्ते बिशेषेण ऋतूना कालशक्तय ।
यास्सिनीवालिसंग्रस्तास्सर्वामृतशक्तय ॥३५॥
कुहूसंग्रसिता यास्स्युस्तास्सर्वा विषशक्तय ।
सप्तकोट्यष्टपञ्चाशल्लक्षसप्तशतामृता ॥३६॥
तावन्त्येव विषा प्रोक्ता वाल्मीकिगणितोदिता ।
भेदिन्याश्चास्तेषु ? पञ्चविंशास्स्युर्विषशक्तय ॥३७
ऋतुकालानुसारेण यन्त्रदेहविनाशका ।
तन्नाशश्चाहारभेदादिति शातातपोऽब्रवीत् ॥३८॥ इति
तस्मादाहारभेदोस्मिन् सूत्रे त्रेधा निरूपित ।
तत्सेवनात् कायपुष्टिर्यन्तॄणा प्रभवेद् ध्रुवम् ॥३६॥
ऋतुएं छ प्रकार की हैं उनकी कालशक्ति आदि कम से वरुण—आकाश में फैले जल के वेग
की चपलता से बहुत भेदों में होते हैं उसी प्रकार मरुत्-आकाशीय वायु की चपलशक्ति के भाग १०१ हैं,
वारुण शक्ति के १६ अंश (सौ) सातवें अन्तर में हैं सम्मेल यदि हो तो तब अनन्त प्रकार से हो,
सिनीवालीपूर्वा अमावस्या और कुहू—उत्तरा अमावस्या के योग से विष अमृत के भेद से भिन्न-भिन्न
हो जाती है । जो तो सिनीवाली से सम्बन्ध रखती हुई हैं वे सब अमृत शक्तिया हैं और जो कुहू
से संग्रस्त हैं वे सब विषशक्तियां हैं । सात करोड़ अठावन लाख सात सौ अमृत शक्तियां हैं और
उतनी ही विष शक्तिकां वाल्मीकि गणित से कही हुई हैं, उनमें भेदिनियां २५ विषशक्तियां हैं
जो ऋतुकालानुसार चालक यात्रियों के देह का विनाश करने वाली है। उनका नाश आहारभेद से
हो जाता है ऐसे शातातप के पुत्र शातातप ऋषि ने कहा है । अतः आहारभेद इस सूत्र में तीन स्थानों
पर कहा है, उनके सेवन से यात्रियों की शरीरपुष्टि निश्चित हो जावे ॥ ३२—३६ ॥
तत्कालानुसारदिति ॥ अ० १ सू० ६ ॥
बो० बृ०
३० ] • [ बृहद् विमानशास्त्र
पदत्रय तु सूत्रेस्मिन् भुक्तिकालनिर्णये ।
उक्त स्यात् सग्रहेणाद्य तदर्थस्सन्निरूप्यते ॥४०॥
पूर्वोक्तत्रिविधाहारास्तच्छब्देनात्र वर्णिताः ।
भुक्तिकालविधिसम्यग् द्वितीयपदत्स्मृत ॥४१॥
इत्थम्भावेति†शब्द स्यादिति शब्दार्थनिर्णय ।
आहारोत्र प्रभेदेन यन्तॄणा पञ्चधा स्मृत (म् ?) ॥४२॥
इस सूत्र में भोजनकालनिर्णयप्रसङ्ग में तीन पद कहे हैं, अब संक्षेप से अर्थ कहा जाता है ।
पूर्वोक्त तीन प्रकार के आहार तन् शब्द से यहां वर्णित किए हैं भोजनकाल का विधान दूसरे पद से
कहा है, इत्थम्भाव के अर्थ में इति शब्द है यह शब्दार्थ का निर्णय है, चालक यात्रियों का आहार
यहां भेद से पांच प्रकार का कहा है ॥
तदुक्तं शौनकीये—यह कहा है शौनकीय सूत्र में—
अथ भोजनकालविधिं व्याख्यास्याम कालाकालविभागेन गृहिणा
द्वावेकमित्येक मस्करिणा चतुर्वंतरेषा पञ्चधा यानयन्तॄणा यथेच्छ
योगिनामिति ॥
अब भोजन की कालविधि को काल अकाल विभाग से कहूंगा गृहस्थों का दो काल एक काल,
संन्यासियों का एक काल, अन्यों का चार बार, विमान के चालक यात्रियों का पाच बार करना और
योगियों का इच्छानुसार करना ॥
लल्लकारिका—लल्लकारिका है—
कालयोर्भोजनमिति सूत्रवाक्यानुसारत ।
अह्नि द्वितीययामान्ते रात्रौ प्राथमिकान्तरे ॥४३॥
सकालभोजने प्राहुर्गृहिणा कालनिर्णय ।
अकालभोजने तेषामेकभुक्तविधौ क्रमात् ॥४४॥
दिवि तृतीययामाया चतुर्थान्तमिति स्मृत ।
एकभुक्ताधिकारत्वाद् यमिनामेकमेव हि ॥४५॥
अहोरात्रविभागेन शूद्रादीना तु भोजने ।
अह्नि त्रिधैकधा रात्राविति कालविनिर्णय ॥४६॥
भोजने नास्त्यतस्तेषा यथेच्छ भोजन विदु । इति
अह्नि त्रिधा द्विधा रात्रावाकाशे यन्तॄणा क्रमात् ।
पञ्चधा भुक्तिकालस्य निर्णय परिकीर्तित ॥४७॥
सूत्रवाक्यानुसार दो कालों में भोजन है । दिन में दूमरे प्रहर के अन्त में रात्रि में प्रथम
प्रहर के अन्दर । गृहस्थों का कालनिर्णय सकाल भोजन में अर्थात् निश्चितकाल पर करना, उनका एक
† 'इत्यम्भाव इति' उभयोरेकादेश आर्ष ।
आहाराधिकरण ] [ ३१
वार भोजनविधि में अकाल भोजन है दिन में तीसरे प्रहर से लेकर चतुर्थ प्रहर तक कहा है, संन्यासियों
का एक बार भोजन का अधिकार होने से एक काल पर ही करना, शूद्रों आदि का तो भोजन में दिनरात
के विभाग से दिन में तीन बार रात्रि में एक बार यह कालनिर्णय है, उनका भोजन में काल नियम
नहीं यथेच्छ भोजन को जानते हैं । इत्यादि । दिन में तीन बार रात्रि में दो बार भोजन आकाश में
चालक यात्रियों का क्रम से होता है जोकि पांच बार भोजन में कालनिर्णय है ॥४७॥
तदभावे सत्त्वं गोलो वा ॥ अ० १ सू० १० ॥
बो० वृ०
पदत्रय भवत्यस्मिन्नाहारान्तरबोधकम् ।
तदर्थं (ह ?) सम्प्रवक्ष्यामि समासेन यथामति ॥४८॥
आहारासम्भवे तेषां तत्सारेण कृतान् मृदून् ।
प्रदद्याद् घननिःस्वाकानाहारार्थं यथाविधि ॥४६॥
इस सूत्र में तीन पद हैं आहारान्तर—अन्य आहार के स्थान को बोधन कराने वाले उनके
अर्थ को मैं यथामति संक्षेप से कहूंगा, आहार की सम्भावना न होने पर उनके सार—आटे आदि के
बने कोमल घननिस्पाक—पिण्डों—लड्डुओं को आहारार्थ यथाविधि दे ॥४६॥
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प ग्रन्थ में—
आहारा पञ्चधा प्रोक्ता देहपुष्टिकराश्शुभा ।
अन्नकाञ्जिकपिष्टप्रद्रोटिकासत्त्वरूपतः ॥५०॥
तेषु श्रेष्ठतरो सत्त्वगोलाविति कीर्तितो ।
देह की पुष्टि करने वाले आहार—भोजन पाच प्रकार के कहे हैं । अन्न, काञ्जिक—धान्याम्ल
(खट्टा अन्नरस), पिष्ट—लुगदी, रोटिका, सार—चूर्णरूप में उनमें सत्त्व—सार—चूर्ण—भुनाचून—कसार और
गोल—लड्डू कहे हैं ॥५०॥
उक्तं हि पाकसर्वस्वे—कहा ही पाकसर्वस्व में—
धान्याद्याहारवस्तूना सत्त्वमाहृत्य यन्त्रतः ।
पाक कृत्वा पाचनाख्ययन्त्रभाण्डे यथाविधि ॥५१॥
उक्ताष्टमेन पाकेन सत्त्वगोलान् प्रकल्पयेत् ।
सुगन्ध मधुर स्निग्धमाहार पुष्टिवर्धनम् ॥५२॥ इति
धान्य आदि आहार वस्तुओं के चूर्ण —आटे को चक्की यन्त्र से लेकर पाचना नामक—कढाई
आदि में यथाविधि पाक करके कहे आठवें भाग पाक से सत्त्वगोल—लड्डू बनावे. उसमें सुगन्ध मधुर
स्निग्ध डालकर पुष्टिवर्धक आहार बनावे ॥ ५१–५२ ॥
फलमूलकन्दसारो वा ॥ अ० १ सू० ११ ॥
बो० वृ०
३२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
पूर्वसूत्रे धान्यसत्त्वाहारमुक्तं हि यन्तॄणाम् ।
तथैवास्मिन् कन्दमूलफलसत्त्वमपीयते ॥५३॥
प्रथम कन्दसत्त्वस्स्याद् द्वितीयो मूलसत्त्वकः ।
फलसत्त्वस्तृतीयस्स्यादिति सूत्रार्थनिर्णय ॥५४॥
पूर्व सूत्र में धान्य—गेहूं आदि अन्न के चूर्ण—भुने आटे आदि का बना विमानचालक
यात्रियों का आहार कहा गया है वैसे ही उस सूत्र में कन्द मूल फल के सत्त्व—गूदे मीगी आदि को
आहार कहा है । प्रथम कन्दसत्त्व हो दूसरे मूल का सत्त्व हो तीसरे फलसत्त्व हो यह सूत्रार्थ है ॥५३-५४॥
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प में—
अलाभे धान्यसत्त्वस्य सत्त्वत्रयमुदाहृतम् ।
कन्दसत्त्वो मूलसत्त्व फलसत्त्व इति क्रमात् ॥५५॥
पिष्टशंकरामञ्जूषमधुक्षीरघृतादय ।
स्निग्धोदकक्षारकटुकमञ्जूषाम्लम्लु
आहाराधिकरण ] [ ३३
मूलसत्त्वाद् वृद्धिमेतीत्याहुर्ज्ञानविदा वरा ।
मनोबुद्धीन्द्रियग्रामज्ञानाम् माससिक्रिरा ॥ ६३ ॥
फलसत्त्वाद् वृद्धिमेतीत्याहुश्शास्त्रविदा वरा ।
एतत्सत्त्वत्रयाहारो यन्तॄणा भोजने बुधा ॥ ६४ ॥
शास्त्रोक्ताहारवर्गेषु श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतम विदु ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्सत्त्व सग्रहेत् सुधी ॥ ६५ ॥ इत्यादि
आहार मूल वर्ग तो शास्त्र में १६ प्रकार के कहे हैं, वैसे ही आहार फल वर्ग ३२ कहे हैं
कन्दसत्त्व से मेद मज्जा हड्डी वीर्य आदि बढ़ते हैं मूलसत्त्व से ओज, बल काय की पुष्टि प्राण कोश
आदि बढ़ते हैं, फलसत्त्व से मन ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान रक्त मास सिक्रिजर-रस बढ़ते हैं ऐसा श्रेष्ठ शास्त्रज्ञ
कहते हैं, यह तीन सत्त्वों का आहार विमान के चालक यात्रियों के भोजन में विद्वानों ने शास्त्रोक्त आहार
वर्गों में श्रेष्ठतम माना है । अत सर्व प्रयत्न से बुद्धिमान उस सत्त्व का संग्रह करे ॥ ६१-६५ ॥
अपि च तृणादीनाम् ॥ अ० १, सू० १२ ॥
बो० वृ०
पूर्वसूत्रे कन्दमूलफलसत्त्वमुदाहृतम् ।
तृणगुल्मलतादीना सत्त्वमस्मिन्निरूप्यते ॥६६॥
पूर्व सूत्र में कन्द मूल फल का सत्त्व कहा है, इस सूत्र मे तृण गुल्म लता आदियों का सत्त्व
निरूपित किया जाता है ।
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प ग्रन्थ में —
तृणगुल्मलतादीना सत्त्वाहार च यन्तॄणाम् ।
पूर्वोक्तसत्त्ववद् देहारोग्यायुरप्यादिवर्धनम् ॥६७॥
तस्मात् सत्त्वमप्यन्तृभोजनार्थ समाहरेत् ।
दूर्वाषट्क मुञ्जषट्क कुशषट्क तथैव हि ॥६८॥
शौण्डीरस्याश्वकर्णस्य षट्क षट्कमत् परम् ।
शतमूलत्रय चैव भोजनेत्यन्तशोभना ॥६९॥
कारुवेल्ली चन्द्रवेल्ली मधुवेल्ली तथैव च ।
वर्चुली माकुटीवेल्ली सुगन्धा सूर्यवेल्लिका ॥७०॥
तृण, गुल्म, लता आदि का सत्त्व—लुगदी या रस चालक यात्रियों का भोजन है । पूर्वोक्त
सत्त्व—कन्द मूल फल के सत्त्व की भांति देह का आरोग्य आयुश्य आदि बढाने वाला है अत (इनका)
सत्त्व भी भोजनार्थ ले ले । दूब ६ भाग, मूञ्ज ६ भाग, कुशा ६ भाग, शौण्डीर ?—देवधान्य—कंगुनी या
स्वयं उत्पन्न जंगली तृण धान्य ? ६ भाग, अश्वकर्ण—लताशाल ६ भाग, शतमूलं—शतमूलिका—महा-
मूषाकर्णी ३ भाग, भोजन में अत्यन्त अच्छे हैं । कारुवेल्ली—कारवल्ली—छोटा करेला, चन्द्रवेल्ली—
ब्राह्मी, मधु वेल्ली—मुलहठी, वर्चुली ?, माकुटीवेल्ली ?, सुगन्धा—तुलसी, सूर्यवेल्ली—सूर्यवल्ली—
क्षीरकाकोली ॥ ६७-७० ॥
एते गुल्मास्सदा यन्तृभोजने पुष्टिवर्धना ।
सोमवल्ली चक्रिकादतुम्बिकारसवल्लिका ॥७१॥
कूष्माण्डवल्लिका चेक्षुवल्लिका पिष्टवल्लरी ।
सूर्यकान्ता चन्द्रकान्ता मेघनाद. पुनर्नवः ॥७२॥
अवन्ती वास्तु मत्स्या क्षीरुकमाया. पुष्टिवर्धना ।
पूर्वोक्तपिष्टमञ्जूषशर्कराद्या यथाक्रमम् ॥७३॥
विधिवच्छोदिते शास्त्रमुखात् सलभ्यते यदि ।
यो वा को वा भवेद् गुल्मलतादूर्वाद्य क्रमात् ॥७४॥
सत्वाहरणयोग्यास्ते बलपुष्टिविवर्धना. ।
शाकपुष्पतत्पन्नपल्लवादीना तथैव हि ॥७५॥
सत्वमत्युत्तम विद्यादाहारे यन्तृ णामिति ।
ये गुल्म सदा चालक यात्रियों के भोजन में पुष्टिवर्धक हैं । सोमवल्ली-सोमलता, चक्रिकाद ?,
तुम्बिका-घिया लौकी ?, रसवल्लिका ?, पेटा कद्दू लता, इक्षुवल्लिका-इक्षुवल्ली-कृष्णक्षीरविदारी,
पिष्टवल्लरी-पिष्टपर्णी, सूर्यकान्ता-आदित्यपर्णी, चन्द्रकान्ता-निर्गुण्डी-सम्भालू, मेघनाद-चौलाई,
पुनर्नवा, अवन्ती-राई, वास्तु-बथवा, मत्स्या-कुटकी, क्षीरुकमा ?-क्षीरपुष्पी-शङ्खपुष्पी, ये पुष्टि-
वर्धक हैं । पूर्व कहे चूर्ण लुगदी-गुड़ा दलिया या खाण्ड यथाक्रम विधिवत् शास्त्रमुख से प्राप्त होते
हैं । जो भी कोई भी गुल्म, लता, दूर्वा आदि ही क्रम से सत्त्व लेने योग्य हों वे बलपुष्टि बढ़ाने वाले हैं
शाक फूल पत्ते कोपल आदि आहार में उनके सत्त्व को यात्रियों के आहार में जाने ॥ ७१-७४ ॥
अथ लोहाधिकरणम् ॥
अब लोहे का अधिकरण प्रस्तुत किया जाता है ।
अथ यानलोहानि ॥ अ० १, सू० १३ ॥
बो० वृ०
यन्तॄणामाहारभेद. पूर्वाधिकरणे स्मृत ।
अथेदानीं यानलोहस्वरूपोस्मिन्निरूप्यते ॥७६॥
पदद्वय भवेदस्मिन् यानलोहविनिर्णये ।
तयोरानन्तर्यवाची स्यादादिमपदस्तथा ॥७७॥
यानक्रियार्हलोहानि प्रोक्तानि स्युर्द्वितीयत ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥७८॥
उक्तानि यानलोहानि शौनकीये यथाक्रमम् ।
तान्येवोदाहरिष्यामि विमानरचनाविधौ ॥७९॥
विमानचालक यात्रियों का आहारभेद पूर्व अधिकरण में कह दिया । अब यान के लोहे
का स्वरूप इस प्रकरण में निरूपित किया जाता है । इस सूत्र में दो पद विमानलोहे के निर्णय में हैं ।
लोहाधिकरण ] [ ३५
उन दोनों में आदिम पद 'अथ' अनन्तरार्थ का वाची है। दूसरे पद से विमानकार्य के योग्य लोहे कहे
हैं। पदों का अर्थ ऐसे कहकर अब विशेषार्थ कहा जाता है। शौनकीय सूत्र में जैसे लोहे कहे हैं वैसे
ही यथाक्रम उन्हें विमानरचनाविधि में कहूंगा ॥ ७६—७९ ॥
तदुक्तं शौनकोये—वह कहा है शौनकीय सूत्र में-
अथ वैमानिकान् लोहाननुक्रमिष्यामस्सौमकसौण्डालिकमौक्तिकाइचे-
तत्सम्मेलनादूष्मपाष्षोडशधा भवन्तीति ते वैमानिका इति ॥
अथ वैमानिक - विमान के हितकर लोहों को कहेंगे जो कि सौमक, सौण्डालिक, मौक्तिक हैं।
इनके सम्मेलन से ऊष्मप लोहे १६ प्रकार के होते हैं अत. वे वैमानिक लोहे होते हैं ॥
अथ नामानि - अथ उनके नाम हैं-
उष्णाम्भरोष्णपोष्णाहनराजाम्लतृड् वीरहापञ्चघ्नोग्नितृड्भारहनशीत-
ह्नोगरलघ्नाम्लहनो विषम्भरविशल्यकृद् द्विजमित्रश्चेतीत्यादि ॥
[L13
३६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
इस प्रकार ऊष्मप लोहों का विमान योग्य होना प्रमाण से कहकर उनके स्वरूप का निर्णय
करने को पूर्व मार्गानुसार उनके बीज लोहों के स्वरूप आदि के विषय में भली प्रकार विचार किया
जाता है । भूगर्भस्थित खनिज रेखाओं की पंक्तियों में सातवें पंक्तिस्तर में तीन खनिज रेखास्तरों में
जो लोहे सौमजातीय ऊष्म लोह की उत्पत्तिविधि में मुख्यत्व से निश्चित किए हैं ॥८१-८४॥
तदुक्तं लोहतन्त्रे-यह लोहतन्त्र में कहा है -
रेखासप्तमस्य तृतीयखनिजलोहा पञ्चशक्तिमयास्सौमजातीयास्ते
बीजलोहा इति ॥
सातवीं रेखा में स्थित तीन खनिजस्तर में उत्पन्न लोहे पांच शक्तियों से पूर्ण सौमजातीय
बीज लोहे हैं ॥
बोधानन्दकारिका-बोधामन्दकारिका--
भूगर्भखनिजरेखास्त्रिसहस्राधिकास्स्मृता ।
त्रिशतोत्तरसहस्ररेखास्तेषूत्तमा क्रमात् ॥८५॥
रेखानुगुणतस्तासु खनिजास्सन्निरूपिता ।
तेषु सप्तमरेखास्थखनिजास्सप्तविंशति ॥८६॥
तेषु तृतीयखनिजगर्भकोशसमुद्भवाः ।
पञ्चशक्तिमया ये स्युस्ते लोहा बीजसंज्ञकाः ॥८७॥
तानेव सौमसोण्डालमौक्तिकाद्यैश्च नामभिः ।
प्रवदन्ति विशेषेण लोहशास्त्रविशारदाः ॥८८॥
लोहेषु सौमजातीनामुत्पत्तिक्रमनिर्णयं ।
लोहकल्पानुसारण किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥८६॥
भूगर्भ की खनिज रेखाएं तीन सहस्र से अधिक कही हैं, उनमें क्रम से एक हजार तीन सौ
रेखाएं उत्तम हैं उनमें रेखानुसार खनिज कहे हैं उनमें सातवीं रेखा में स्थित खनिज २७ हैं उनमें
तीन खनिज गर्भकोशों में उत्पन्न होने वाले पांच शक्तियों से पूर्ण जो लोह हैं उन्हें ही सौम सौण्डाल-
मौक्तिक आदि नामों से लोहशास्त्रज्ञ विशेषतः कहते हैं। लोहों में सौम आदि के उत्पत्तिक्रम का निर्णय
'लोहकल्प' शास्त्र के अनुसार कुछ यहां निरूपित किया जाता है ॥ ८५-८६ ॥
उक्तं हि लोहरहस्ये-लोहरहस्य में कहा है-
कूर्मकश्यपमार्तण्डभूतभाना तथैव हि ।
अर्केन्दुवाडवानां च शक्तयस्स्वाशतः क्रमात् ॥ ६० ॥
अष्टैकादशपञ्चद्विष्ट्चतुर्नवसंख्यका ।
खनिजान्तर्गर्भकेन्द्रशक्त्याकर्षणातस्स्वयम् ॥ ६१ ॥
शनैश्शनैस्समागत्य गर्भकोशं विशन्ति हि ।
तत्र वारुणीशेषगजशक्त्यूष्मभि क्रमात् ॥ ६२ ॥
लोहाधिकरण ] [ ३७
मिलित्वा लोहता यान्ति शक्तिसम्मेलने यथा ।
बीजलोहेष्विमे सोमलोहा इति विनिर्णिता ॥ ६३ ॥
एतेषा नामशक्त्यादिनिर्णयस्तु यथामति ।
यथोक्तमत्रिणा साक्षात् तथैवात्र निरूप्यते ॥ ६४ ॥
कूर्म—पृथिवी गर्भ की आकर्षण शक्ति,* कश्यप—पृथिवी की बाहिरी कक्षाशक्ति, मार्तण्ड—सूर्य-
किरण प्रवाह, भूत—तन्मात्राएं विशेषत वातप्रवाह, भ—ग्रहशक्ति, अर्क—सूर्य की आन्तरिक आकर्षण
शक्ति, इन्दु—चन्द्रमा, वाडवा-कालगति या सूर्य और पृथिवी आदि के मध्य पृथिवी आदि को वहन
करनेवाली शक्ति। ये सब अपने अपने अंश से ३, ८, ११, ५, २, ६, ४, ६ शक्तिया खनिज अन्तर्गत
गर्भकेन्द्र शक्ति के आकर्षण से स्वय धीरे धीरे मिलकर गर्भकोश को प्रविष्ट हो जाती हैं। वहां वारुणी-
पृथिवी की आर्द्रशक्ति या स्निग्धशक्ति, शेष—मेरुदण्डशक्ति—निजी पिण्डीकरणशक्ति, गज—क्षितिज-
प्रवाह शक्तियों की ऊष्मांशों से मिलकर लोहे के रूप को प्राप्त होते हैं जैसे ही शक्ति का सम्मेलन हो
जावे। बीज लोहों में ये सौम लोहे निर्णय किए गए हैं। इनके नाम शक्ति आदि निर्णय यथामति
अत्रि ने कहे हैं वैसे ही यहां निरूपित किए जाते हैं ॥ ६०-६४ ॥
उक्तं हि नामार्थकल्पे—कहा ही है नामार्थकल्प ग्रन्थ मे —
सोमस्सौम्यक्सुन्दास्यसोम पञ्चाननस्तथा ।
उष्णारिरूष्मपशृङ्गसोण्डीरो लाघवोर्मिप ॥ ६५ ॥
प्राणानशङ्खकपिल इति नामान्यथाक्रमम् ।
सौमाख्यबीजलोहस्य वर्णितानि विशेषत ॥ ६६ ॥
तथैव बीजलोहाना नामसक्लृप्तशक्तय ।
एकैकनामतस्सम्यग् निर्णितास्स्युर्यथाविधि ॥ ६७ ॥
सौमाख्यनामसङ्क्लृप्तशक्तीर्यास्सम्प्रकीर्तिता ।
ता एव संनिरूप्यन्ते सग्रहादत्र साम्प्रतम् ॥ ६८ ॥
सौम, सौम्यक, सुन्दास्य, सोम, पञ्चानन, उष्णारि, ऊष्मप, शृङ्ग, सोण्डोर, लाघव, ऊर्मिप,
प्राणन, शङ्ख, कपिल ये नाम यथाक्रम सोम नामक बीज लोहे के कहे हैं वैसे ही बीज लोहे की नाम
द्वारा निष्पन्न शक्तिया जो कही हैं वे यहा अब निश्चित की जाती हैं ॥ ६५-६८ ॥
उक्तं हि नामार्थकल्पे—कहा है नामार्थकल्प ग्रन्थ में—
सू० सोमरस ओ्मविसर्ग† (नुस्वार ?) शक्तितश्च ॥ इति
बोधानन्दकारिका—
विमानरचनार्थाय ये लोहा कृतका स्मृता ।
तेषा सौमादयो बीजलोहा इति विनिर्णिता ॥ ९९ ॥
स ओ्मविसर्ग† (नुस्वार ?) शक्तिभागसम्मेलनाद्यत ।
लोहत्वमभजत् तस्मान्नाम सोम इतीरितम् ॥ १०० ॥
- "कूर्मो बिभर्ति धरणीं खलु चात्मपृष्ठे" ( शुक० ४४।११ )
† अनुस्वार, हस्तलेख मे प्रमादत पाठ है ( देखो श्लोक ११२ )
३८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एतल्लोहस्य शक्तीनां वर्णासङ्केतनिर्णयं ।
परिभाषाचन्द्रिकोक्तरीत्या किञ्चिन्निरूप्यते ॥ १०१ ॥
विमानरचना के लिये जो लोहे कृतक कहे हैं उनके बीज लोहे सौम आदि निश्चित किए गए
हैं। “स, औ, म,” अक्षरों की शक्ति भागों के मेल से इनके सहयोग के कारण लोहरूप को प्राप्त हुआ
अतः सौम इस नाम से कहा गया है। यह लोहे की वर्ण शक्तियों का संकेत निर्णय है, परिभाषाचन्द्रिका
की कही रीति से किञ्चित् निरूपण किया जाता है ॥ ६६-१०१ ॥
उक्तं हि परिभाषाचन्द्रिकायाम्—कहा ही है परिभाषाचन्द्रिका में—
सू० साङ्केतकाश्र्चतुर्वर्गीया ॥
विश्वम्भरकारिका--इस पर विश्वम्भरकारिका है—
वारुणीसूर्यकिरणादिति ध्रुवभेदत ।
सर्वेषा बीजलोहाना शक्तिवर्गाश्चतुविधा ॥ १०२ ॥
एकैकवर्गसङ्क्लृप्ताश्शक्तयस्तेषु शास्त्रत ।
लक्षैक च सहस्राणा सप्तषष्टितमास्तथा ॥ १०३ ॥
शताना सप्ततदुपर्यष्टषष्टितम क्रमात् ।
इति वाल्मीकिगणितप्रमाणात् सन्निरूपिता ॥ १०४ ॥
तेषु वारुणीवर्गस्य कूर्मकश्यपशक्तिषु ।
सप्तषष्टितमा शक्तिरुषाख्या कूर्मगर्भजा ॥ १०५ ॥
पञ्चाशीतितमा शक्ति कालारूपा काश्यपी तथा ।
साङ्केतकादिमो शक्ती सकारे सन्निरूपिते ॥ १०६ ॥
वारुणी—वरुणशक्ति और सूर्यकिरण से इस प्रकार स्थिर भेद से सब बीज लोहों के शक्तिवर्ग
चार प्रकार के हैं। एक एक वर्ग से विभक्त शास्त्र से उन में शक्तियां १ लाख ६७ सहस्र ७ सौ ६८ हैं यह
वाल्मीकि गणित से निरूपित की गई हैं। उनमें वारुणी वर्ग की कूर्मकश्यप शक्तियों में ६७वीं शक्ति
उषा नामक कूर्मगर्भ से उत्पन्न होने वाली है, ८५वीं काश्यपी कालनाम की शक्ति तथा संकेतवाली
आदिम दो शक्तियां 'स' अक्षर में कही हैं ॥ १०२-१०६ ॥
अर्कांशुवर्गे मार्तण्डभूतसञ्जातशक्तिषु ।
एकसप्ततिमा शक्तिर्मार्तण्डस्याम्बरा तथा ॥ १०७ ॥
रुचिकाख्या भूतशक्तिष्षष्ट्युत्तरशतात्मिका ।
उभो साङ्केतरूपेण ओकारे सम्प्रदर्शिते ॥ १०८ ॥
तथेवादितिगर्भस्थसूर्यनक्षत्रशक्तिषु ।
सुन्दराख्या नवमी शक्तिरादित्यस्य तथैव हि ॥ १०९ ॥
ऋक्षस्य शक्तिर्भोमाख्या एकोत्तरशतात्मिका ।
एते साङ्केतकादत्र मकारेणाभिर्वाणते ॥ ११० ॥
लोहाधिकरण ] [ ३६
तथैव ध्रुववर्गस्थसोमवाडवशक्तितु ।
इन्दुशक्तिस्सोमकाख्या नवोत्तरशतात्मिका ॥ १११ ॥
सूर्यकिरणवर्ग में मार्तण्ड और भूतों से उत्पन्न शक्तियों में ७१वीं शक्ति मार्तण्ड की अम्बरा है,
रुचिका नामक भूतशक्ति १६०वीं है, ये दोनों शक्तियां सङ्केतरूप से 'ओ' अक्षर में दिखलाई हैं, तथा
अदितिगर्भ में स्थित सूर्यनक्षत्रों में सुन्दारूय नौवीं शक्ति आदित्य की वैसी ही नक्षत्र की शक्ति भौमाख्य
१०१ कही, ये दोनों शक्तियां यहां 'म' अक्षर से वर्णित करी हैं। वैसे ही ध्रुव वर्ग में स्थित सोमवाडब
शक्तियों में इन्दु-चन्द्रमा की शक्ति सोमनाम १०९वीं कही है ॥ १०७-१११ ॥
तथैव वाडवाशक्तिमेलनारूया चतुर्दशी ।
इमो साङ्केतिकादत्र विसर्गै सन्निरूपिते ॥ ११२ ॥
एव चत्वारि वर्गस्थशक्तयस्ता परस्परम् ।
खनिजाना गर्भकोशे मिलित्वा कालपाकतः ॥ ११३ ॥
सोमजातीयलोहत्व प्राप्नोत्येव† न सशय ।
आह्वत्याष्टौ शक्तयोस्मिन् विचारे सम्प्रदृश्यन्ते ॥ ११४ ॥
एवमुक्त्वा सोमलोहशक्तिसङ्केतनिर्णयम् (य ?)
अथ सोण्डाललोहस्य शक्तिसङ्केतमुच्यते ॥ ११५ ॥
कूर्मस्थधनदा नाम शक्तिरेकादशात्मिका ।
क्रमात् साङ्केतिकादत्र सकारेणाभिवर्णिता ॥ ११६ ॥
वैसे ही वाडवाशक्तिमेलन नामक १४वीं है, ये दोनों शक्तियां सङ्केत से यहां विसर्ग ' : ' से
निरूपित की हैं । इस प्रकार चार वर्गों में स्थित शक्तियां परस्पर खनिजों गर्भकोशों में मिलकर कालपाक
से सोम जाति के लोहपन को प्राप्त हो जाती हैं इसमें संशय नहीं । आठों शक्तियां मिलकर इस विचार
में दिखलाई पड़ती हैं । इस प्रकार सोम लोहशक्तियों के सङ्केत का निर्णय कहकर अब सोण्डाल लोह
की शक्तियों का सङ्केत निर्णय कहा जाता है। कूर्मस्थ धनदा-कुबेरों की शक्ति ११वीं है (११ रूपों में
है ) सङ्केत से यहां 'स' अक्षर से कही है ॥ ११२-११६ ॥
ऋङ्नामा काश्यपी शक्तिर्दशोत्तरशतात्मिका ।
पूर्ववत्सङ्केतिता स्यादौकारेण यथाक्रमम् ॥ ११७ ॥
शक्तिर्द्रवमुखी नाम मार्तण्डस्य शतात्मिका ।
आण्वी नाम तथा भूतशक्तिस्सप्तशतात्मिका ॥ ११८ ॥
द्वाविमौ साङ्केतिते चात्रानुस्वारेण शाश्वत. ।
सूर्यस्यैकोनपञ्चाशच्छक्ति. कान्ताभिधा तथा ॥ ११९ ॥
नक्षत्राणा पञ्चविंशच्छक्तिर्वर्चोभिधानका ।
उभो साङ्केतिते चात्र डकारेण यथाक्रमम् ॥ १२० ॥
† प्राप्नोति—एकवचनं' वचनव्यत्ययेन बहुवचने ।
४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तथैव ध्रुववर्गस्थसोमवाडवशक्तितु ।
इन्दोश्चतुष्षष्ट्युत्तरत्रिशता शक्तिरुज्ज्वला ॥ १२१ ॥
साङ्केतिका डकारोपर्य्याकारेणात्र शाश्वत ।
वाडवाया पञ्चशतशक्ति कालाभिधा तथा ॥ १२२ ॥
ऋक् नाम वाली काश्यपी शक्ति ११० प्रकार की पूर्व की भांति संकेतित कर दी है 'औ' अक्षर
से यथाक्रम । मार्तण्ड की द्रवमुखी शक्ति १०० रूपों वाली, आश्वीनामक भूतशक्ति १०५ रूपोंवाली है इस
प्रकार ये दोनों शक्तियां यहां अनुस्वार ‘ ’ से संकेतित की हैं, सूर्य को ४६ शक्तियां कान्ता नाम की है,
नक्षत्रों की २५ शक्तियां वर्चानामवाली हैं दोनों सांकेतित हैं 'ड' अक्षर से यथाक्रम । वैसे ही ध्रुववर्ग में
स्थित सोमवाडव शक्तियों में चन्द्रमा की ३६४ उज्ज्वल हैं, डकार के ऊपर 'आ' अक्षर सांकेतित किया
है, वाडवा की ५०० शक्तियां कालनामक—॥ ११७–१२२ ॥
साङ्केतिता लकारेण वर्णसङ्केतनिर्णये ।
एवमुक्त्वा सोण्डालसकेतशक्ती यथाविधि ॥ १२३ ॥
इदानी मौर्त्विकलोहशक्तिसङ्केतमुच्यते ।
त्रिशतोत्तरसहस्रसख्याका पार्थिवाभिधा ॥ १२४ ॥
कूर्मशक्तिर्मकारेण पुनस्साङ्केतिता तथा ।
एकोत्तरद्विसहस्रसंख्याका कालाभिधा ॥ १२५ ॥
सङ्केतिता काश्यपस्य शक्तिरोकारतस्तथा ।
षष्ट्युत्तरद्विशतसख्याका लाघवाभिधा ॥ १२६ ॥
'ल' अक्षर से वर्णसंकेतनिर्णय में साङ्केतित करदी है। इस प्रकार मौण्डाल शक्तियों को
यथाविधि कहकर अब मौर्त्विक लोहशक्तियों का संकेत कहा जाता है। १३०० शक्तिया पार्थिव नामवाली
कूर्मशक्ति 'म' अक्षर से संकेतित की है पुनः २००१ कालनामक काश्यप की शक्ति संकेत की है 'ओ' अक्षर'
से, तथा २६० लाघवनाम की—॥ १२३–१२६ ॥
मार्तण्डशक्तिस्सङ्केताद्वयर्णेन निरूपिता ।
सप्तत्रिंशतिसख्याका वर्चुलीनामिका तथा ॥ १२७ ॥
भूतशक्तिस्तकारेण सङ्केतात् सन्निरूपिता ।
त्रिषष्ट्युत्तरसहस्रसंख्याका रुक्मकाभिधा ॥ १२८ ॥
नक्षत्रशक्तिस्सङ्केताद् वकारेणात्र वर्णिता ।
त्रयोदशोत्तरशतसंख्याका वरुणाभिधा ॥ १२६ ॥
अर्कशक्तिरिफारेण सङ्केतान्निरूपिता तथा ।
नवोत्तराष्टसहस्रसंख्याका रुजकाभिधा ॥ १३० ॥
निरूपितात्र सङ्केतादिन्द्रशक्ति ककारत ।
द्वादशोत्तरसहस्रसंख्याका पूर्णिकाभिधा ॥ १३१ ॥
लोहाधिकरण ] [ ४१
मार्तण्डशक्ति संकेत से 'र' अक्षर से निरूपित की है, ३७ वचुंली नामक भूतशक्ति 'त' अक्षर
संकेत से निरूपित की है। १०६३ ऋक्षमका नामक नक्षत्र शक्ति संकेत से 'व' अक्षर से यहाँ वर्णित है ।
११३ वरुण नामक अर्क शक्ति 'इ' अक्षर संकेत से रुजका नामक निरूपित की है, इन्दु-चन्द्रशक्ति 'क'
अक्षर से १०१२ पूषिण्का नाम वाली कही है ॥ १२७-१३१ ॥
संकेतितानुसारेण तथैवात्र यथाक्रमम् ।
एव त्रिलोहशक्तीना वर्णांसंकेतनिर्णयम् ॥ १३२ ॥
निरूप्य तल्लोहशुद्धिक्रममत्र तत परम् ।
प्रसङ्गानुप्रसङ्गत्या किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ १३३ ॥ इति
संकेतों के अनुसार वैसे ही यहां यथाक्रम इस प्रकार तीन लोहों की शक्तियों के अक्षर संकेत-
निर्णय निरूपित करके उससे आगे उन लोहों की शुद्धि यहां प्रसङ्गानुप्रसङ्ग से कुछ निरूपित की
जाती है ॥ १३२-१३३ ॥
तच्छुद्धिर्र्यथाशोधनाधिकारे ॥ अ० १ सू० १४ ॥
बो० वृ०
तल्लोहशुद्धिं निर्णेतुं सूत्रोय परिकीर्तित ।
पदानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् कथितानि यथाक्रमम् ॥ १३४ ॥
तेष्वादिमपदाल्लोहत्रयशुद्धिनिरूपिता ।
तच्छोधनप्रकारस्तु द्वितीयपदत स्फुटम् ॥ १३५ ॥
तत्प्रबोधकशास्त्र तु तृतीयेनात्र सूचितम् ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ १३६ ॥
सस्कारदर्पणविधिमनुसृत्य यथामति ।
सोमसोण्डालमौक्तिकलोहाना शुद्धिनिर्णयं ॥ १३७ ॥
उन लोहों की शुद्धि के निर्णय को यह सूत्र कहा गया है, इस सूत्र में तीन पद यथाक्रम कहे
हैं उनमें आदिम पद से तीन लोहों की शुद्धि निरूपित की है उनका शोधन प्रकार तो दूसरे पद से
स्फुट किया है उनका प्रबोधक शास्त्र तो तीसरे पद से यहां सूचित किया है । पदों का अर्थ इस प्रकार
कहा है विशेष अर्थ अथ कहा जाता है । सस्कार दर्पणविधि का अनुसरण करके यथामति सौम सोण्डाल
मौक्तिक लोहों की शुद्धि का निर्णय करते हैं ॥ १३४-१३७ ॥
पृथक् पृथग्विधानेन सग्रहात् सन्निरूप्यते ।
तत्रादौ सोमलोहस्य शोधनाक्रममुच्यते ॥ १३८ ॥
सोमलोह समाहृत्य पाचके सम्प्रपूरयेत् ।
सप्तविंशतिकक्ष्योष्णवेगात् सम्पाचयेद् द्रवात् ॥ १३६ ॥
जम्बीरलिकुचव्याघ्रिचाङ्गेरीजम्बूरसैस्तथा ।
विवृतास्येन नालयन्त्रे पाचयेद् दिवसावधि ॥ १४० ॥
४२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तत् सङ्गृह्याथ विधिवत् क्षालयित्वा तत परम् ।
पञ्चतैलेश्चतुर्द्रवै काषायैस्सप्तभिस्तथा ॥ १४१ ॥
पृथक् पृथग् गालयित्वा लोहं पश्चात् समाहरेत् ।
जो कि पृथक् पृथक् विधान से संक्षेप से निरूपित किया जाता है । उनमें प्रथम सोम लोहे
के शोधन क्रम को कहा जाता है, सोम लोहे को लेकर पाचक यन्त्र में भर दे २७ दर्जे के उष्ण वेग से
पकावे द्रव से जम्बीरी निम्बू, लिकुचलटलथडल, व्याघ्र—करञ्जवा या लाल एरण्ड, चिञ्चा—इमली,
जम्बू—जामुन के रसों से विस्तृत मुख वाले नांलयन्त्र से दिन भर पकावे उसे विधिवत् लेकर धोकर पांच
तैल्रों में चार द्राव—टङ्कण द्राव आदि से सात काढ़ों से पृथक् पृथक् लोहे को गलाकर लेले ॥१३८-१४१॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पण प्रकरण में—
गुञ्जा कञ्जलचञ्चुकुञ्जरकरञ्जादितैलेस्तथा ।
प्राणक्षारविरञ्चिकञ्चुकिखुरद्रावैश्च शुद्धे क्रमात् ॥
हिङ्गूपर्पटिघोटिकावरजटामासी विदाराराङ्गिणी ।
मत्स्याक्षीरवररक्तकण्टकुवररीकाषायतश्शोधयेत् ॥
गुञ्जा—घूंघची, कञ्जल ?—कञ्जर—आंवला, चञ्चु—एरण्ड, कुञ्जर—पीपल या कण्टकुचई ?,
करञ्ज—करञ्जवा आदि के तैलों से प्राणक्षार–नौसादर†, विरञ्चि ?–सज्जी क्षार ? कञ्चुकि-यव—यवक्षार,
खुरक्षारसे शुद्ध हुए । हींग, पर्पटि–पर्पटी पद्मावती सुगन्धद्रव्य, घोटिका–सुपारीफल, जटामांसी—बालछड़,
विदाराराङ्गिणी ?—विदारण—कनिगर गन्ध वृत्त या बिदारीकन्द ?, मत्स्याक्षी—मछेली, रक्तकण्ठकुवरी—
लाल रंग का थूहर के काढ़ों से शोधे ॥
एवमुक्त्वा सोमलोहशुद्धिक्रममत परम् ।
सोण्डालारुख्यलोहस्य शोधनक्रममुच्यते ॥ १४२ ॥
पाचनादिक्रियास्सर्वनालयन्त्रान्तमादरात् ।
सोण्डालस्य यथाशास्त्रं कर्तव्यं सोमलोहवत् ॥ १४३ ॥
द्रवकाषायतैलादिसंस्कारो भिद्यते क्रमात् ।
षड्द्रावैस्सप्ततैलेश्च काषायै पञ्चभिस्तथा ॥ १४४ ॥
प्रत्येकं गालयेत् तै. पश्चात्ल्लोहं समाहरेत् ।
इस प्रकार सोम लोह के शुद्धिक्रम को कह कर उससे आगे सोण्डाल लोहे का शोधन कहा
जाता है । सोण्डाल की पाचन आदि क्रिया सब नांलयन्त्र तक की ठीक सोम लोहे की भांति यथाशास्त्र
कहनी चाहिये । द्रव काषाय तैल आदि संस्कार ही भिन्न होता है, ६ द्रवों ७ तैल्रों ५ कषायों से प्रत्येक
को गलावे फिर लोहे को ले ले ॥ १४२-१४४ ॥
उक्तं हि संस्कारदर्पणे—कहा ही है संस्कारदर्पण में—
इ गालगौरीसुवराटिकास्तथा मुद्रीरताप्योल्वणशुद्धतैले. ।
तथैव चाङ्कोलसुमुष्टिषल्ल भल्लातकाकोलविरञ्चकद्रवैः ॥
† नूसार या नरसार प्राण है, प्राणनामक क्षार या प्राणो का क्षार है मूत्र, अत प्राण क्षार मूत्र क्षार—
"नूसार, नरसारः, (नोसादर) लोहद्रावकस्तथा" (रसरत्नारङ्गिणी) ।
लोहाधिकरण ] [ ४३
कुलित्थनिष्पावकसर्षपाढकगोधूमकाषायकाञ्जिकैश्च ।
सशोषयेत् सौण्डालिकलोहदोष शास्त्रोक्तमार्गेण शनैश्शनै क्रमात् ।। इति
इङ्गल—इंगुदी, गौरो—मजीठ, सुराटिका—वराटिका—कौड़ी, मृद्वी—मुनक्का
से पूर्ण तेलों से तथा अङ्कोल—अङ्कोलवृक्ष--ढेरा, मुष्टि घण्टा—पाटलावृक्ष, शङ्ख, भिलावा, काकोल—
काकोली, विरञ्चक ? द्रवों से कुलित्थ—लालकुलथी, निष्पावक—श्वेतान्नफली, सरसों, अरहर, गेहूँ के
कषायों और काञ्जियों से शास्त्रोक्त मार्ग से सौण्डाल लोहे के दोषों को धीरे धीरे क्रम से शोधे ॥
उक्त्वा सौण्डालशुद्धिरेव शास्त्रानुसारत ।
अथेदानी मौर्त्विकाख्यलोहशुद्धिक्रमोच्यते ॥ १४५ ॥
तैलद्रावककाषायत्रयैस्सम्यक् सुशोधयेत् ।
सौण्डालवत् पाचनादिक्रियाश्चास्यापि वर्णिता ॥१४६॥
सौण्डालशुद्धि इस प्रकार शास्त्रानुसार कह कर अब मौर्विक लोहे की शुद्धि का क्रम तैलद्रावक
काषायों से सम्यक् सौण्डाल की भाँति शोधन पाचन आदि क्रिया भी उसकी कही हैं ॥ १४५-१४६ ॥
तदुक्तं संस्कारदर्पणे--यह कहा है संस्कारदर्पण में—
शिवारितैलात् कुडुपस्य द्रावकाद् विषम्भरीचर्मकषाायतस्तथा सशोषये-
न्मौर्त्विकलोहज मल शास्त्रोक्तमार्गक्रमतो विशेषत ॥ इत्यादि ॥
एव सशोध्य मौर्त्विकलोह पश्चात् समाहरेत् ।
सस्कार बीजलोहानामेवमुक्त्वा यथाविधि ॥ १४७ ॥
अथेदानीमूष्मपानामुत्पत्तिक्रममुच्यते ॥
शिवारि तैल ? से, कुडुप ? के द्रावक से, विषम्भरी चर्म—विषम्भरी छाल ? के काषाय से
सशोचन करे मौर्तिक लोहज मल को शास्त्रोक्त मार्गक्रम से शोध कर लें । बीज लोहों का संस्कार इस
प्रकार यथाविधि कहकर अब ऊष्म लोहों का उत्पत्तिक्रम कहा जाता है ॥ १४७ ॥