बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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वार भोजनविधि में अकाल भोजन है दिन में तीसरे प्रहर से लेकर चतुर्थ प्रहर तक कहा है, संन्यासियों
का एक बार भोजन का अधिकार होने से एक काल पर ही करना, शूद्रों आदि का तो भोजन में दिनरात
के विभाग से दिन में तीन बार रात्रि में एक बार यह कालनिर्णय है, उनका भोजन में काल नियम
नहीं यथेच्छ भोजन को जानते हैं । इत्यादि । दिन में तीन बार रात्रि में दो बार भोजन आकाश में
चालक यात्रियों का क्रम से होता है जोकि पांच बार भोजन में कालनिर्णय है ॥४७॥
तदभावे सत्त्वं गोलो वा ॥ अ० १ सू० १० ॥
बो० वृ०
पदत्रय भवत्यस्मिन्नाहारान्तरबोधकम् ।
तदर्थं (ह ?) सम्प्रवक्ष्यामि समासेन यथामति ॥४८॥
आहारासम्भवे तेषां तत्सारेण कृतान् मृदून् ।
प्रदद्याद् घननिःस्वाकानाहारार्थं यथाविधि ॥४६॥
इस सूत्र में तीन पद हैं आहारान्तर—अन्य आहार के स्थान को बोधन कराने वाले उनके
अर्थ को मैं यथामति संक्षेप से कहूंगा, आहार की सम्भावना न होने पर उनके सार—आटे आदि के
बने कोमल घननिस्पाक—पिण्डों—लड्डुओं को आहारार्थ यथाविधि दे ॥४६॥
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प ग्रन्थ में—
आहारा पञ्चधा प्रोक्ता देहपुष्टिकराश्शुभा ।
अन्नकाञ्जिकपिष्टप्रद्रोटिकासत्त्वरूपतः ॥५०॥
तेषु श्रेष्ठतरो सत्त्वगोलाविति कीर्तितो ।
देह की पुष्टि करने वाले आहार—भोजन पाच प्रकार के कहे हैं । अन्न, काञ्जिक—धान्याम्ल
(खट्टा अन्नरस), पिष्ट—लुगदी, रोटिका, सार—चूर्णरूप में उनमें सत्त्व—सार—चूर्ण—भुनाचून—कसार और
गोल—लड्डू कहे हैं ॥५०॥
उक्तं हि पाकसर्वस्वे—कहा ही पाकसर्वस्व में—
धान्याद्याहारवस्तूना सत्त्वमाहृत्य यन्त्रतः ।
पाक कृत्वा पाचनाख्ययन्त्रभाण्डे यथाविधि ॥५१॥
उक्ताष्टमेन पाकेन सत्त्वगोलान् प्रकल्पयेत् ।
सुगन्ध मधुर स्निग्धमाहार पुष्टिवर्धनम् ॥५२॥ इति
धान्य आदि आहार वस्तुओं के चूर्ण —आटे को चक्की यन्त्र से लेकर पाचना नामक—कढाई
आदि में यथाविधि पाक करके कहे आठवें भाग पाक से सत्त्वगोल—लड्डू बनावे. उसमें सुगन्ध मधुर
स्निग्ध डालकर पुष्टिवर्धक आहार बनावे ॥ ५१–५२ ॥
फलमूलकन्दसारो वा ॥ अ० १ सू० ११ ॥
बो० वृ०