बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
आहाराधिकरणम् ।
भोजन का अधिकरण ।
आहारः कल्पभेदात् ॥ अ० १ सू० ७ ॥
बो० वृ०
यन्तॄणामाहारभेदनिर्णयार्थं पदद्वयम् ।
सूत्रेऽस्मिन् कथितं सम्यक् तदर्थस्सम्प्रचक्षते ॥ २५ ॥
कल्पशास्त्रोक्तरीत्यात्र ऋतुकालानुसारतः ।
यन्तॄणामाहारभेदास्त्रिविधा इति निर्णता ॥ २६ ॥
चालक यात्रियों के आहारभेद के लिये इस सूत्र में दो पद कहे हैं उनका अर्थ कहा जाता
है, कल्पशास्त्र में कही रीति से यहां ऋतुकाल के अनुसार चालक यात्रियों के आहारभेद तीन प्रकार के
निर्णीत किए हैं ॥ २५—२६ ॥
तदुक्तमशनकल्पे—यह भोजनकल्प ग्रन्थ में कहा है—
रसवर्गे माहिषीया धान्येष्वाढकशालीको ।
मासेष्वाविक (कि ?) मास च वसन्तग्रीष्मयोरिति ॥२७॥
रसेषु गव्यसम्बन्धा धान्ये गोधूममुद्गकाः ।
मासेषु कालज्ञानीय वर्षाशरदृतावपि ॥ २८ ॥
रसेष्वजा रसाश्चैव धान्येषु यवमुद्गकाः ।
मासेषु कलविंकाश्च हेमन्तशिशिरे क्रमात् ॥ २६ ॥ इत्यादि
विनामिषं द्विजातीनां भुक्तिस्सममितीरितम् ।
दुग्ध वर्ग में भैंस के दूध धान्य में अरहर शाली चावल मांसो में भेड़ का मांस भोजन है
वसन्त और ग्रीष्म ऋतु में । दुधों में गौ के दूध धान्य में गेहूं मूंग मांस में कालज्ञानीय-मुर्गे का मांस
वर्षा और शरद् ऋतु में । दूधों में बकरी के दूध धान्यों में जौ मूंग मांसों में चिड़िया कबूतर का मांस
हेमन्त शिशिर ऋतु में क्रम से हैं । द्विजों का मांस के बिना भोजन समान कहा है ॥ २७—२६ ॥
विषनाशास्त्रिभ्यः ॥ अ० १ सू० ८ ॥
बो० वृ०
सूत्रे पदद्वयं प्रोक्तं विषनाशार्थबोधकम् ।
तदर्थं सम्प्रवक्ष्यामि समासेन न विस्तरात् ॥३०॥
पञ्चविंशतिसंख्याका ऋतुजा विषशक्तय ।
पूर्वोक्ताहारभेदेन विनाशं यान्ति नान्यथा ॥३१॥
सूत्र में विषनाशार्थ बोधक दो पद कहे हैं उनके अर्थ संक्षेप से कहूंगा विस्तार से नहीं ।