बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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कुलित्थनिष्पावकसर्षपाढकगोधूमकाषायकाञ्जिकैश्च ।
सशोषयेत् सौण्डालिकलोहदोष शास्त्रोक्तमार्गेण शनैश्शनै क्रमात् ।। इति
इङ्गल—इंगुदी, गौरो—मजीठ, सुराटिका—वराटिका—कौड़ी, मृद्वी—मुनक्का
से पूर्ण तेलों से तथा अङ्कोल—अङ्कोलवृक्ष--ढेरा, मुष्टि घण्टा—पाटलावृक्ष, शङ्ख, भिलावा, काकोल—
काकोली, विरञ्चक ? द्रवों से कुलित्थ—लालकुलथी, निष्पावक—श्वेतान्नफली, सरसों, अरहर, गेहूँ के
कषायों और काञ्जियों से शास्त्रोक्त मार्ग से सौण्डाल लोहे के दोषों को धीरे धीरे क्रम से शोधे ॥
उक्त्वा सौण्डालशुद्धिरेव शास्त्रानुसारत ।
अथेदानी मौर्त्विकाख्यलोहशुद्धिक्रमोच्यते ॥ १४५ ॥
तैलद्रावककाषायत्रयैस्सम्यक् सुशोधयेत् ।
सौण्डालवत् पाचनादिक्रियाश्चास्यापि वर्णिता ॥१४६॥
सौण्डालशुद्धि इस प्रकार शास्त्रानुसार कह कर अब मौर्विक लोहे की शुद्धि का क्रम तैलद्रावक
काषायों से सम्यक् सौण्डाल की भाँति शोधन पाचन आदि क्रिया भी उसकी कही हैं ॥ १४५-१४६ ॥
तदुक्तं संस्कारदर्पणे--यह कहा है संस्कारदर्पण में—
शिवारितैलात् कुडुपस्य द्रावकाद् विषम्भरीचर्मकषाायतस्तथा सशोषये-
न्मौर्त्विकलोहज मल शास्त्रोक्तमार्गक्रमतो विशेषत ॥ इत्यादि ॥
एव सशोध्य मौर्त्विकलोह पश्चात् समाहरेत् ।
सस्कार बीजलोहानामेवमुक्त्वा यथाविधि ॥ १४७ ॥
अथेदानीमूष्मपानामुत्पत्तिक्रममुच्यते ॥
शिवारि तैल ? से, कुडुप ? के द्रावक से, विषम्भरी चर्म—विषम्भरी छाल ? के काषाय से
सशोचन करे मौर्तिक लोहज मल को शास्त्रोक्त मार्गक्रम से शोध कर लें । बीज लोहों का संस्कार इस
प्रकार यथाविधि कहकर अब ऊष्म लोहों का उत्पत्तिक्रम कहा जाता है ॥ १४७ ॥