बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंवस्त्राधिकरण ] [ २७
एतदोषधिबीजानां तैलात् सप्ताहमातपे ।
प्रत्यहं पञ्चधाताप्त्वा शुष्कं कृत्वा ततं परम् ॥ १६ ॥
गोपीलाक्षाचण्डमुखीमधुपिष्टाभ्रकासमम् ।
सम्मेल्य एणाक्षारेण बृहन्मूषामुखे क्रमात् ॥ १७ ॥
सम्पूर्य विधिवत् सर्वं कूर्मव्यासटिकान्तरे ।
निधाय त्रिमुखीभस्त्राद् धमनेच्छिञ्जीरवेगत ॥ १८ ॥
तन्मध्येऽगस्तिपत्राणां रसप्रस्थाष्टकं न्यसेत् ।
माक्षिकाभ्रकसिञ्जीरवज्रटङ्कणवाकुटै ॥ १९ ॥
तैलमाहृत्य विधिवत् तस्मिन् पश्चान्नियोजयेत् ।
पश्चात् संगृह्य तत्काञ्जं गर्भतापनयन्त्रके ॥ २० ॥
सन्ताप्य तत्तैललिप्तवस्त्राण्यथ समाहरेत् ।
इन ओषधियों के बीजों के तैल से सप्ताहभर धूप में प्रतिदिन पांच बार तपाकर सुखाकर
गोपी-गोपिका-कृष्ण सारिवा, लाख चण्डमुखी-इमली, मधु, पिष्ट-तिल की खल, अभ्रक ये समान लेकर
एणक्षार ?-ऐणाक्षार हरिणशृङ्ग भस्म के क्षार से मिला कर बड़ी मूषा (कृत्रिम बोतल) के मुख में भर
कर कूर्मव्यासटिका-कछवे के आकारवाले कुण्ड के अन्दर रखकर तीन मुखवाली भस्त्रा से सिञ्जीर ? के
वेग से धमन करे। उसके मध्य मे अगस्त्य वृक्ष के पत्तों का ८ सेर रस डाल दे स्वर्णमाक्षिक अभ्रक
सिञ्जीर ? थूहर, सुहागा, वाकुट-वाकुची ? या बाकुज-वकुल का फल वस्तुओं से विधिवत् तैल लेकर उस
में डाल दे पश्चात् लेकर गर्भगत यन्त्र में उनके काञ्ज ?-रस तपाकर उस तैल से लिप्त वस्त्र लेले ॥१६-२०
अग्निमित्रोक्तविधिना पटजात्यनुसारत ।
ऋतुधर्मानुसारण कवचादीन् प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
तत्तत्कालोचितान् वस्त्रकवचादीन् यथाक्रमम् ।
यानयन्त्रत्वाधिकारवरिष्ठेभ्यो मनोहरान् ॥ २२ ॥
दत्त्वा स्वस्त्ययनं कृत्वा रक्षाकरणपूर्वकम् ।
पश्चात् सम्प्रेषयेद् यानयन्त्रकर्माणि हर्षत ॥ २३ ॥
सर्वदोषविनाशस्स्यात् तत्पट्टैर् बलवर्धनम् ।
मेधोवृद्धिर्धातुवृद्धि रङ्गपुष्टिरजाड्यता ॥ २४ ॥
अग्निमित्र की कही विधि में पट जाति के अनुसार ऋतु धर्मानुसार कवच आदि बनावें, उस
उस काल के योग्य वस्त्र कवच आदि यथाक्रम मनोहर विमानचालन अधिकार में श्रेष्ठों के लिये देकर
स्वरूपयन रक्षाकरणपूर्वक करके उन्हें हर्ष से विमानचालन के कार्य में प्रेरित करे, सर्व दोषों का विनाश
हो उन वस्त्रों से विमानयात्रियों का बल बढ़े, मेधा बढे, धातु वृद्धि हो अङ्ग पुष्टि स्फूर्ति अङ्गरक्षण आदि
हो ॥ २१–२४ ॥