बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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पदत्रय तु सूत्रेस्मिन् भुक्तिकालनिर्णये ।
उक्त स्यात् सग्रहेणाद्य तदर्थस्सन्निरूप्यते ॥४०॥
पूर्वोक्तत्रिविधाहारास्तच्छब्देनात्र वर्णिताः ।
भुक्तिकालविधिसम्यग् द्वितीयपदत्स्मृत ॥४१॥
इत्थम्भावेति†शब्द स्यादिति शब्दार्थनिर्णय ।
आहारोत्र प्रभेदेन यन्तॄणा पञ्चधा स्मृत (म् ?) ॥४२॥
इस सूत्र में भोजनकालनिर्णयप्रसङ्ग में तीन पद कहे हैं, अब संक्षेप से अर्थ कहा जाता है ।
पूर्वोक्त तीन प्रकार के आहार तन् शब्द से यहां वर्णित किए हैं भोजनकाल का विधान दूसरे पद से
कहा है, इत्थम्भाव के अर्थ में इति शब्द है यह शब्दार्थ का निर्णय है, चालक यात्रियों का आहार
यहां भेद से पांच प्रकार का कहा है ॥
तदुक्तं शौनकीये—यह कहा है शौनकीय सूत्र में—
अथ भोजनकालविधिं व्याख्यास्याम कालाकालविभागेन गृहिणा
द्वावेकमित्येक मस्करिणा चतुर्वंतरेषा पञ्चधा यानयन्तॄणा यथेच्छ
योगिनामिति ॥
अब भोजन की कालविधि को काल अकाल विभाग से कहूंगा गृहस्थों का दो काल एक काल,
संन्यासियों का एक काल, अन्यों का चार बार, विमान के चालक यात्रियों का पाच बार करना और
योगियों का इच्छानुसार करना ॥
लल्लकारिका—लल्लकारिका है—
कालयोर्भोजनमिति सूत्रवाक्यानुसारत ।
अह्नि द्वितीययामान्ते रात्रौ प्राथमिकान्तरे ॥४३॥
सकालभोजने प्राहुर्गृहिणा कालनिर्णय ।
अकालभोजने तेषामेकभुक्तविधौ क्रमात् ॥४४॥
दिवि तृतीययामाया चतुर्थान्तमिति स्मृत ।
एकभुक्ताधिकारत्वाद् यमिनामेकमेव हि ॥४५॥
अहोरात्रविभागेन शूद्रादीना तु भोजने ।
अह्नि त्रिधैकधा रात्राविति कालविनिर्णय ॥४६॥
भोजने नास्त्यतस्तेषा यथेच्छ भोजन विदु । इति
अह्नि त्रिधा द्विधा रात्रावाकाशे यन्तॄणा क्रमात् ।
पञ्चधा भुक्तिकालस्य निर्णय परिकीर्तित ॥४७॥
सूत्रवाक्यानुसार दो कालों में भोजन है । दिन में दूमरे प्रहर के अन्त में रात्रि में प्रथम
प्रहर के अन्दर । गृहस्थों का कालनिर्णय सकाल भोजन में अर्थात् निश्चितकाल पर करना, उनका एक
† 'इत्यम्भाव इति' उभयोरेकादेश आर्ष ।