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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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३२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
पूर्वसूत्रे धान्यसत्त्वाहारमुक्तं हि यन्तॄणाम् ।
तथैवास्मिन् कन्दमूलफलसत्त्वमपीयते ॥५३॥
प्रथम कन्दसत्त्वस्स्याद् द्वितीयो मूलसत्त्वकः ।
फलसत्त्वस्तृतीयस्स्यादिति सूत्रार्थनिर्णय ॥५४॥
पूर्व सूत्र में धान्य—गेहूं आदि अन्न के चूर्ण—भुने आटे आदि का बना विमानचालक
यात्रियों का आहार कहा गया है वैसे ही उस सूत्र में कन्द मूल फल के सत्त्व—गूदे मीगी आदि को
आहार कहा है । प्रथम कन्दसत्त्व हो दूसरे मूल का सत्त्व हो तीसरे फलसत्त्व हो यह सूत्रार्थ है ॥५३-५४॥
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प में—
अलाभे धान्यसत्त्वस्य सत्त्वत्रयमुदाहृतम् ।
कन्दसत्त्वो मूलसत्त्व फलसत्त्व इति क्रमात् ॥५५॥
पिष्टशंकरामञ्जूषमधुक्षीरघृतादय ।
स्निग्धोदकक्षारकटुकमञ्जूषाम्लम्लु