बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तस्मादनन्तसूर्याणामंशुशक्तिसमाकुलात् ।
विषामृतविभागेन भिद्यन्ते ऋतुशक्तयः ॥ ६ ॥
छेदिनी रक्तपामेधस्सिराहार्यादय क्रमात् ।
पञ्चविंशतिसंख्याका ऋतूना विषशक्तय ॥ ७ ॥
त्वङ् मांसमेधामज्जास्थिस्नायुरक्तरसादिकान् ।
वेरबीजान् नश्यन्ति खपथे यानयन्तॄणाम् ॥ ८ ॥
तस्मात्तद्वेरबीजादिरक्षणार्थं कपर्दिना ।
ऋतुशक्त्यनुसारेण वस्त्रभेदा निरूपिता ॥ ६ ॥
अत. अनन्त सूर्यों के शक्तिसमूह से विष और अमृत के विभाग से ऋतुशक्तियां भिन्न-भिन्न
हो जाती हैं । छेदिनी अङ्गछेदन करनेवाली, रक्तपा-रक्त पीनेवाली, मेधा-मद मांस चिकनाई सिरा आहार
वाली क्रम से सख्या में ऋतुओं की विषशक्तियां है जो कि आकाशमार्ग में विमानयात्रियों के त्वचा
मांस मेद मज्जा-चर्बी हड्डी नाडो रक्त सिरा आदि वेर वोजों-शरीर के तत्त्वों को नष्ट करती हैं । अत
शरीर के तत्त्वों की रक्षा के अर्थ कपर्दी ने ऋतुशक्ति के अनुसार वस्त्रों के भेद निरूपित किये हैं ।६-६।
उक्तं हि पटसंस्काररत्नाकरे—कहा ही है पटसंस्कार रत्नाकर ग्रन्थ में—
पट्टकार्पासशैवाललोमाभ्रकत्वगादिकान् ।
सप्तविंशतिसंस्कारशुद्धानभ्रकवारिणा ॥ १० ॥
क्षालयित्वात् तान् सर्वान् यन्त्रे संधाय शास्त्रत ।
गालवोक्तविधानेन तन्तून् सम्यक् प्रकल्पयेत् ॥ ११ ॥
केतकीवटतालार्कनारिकेलशणादय ।
तत्तच्छुद्धिप्रकारेण शोधयित्वाष्टवारत ॥ १२ ॥
एकोनविंशत्संस्कारैस्सस्कृत्य विधिवत् क्रमात् ।
तत्तद्वल्कलमादाय यन्त्रे तन्तुमुखाभिधे (दे?) ॥ १३ ॥
समग्रैणाथ संधायं तन्तून् कृत्वा यथाविधि ।
गालवोक्तेन मार्गेण कुर्याद् वस्त्राण्यथाक्रमम् ॥ १४ ॥
पश्चाद् वस्त्रान् समाहृत्य पञ्चतैलेस्तु पाचयेत् ।
अतसीतुलसीधात्रीशमीमालुरुचक्रिकाः ॥ १५ ॥
रेशम, रुई, जलकाई, बाल, अभ्रकपरत आदि को २७ संस्कार शुद्ध करे हुओं को अभ्रक-
जल या कपूरजल या नागरमोथे के जल से प्रक्षालित करके सबको शास्त्र से यन्त्र में रखकर गालव
की विधि से धागों को बनावे । केतकी—केवड़ा, ( बांस केवड़ा) वड़, ताड़, आक, नारियल, सण आदि
उस उसके शुद्धिप्रकार से ८ वार शोध कर १६ संस्कारों से विधिवत् करके उसके उस उसके वक्कल
लेकर तन्तुमुख नामक यन्त्र में रखकर तन्तुओं को बनाकर गालव के कहे मार्ग से वस्त्र यथाक्रम करे
पश्चात् वस्त्रों को लेकर पांच तेलों से पकावे जो कि पांच तैल हैं अलसी,'तुलसी, आमला, शमी, मालु-
काली तुलसी, रुचिका-सरसों ॥ १०—१५ ॥