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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

३६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
इस प्रकार ऊष्मप लोहों का विमान योग्य होना प्रमाण से कहकर उनके स्वरूप का निर्णय
करने को पूर्व मार्गानुसार उनके बीज लोहों के स्वरूप आदि के विषय में भली प्रकार विचार किया
जाता है । भूगर्भस्थित खनिज रेखाओं की पंक्तियों में सातवें पंक्तिस्तर में तीन खनिज रेखास्तरों में
जो लोहे सौमजातीय ऊष्म लोह की उत्पत्तिविधि में मुख्यत्व से निश्चित किए हैं ॥८१-८४॥
तदुक्तं लोहतन्त्रे-यह लोहतन्त्र में कहा है -
रेखासप्तमस्य तृतीयखनिजलोहा पञ्चशक्तिमयास्सौमजातीयास्ते
बीजलोहा इति ॥
सातवीं रेखा में स्थित तीन खनिजस्तर में उत्पन्न लोहे पांच शक्तियों से पूर्ण सौमजातीय
बीज लोहे हैं ॥
बोधानन्दकारिका-बोधामन्दकारिका--
भूगर्भखनिजरेखास्त्रिसहस्राधिकास्स्मृता ।
त्रिशतोत्तरसहस्ररेखास्तेषूत्तमा क्रमात् ॥८५॥
रेखानुगुणतस्तासु खनिजास्सन्निरूपिता ।
तेषु सप्तमरेखास्थखनिजास्सप्तविंशति ॥८६॥
तेषु तृतीयखनिजगर्भकोशसमुद्भवाः ।
पञ्चशक्तिमया ये स्युस्ते लोहा बीजसंज्ञकाः ॥८७॥
तानेव सौमसोण्डालमौक्तिकाद्यैश्च नामभिः ।
प्रवदन्ति विशेषेण लोहशास्त्रविशारदाः ॥८८॥
लोहेषु सौमजातीनामुत्पत्तिक्रमनिर्णयं ।
लोहकल्पानुसारण किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥८६॥
भूगर्भ की खनिज रेखाएं तीन सहस्र से अधिक कही हैं, उनमें क्रम से एक हजार तीन सौ
रेखाएं उत्तम हैं उनमें रेखानुसार खनिज कहे हैं उनमें सातवीं रेखा में स्थित खनिज २७ हैं उनमें
तीन खनिज गर्भकोशों में उत्पन्न होने वाले पांच शक्तियों से पूर्ण जो लोह हैं उन्हें ही सौम सौण्डाल-
मौक्तिक आदि नामों से लोहशास्त्रज्ञ विशेषतः कहते हैं। लोहों में सौम आदि के उत्पत्तिक्रम का निर्णय
'लोहकल्प' शास्त्र के अनुसार कुछ यहां निरूपित किया जाता है ॥ ८५-८६ ॥
उक्तं हि लोहरहस्ये-लोहरहस्य में कहा है-
कूर्मकश्यपमार्तण्डभूतभाना तथैव हि ।
अर्केन्दुवाडवानां च शक्तयस्स्वाशतः क्रमात् ॥ ६० ॥
अष्टैकादशपञ्चद्विष्ट्चतुर्नवसंख्यका ।
खनिजान्तर्गर्भकेन्द्रशक्त्याकर्षणातस्स्वयम् ॥ ६१ ॥
शनैश्शनैस्समागत्य गर्भकोशं विशन्ति हि ।
तत्र वारुणीशेषगजशक्त्यूष्मभि क्रमात् ॥ ६२ ॥