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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 368 में से

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पृष्ठ 62

लोहाधिकरण ] [ ३६
तथैव ध्रुववर्गस्थसोमवाडवशक्तितु ।
इन्दुशक्तिस्सोमकाख्या नवोत्तरशतात्मिका ॥ १११ ॥
सूर्यकिरणवर्ग में मार्तण्ड और भूतों से उत्पन्न शक्तियों में ७१वीं शक्ति मार्तण्ड की अम्बरा है,
रुचिका नामक भूतशक्ति १६०वीं है, ये दोनों शक्तियां सङ्केतरूप से 'ओ' अक्षर में दिखलाई हैं, तथा
अदितिगर्भ में स्थित सूर्यनक्षत्रों में सुन्दारूय नौवीं शक्ति आदित्य की वैसी ही नक्षत्र की शक्ति भौमाख्य
१०१ कही, ये दोनों शक्तियां यहां 'म' अक्षर से वर्णित करी हैं। वैसे ही ध्रुव वर्ग में स्थित सोमवाडब
शक्तियों में इन्दु-चन्द्रमा की शक्ति सोमनाम १०९वीं कही है ॥ १०७-१११ ॥
तथैव वाडवाशक्तिमेलनारूया चतुर्दशी ।
इमो साङ्केतिकादत्र विसर्गै सन्निरूपिते ॥ ११२ ॥
एव चत्वारि वर्गस्थशक्तयस्ता परस्परम् ।
खनिजाना गर्भकोशे मिलित्वा कालपाकतः ॥ ११३ ॥
सोमजातीयलोहत्व प्राप्नोत्येव† न सशय ।
आह्वत्याष्टौ शक्तयोस्मिन् विचारे सम्प्रदृश्यन्ते ॥ ११४ ॥
एवमुक्त्वा सोमलोहशक्तिसङ्केतनिर्णयम् (य ?)
अथ सोण्डाललोहस्य शक्तिसङ्केतमुच्यते ॥ ११५ ॥
कूर्मस्थधनदा नाम शक्तिरेकादशात्मिका ।
क्रमात् साङ्केतिकादत्र सकारेणाभिवर्णिता ॥ ११६ ॥
वैसे ही वाडवाशक्तिमेलन नामक १४वीं है, ये दोनों शक्तियां सङ्केत से यहां विसर्ग ' : ' से
निरूपित की हैं । इस प्रकार चार वर्गों में स्थित शक्तियां परस्पर खनिजों गर्भकोशों में मिलकर कालपाक
से सोम जाति के लोहपन को प्राप्त हो जाती हैं इसमें संशय नहीं । आठों शक्तियां मिलकर इस विचार
में दिखलाई पड़ती हैं । इस प्रकार सोम लोहशक्तियों के सङ्केत का निर्णय कहकर अब सोण्डाल लोह
की शक्तियों का सङ्केत निर्णय कहा जाता है। कूर्मस्थ धनदा-कुबेरों की शक्ति ११वीं है (११ रूपों में
है ) सङ्केत से यहां 'स' अक्षर से कही है ॥ ११२-११६ ॥
ऋङ्नामा काश्यपी शक्तिर्दशोत्तरशतात्मिका ।
पूर्ववत्सङ्केतिता स्यादौकारेण यथाक्रमम् ॥ ११७ ॥
शक्तिर्द्रवमुखी नाम मार्तण्डस्य शतात्मिका ।
आण्वी नाम तथा भूतशक्तिस्सप्तशतात्मिका ॥ ११८ ॥
द्वाविमौ साङ्केतिते चात्रानुस्वारेण शाश्वत. ।
सूर्यस्यैकोनपञ्चाशच्छक्ति. कान्ताभिधा तथा ॥ ११९ ॥
नक्षत्राणा पञ्चविंशच्छक्तिर्वर्चोभिधानका ।
उभो साङ्केतिते चात्र डकारेण यथाक्रमम् ॥ १२० ॥
† प्राप्नोति—एकवचनं' वचनव्यत्ययेन बहुवचने ।