बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 48, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंकापी संख्या २—
अथ वस्त्राधिकरणम् ।
अब वस्त्र का अधिकरण प्रस्तुत करते हैं ।
यन्तृप्रावरणीयौ पृथक् पृथगृत्तुभेदात् ॥ अ० १ सू० ६ ॥
बो० वृ०
वस्त्रप्रबोधकपदान्यन्तॄ णामृतुभेदतः ।
उक्तानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् तेषामर्थो विविच्यते ॥ १॥
धारणाच्छादनवस्त्रप्रभेदो यन्तॄणा क्रमात् ।
सूत्रादिमपदेनोक्त द्वितीयपदतस्तथा ॥ २ ॥
तेषा सस्कारतद्वर्णगुणजात्यादय स्मृता ।
सूत्रतृतीयपदत कालभेदो निरूपित ॥ ३ ॥
इत्थ सूत्रार्थमुक्तवाथ विशेषार्थो निरूप्यते ।
अनन्तसूर्यकिरणशक्तिवैचित्र्यभेदत ॥ ४ ॥
वसन्ताद्याष्षडृतव प्रभवन्त्यदितेर्मुखात् ।
यजुराण्यके सूर्यानन्तत्वप्रतिपादने ॥ ५ ॥
यद् द्याव इन्द्र ते † शतमितिवाक्याच्छ्रु तिर्जगौ ।
ऋतुभेद से विमानचालक यात्रियों के वस्त्रों के प्रबोधक पद तीन सूत्र में कहे हैं उनके
अर्थ का विवेचन किया जाता है । यात्रियों के पहिनने और ओढने का वस्त्रभेद क्रम से सूत्र के
आदिम पद से कहा दूसरे पद से संस्कार उसके वर्ण गुण जाति आदि कहे हैं, तीसरे पद से कालभेद
कहा है इस प्रकार सूत्रार्थ कह कर विशेष अर्थ निरूपित किया जाता है, अदिति-व्यात अग्नि के मुख
से एवं अनन्त सूर्यकिरण शक्तियों की विचित्रता के भेद से वसन्त आदि छः ऋतुएं होती हैं । यजुर्वेद
के आरण्यक में सूर्य किरणों की अनन्तता प्रतिपादन होने से “यद् द्याव इन्द्र ते शतम्” ( तै० आ० १ ।
७ । ५) हे इन्द्र सूर्य तेरी किरणें सैकड़ों सहस्रों हैं † । इस प्रकार वाक्य श्रुति ने गान किया-कहा
है ॥ १-५ ॥
† “शत बहुनाम” ( निघ० )