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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

लोहाधिकरण ] [ ३७
मिलित्वा लोहता यान्ति शक्तिसम्मेलने यथा ।
बीजलोहेष्विमे सोमलोहा इति विनिर्णिता ॥ ६३ ॥
एतेषा नामशक्त्यादिनिर्णयस्तु यथामति ।
यथोक्तमत्रिणा साक्षात् तथैवात्र निरूप्यते ॥ ६४ ॥
कूर्म—पृथिवी गर्भ की आकर्षण शक्ति,* कश्यप—पृथिवी की बाहिरी कक्षाशक्ति, मार्तण्ड—सूर्य-
किरण प्रवाह, भूत—तन्मात्राएं विशेषत वातप्रवाह, भ—ग्रहशक्ति, अर्क—सूर्य की आन्तरिक आकर्षण
शक्ति, इन्दु—चन्द्रमा, वाडवा-कालगति या सूर्य और पृथिवी आदि के मध्य पृथिवी आदि को वहन
करनेवाली शक्ति। ये सब अपने अपने अंश से ३, ८, ११, ५, २, ६, ४, ६ शक्तिया खनिज अन्तर्गत
गर्भकेन्द्र शक्ति के आकर्षण से स्वय धीरे धीरे मिलकर गर्भकोश को प्रविष्ट हो जाती हैं। वहां वारुणी-
पृथिवी की आर्द्रशक्ति या स्निग्धशक्ति, शेष—मेरुदण्डशक्ति—निजी पिण्डीकरणशक्ति, गज—क्षितिज-
प्रवाह शक्तियों की ऊष्मांशों से मिलकर लोहे के रूप को प्राप्त होते हैं जैसे ही शक्ति का सम्मेलन हो
जावे। बीज लोहों में ये सौम लोहे निर्णय किए गए हैं। इनके नाम शक्ति आदि निर्णय यथामति
अत्रि ने कहे हैं वैसे ही यहां निरूपित किए जाते हैं ॥ ६०-६४ ॥
उक्तं हि नामार्थकल्पे—कहा ही है नामार्थकल्प ग्रन्थ मे —
सोमस्सौम्यक्सुन्दास्यसोम पञ्चाननस्तथा ।
उष्णारिरूष्मपशृङ्गसोण्डीरो लाघवोर्मिप ॥ ६५ ॥
प्राणानशङ्खकपिल इति नामान्यथाक्रमम् ।
सौमाख्यबीजलोहस्य वर्णितानि विशेषत ॥ ६६ ॥
तथैव बीजलोहाना नामसक्लृप्तशक्तय ।
एकैकनामतस्सम्यग् निर्णितास्स्युर्यथाविधि ॥ ६७ ॥
सौमाख्यनामसङ्क्लृप्तशक्तीर्यास्सम्प्रकीर्तिता ।
ता एव संनिरूप्यन्ते सग्रहादत्र साम्प्रतम् ॥ ६८ ॥
सौम, सौम्यक, सुन्दास्य, सोम, पञ्चानन, उष्णारि, ऊष्मप, शृङ्ग, सोण्डोर, लाघव, ऊर्मिप,
प्राणन, शङ्ख, कपिल ये नाम यथाक्रम सोम नामक बीज लोहे के कहे हैं वैसे ही बीज लोहे की नाम
द्वारा निष्पन्न शक्तिया जो कही हैं वे यहा अब निश्चित की जाती हैं ॥ ६५-६८ ॥
उक्तं हि नामार्थकल्पे—कहा है नामार्थकल्प ग्रन्थ में—
सू० सोमरस ओ्मविसर्ग† (नुस्वार ?) शक्तितश्च ॥ इति
बोधानन्दकारिका—
विमानरचनार्थाय ये लोहा कृतका स्मृता ।
तेषा सौमादयो बीजलोहा इति विनिर्णिता ॥ ९९ ॥
स ओ्मविसर्ग† (नुस्वार ?) शक्तिभागसम्मेलनाद्यत ।
लोहत्वमभजत् तस्मान्नाम सोम इतीरितम् ॥ १०० ॥

  • "कूर्मो बिभर्ति धरणीं खलु चात्मपृष्ठे" ( शुक० ४४।११ )
    † अनुस्वार, हस्तलेख मे प्रमादत पाठ है ( देखो श्लोक ११२ )