बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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मार्तण्डशक्ति संकेत से 'र' अक्षर से निरूपित की है, ३७ वचुंली नामक भूतशक्ति 'त' अक्षर
संकेत से निरूपित की है। १०६३ ऋक्षमका नामक नक्षत्र शक्ति संकेत से 'व' अक्षर से यहाँ वर्णित है ।
११३ वरुण नामक अर्क शक्ति 'इ' अक्षर संकेत से रुजका नामक निरूपित की है, इन्दु-चन्द्रशक्ति 'क'
अक्षर से १०१२ पूषिण्का नाम वाली कही है ॥ १२७-१३१ ॥
संकेतितानुसारेण तथैवात्र यथाक्रमम् ।
एव त्रिलोहशक्तीना वर्णांसंकेतनिर्णयम् ॥ १३२ ॥
निरूप्य तल्लोहशुद्धिक्रममत्र तत परम् ।
प्रसङ्गानुप्रसङ्गत्या किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ १३३ ॥ इति
संकेतों के अनुसार वैसे ही यहां यथाक्रम इस प्रकार तीन लोहों की शक्तियों के अक्षर संकेत-
निर्णय निरूपित करके उससे आगे उन लोहों की शुद्धि यहां प्रसङ्गानुप्रसङ्ग से कुछ निरूपित की
जाती है ॥ १३२-१३३ ॥
तच्छुद्धिर्र्यथाशोधनाधिकारे ॥ अ० १ सू० १४ ॥
बो० वृ०
तल्लोहशुद्धिं निर्णेतुं सूत्रोय परिकीर्तित ।
पदानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् कथितानि यथाक्रमम् ॥ १३४ ॥
तेष्वादिमपदाल्लोहत्रयशुद्धिनिरूपिता ।
तच्छोधनप्रकारस्तु द्वितीयपदत स्फुटम् ॥ १३५ ॥
तत्प्रबोधकशास्त्र तु तृतीयेनात्र सूचितम् ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ १३६ ॥
सस्कारदर्पणविधिमनुसृत्य यथामति ।
सोमसोण्डालमौक्तिकलोहाना शुद्धिनिर्णयं ॥ १३७ ॥
उन लोहों की शुद्धि के निर्णय को यह सूत्र कहा गया है, इस सूत्र में तीन पद यथाक्रम कहे
हैं उनमें आदिम पद से तीन लोहों की शुद्धि निरूपित की है उनका शोधन प्रकार तो दूसरे पद से
स्फुट किया है उनका प्रबोधक शास्त्र तो तीसरे पद से यहां सूचित किया है । पदों का अर्थ इस प्रकार
कहा है विशेष अर्थ अथ कहा जाता है । सस्कार दर्पणविधि का अनुसरण करके यथामति सौम सोण्डाल
मौक्तिक लोहों की शुद्धि का निर्णय करते हैं ॥ १३४-१३७ ॥
पृथक् पृथग्विधानेन सग्रहात् सन्निरूप्यते ।
तत्रादौ सोमलोहस्य शोधनाक्रममुच्यते ॥ १३८ ॥
सोमलोह समाहृत्य पाचके सम्प्रपूरयेत् ।
सप्तविंशतिकक्ष्योष्णवेगात् सम्पाचयेद् द्रवात् ॥ १३६ ॥
जम्बीरलिकुचव्याघ्रिचाङ्गेरीजम्बूरसैस्तथा ।
विवृतास्येन नालयन्त्रे पाचयेद् दिवसावधि ॥ १४० ॥