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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यहां वाचकरूप ओम् ही विमान है ऐसा वर्णित किया है गुरुद्वारा उपदिष्ट मार्ग से उस पर
शास्त्रानुसार आरोहण कर जो उपासक जन ब्रह्मचर्य आदि साधन द्वारा ब्रह्मपद को प्राप्त होते हैं वह ऐसा
ब्रह्मपद यहां मङ्गलश्लोकरूप वचन से विमान प्रतिपादित किया है ॥ १६—२० ॥
तदर्थबोधकपदान्यष्ट श्लोके स्मृतानि हि ।
द्वितीय (य्य ? )† पदतस्तेषु सम्यगुक्ता मुमुक्षव ॥ २१ ॥
स एव कर्तृवाची स्याज्जीववाचीति चोच्यते ।
यद्विमानगतेप्यत्र वाचक प्रणवस्मृत ॥ २२ ॥
विमानत्वेनात्र सम्यक्तदेव प्रतिपादित ।
एष एवादिमपदो भवेत् कर्तृविशेषणम् ॥ २३ ॥
तुरीयपदत प्रोक्तमवाङ्‌मानसगोचरम् ।
अखण्डेकरस ब्रह्म प्राप्तव्यस्थानमुत्तमम् ॥ २४ ॥
उक्तमेतत्कर्मपदमिति श्लोकान्वयक्रमात् ।
प्रणवाख्यविमानेन गमन यत्प्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥
तत्तृतीयपदेनोक्त वाच्यलक्ष्यैक्यबोधकम् ।
क्रियापदमिति प्रोक्तम (क्त ञ्च?)न्वयक्रमत (त?) स्फुटम् ॥२६॥
विशेषणपदानि स्यु कर्मणस्त्रीण्यथाक्रमम् । +
प्रसिद्धि (द्ध?) द्योतनार्थाय पञ्चम पदमीरितम् ॥ २७ ॥
तथैव सप्तपद नित्यानन्दप्रबोधकम् ।
सर्ववेदान्तमानत्वबोधार्थ चाष्टम पदम् ॥ २८ ॥
उसके अर्थबोधक आठ पद यहां श्लोक में स्मरण किए गये हैं—कहे हैं, उनमें द्वितीय पद
से मुमुक्षु भली प्रकार कहे हैं। वह ही ओम् कर्तृवाची अर्थात् जगत्कर्ता परमेश्वर का वाचक है और
जीववाची अर्थात् जीव का वाचक भी कहा जाता है ‡, यहां जिस विमानपदप्राप्ति पर भी ओम् वाचक
निश्चित है। यहां मङ्गलाचरण में विमानरूप से वह ही भली प्रकार प्रतिपादित किया है वह ही आदि
का पद अर्थात् ब्रह्मात्मा का प्रथम पाद या ओम् में अकार कर्तृविशेषण है। तुरीय पद अर्थात्—ब्रह्मात्मा
के चतुर्थ पाद या ओम् के अमात्ररूप से वाणी और मन के व्यवहार से रहित अर्थात्—अवर्णनीय और
अचिन्त्य अखण्ड एकरस उत्तम प्राप्तव्य स्थानरूप ब्रह्म कहा है। यह कर्मपद इस प्रकार श्लोकान्वय क्रम
में कह दिया ओम् रूप विमान से गमन करना पहुँचना या प्राप्त करना जो कहा गया है। तृतीय पद से
† यहा द्वितीय' मे यकारद्वय पूर्व की भांति दाक्षिणात्य हो सकता है।

  • यहा 'त्रीण्यथाक्रमम्' त्रीणि यथाक्रमम् मे त्रीणि के अन्तिम इकार का लोप पुरातन छान्दस है।
    ‡ ओम् को जीववाची भी कहना यह वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके श्लोक का अनुवाद
    किया है।

ब्रह्म विमान ] [ ५
वह वाच्य लक्ष्य की एकता का बोधक कहा है वह अन्वयक्रम से क्रियापद स्पष्ट कहा गया है । तीन
विशेषण पद कर्म के यथाक्रम है पाचवा पद प्रसिद्धि दर्शाने के अर्थ कहा गया है । उसी प्रकार सातवा
पद नित्यानन्द का बोधक है और आठवा पद समस्त वेदान्त-उपनिषद् वचनों द्वारा माननीयता के दर्शाने
के अर्थ है ॥ २१—२८ ॥
नत्वेति यत्पद प्रोक्त नत्प्रह्रीभावबोधकम् ।
एतेन तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थोक्तमभूत्क्रमात् ॥ २९ ॥
यद्विमानगतेत्यत्र त्वंपदत्वेन वर्णितम् ।
तत्पदार्थत्वेन ब्रह्मपर पदमितीरितम् ॥ ३० ॥
नत्वैक्यपरामर्शार्थोऽसि पदार्थबोधक ।
इत्थ श्लोकात्तत्त्वमसि वाक्यार्थस्सन्निरूपित ॥ ३१ ॥
तदैक्यानुसन्धानरूपमङ्गलमातनोत् ।
एव विधाय विधिवन्मङ्गलाचरण मुनि ॥ ३२ ॥
पूर्वाचार्याश्च तद्ग्रन्थान् द्वितीयश्लोक्तोब्रवीत् ।
विश्वनाथोक्तनामानि तेषा वक्ष्ये यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
नारायण (णो ?) शौनकश्च गर्गो वाचस्पतिस्तथा ।
चाक्रायणिर्धुण्डिनाथश्चेति शास्त्रकृतस्स्वयम् ॥३४॥
विमानचन्द्रिका व्योमयानतन्त्रस्तथैव च ।
यन्त्रकल्पो यानबिन्दु खेटयानप्रदीपिका ॥ ३५ ॥
व्योमयानार्कप्रकाशश्चेति शास्त्राणि षट् क्रमात् ।
नारायणादिमुनिभि प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥ ३६ ॥
विचार्यैतानि विधिवद् भरद्वाज कृपानिधि ।
वैमानिकप्रकरण सर्वलोकोपकारकम् ।
पारिभाषिकरूपेण रचयामास विस्तरात् ॥ ३७ ॥
मङ्गल वचनों में 'नत्वा' यह पद जो भरद्वाज ऋषि ने कहा है वह आदर-विनय भाव का
दर्शक है इससे 'तत्त्वमसि' आदि उपनिषद् वाक्यार्थो से कहा हुआ ब्रह्म क्रम से समझना चाहिये ।
'यद्विमान गत०' यहा त्वं पदरूप से उपनिषद् वचन में 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' कहा गया है 'तत्' पदार्थ-
रूप से ब्रह्मपरक पद है ऐसा कहा है । 'नत्वा' यह ऐक्य परामर्श ( जीवब्रह्म की एकता ) के साथ सम्बन्ध
रखने वाला 'असि' का पदार्थबोधक है इस प्रकार श्लोक से 'तत्त्वमसि' वाक्य का अर्थ निरूपित किया
है+। भरद्वाज मुनि ने इस प्रकार विधिवत् मङ्गलाचरण करके उस ऐक्यार्थ के अनुसन्धानरूप मङ्गल
का विस्तार किया है ॥ पूर्व आचार्यों और उनके ग्रन्थों को दूसरे श्लोक से कहा है, विश्वनाथ आचार्य के

  • यहा जीवब्रह्म की एकता का सिद्धान्त वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके वचनो का
    अनुवाद किया है ।

६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
द्वारा कहे हुए उनके नामों को मै क्रम से कहूँगा । नारायण, शौनक, गर्ग, वाचस्पति, चाक्रायणि और
धुण्ढिनाथ ये ऋषि स्वयं शास्त्रकार हैं । विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र, यन्त्रकल्प, यानबिन्दु, खेटयान-
प्रदीपिका और व्योमयानार्कप्रकाश ये छः शास्त्र क्रम से विशेष ज्ञानवेत्ता नारायण आदि मुनियों ने कहे
हैं । दयानिधि भरद्वाज ऋषि ने इन शास्त्रों को भली प्रकार विचार कर सर्वलोकोपकारक 'वैमानिक
प्रकरण' पारिभाषिक रूप से विस्तार से रचा है ❁ ॥ २६—३७ ॥
अथ विमानशब्दार्थविचार .—
वेगसाम्याद् विमानोऽण्डजानामिति ।। अ० १ । सू० १ ॥
सूत्रशब्दार्थ—अण्डजों अर्थात् पक्षियों के वेगसाम्य से विमान कहलाता है ।
बोधानन्दवृत्ति —
अण्डजेत्यत्र सूत्रेस्मिन् गृध्राद्या पक्षिण स्मृता ।
आकाशगमने तेषां वेगशक्ति स्ववेगत ।। १ ।।
य समर्थो विशेषेण मातुं गणितसंख्यया ।
स विमान इति प्रोक्तो वेगसाम्याच्च शास्त्रत ।। २ ।।
यद्वा—
गृध्रादिपक्षिणा वेगसाम्य यस्यास्ति वेगत ।
स विमान इति प्रोक्त (क्तो ?) आकाशगमने क्रमात् ।।३।।
इस सूत्र में "अण्डजानाम्" पद से गृध्र आदि पक्षी कहे गये हैं आकाशगमन मे उनकी
वेगशक्ति को जो स्ववेग से गणितसंख्या द्वारा विशेषरूपेण मापने तुलित करने में समर्थ हो वह वि-मान
पक्षी के मान होने से अर्थात् वेगसाम्य से और शास्त्रानुसार ( शब्दशास्त्रानुसार ) विमान कहा गया है ।
अथवा आकाशगमन में गृध्र आदि पक्षियों के वेग की समता क्रमशः जिसके वेग से हो सकती है वह
विमान कहा गया है + ॥ १—३ ॥
इत्थम्भावेति x शब्दस्स्याद् (दस्याद् ?) विमानार्थविनिर्णये—
लल्लोपि—
विसोप ( म ) ान गमने येषामस्ति खमण्डले ।
ते विमाना इति प्रोक्ता यानशास्त्रविशारदै ।। ४ ।।

  • महर्षि भरद्वाज के रचे 'वैमानिक प्रकरण' से पूर्व विमानशास्त्र के ग्रन्थ 'विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र,
    यन्त्रकल्प, यानबिन्दु, खेटयानप्रदीपिका, व्योमयानार्कप्रकाश' ये छह थे ।
  • ऋग्वेद मे भी श्येन की उपमा उडने मे विमान यान को दी है "आ वा रथो अश्विना श्येनपत्वा सुमृलीक
    स्ववा यात्वर्वाङ् ।” ( ऋ० १।११८।१ )
    x इत्थम्भाव इति—इत्थम्भावेति सन्धिराषं पुरातनप्रयोगो वा ।

विमान शब्दार्थ ] [ ७
नारायणोपि—
पृथिव्यप्स्वन्तरिक्षेषु खगवद्वेगत स्वयंम् ।
यस्समर्थो भवेद् गन्तु स विमान इति स्मृत ॥ इत्यादि ॥५॥
शङ्खोपि—
स्थानात्स्थानान्तर गन्तु यस्समर्थ खमण्डले ।
स विमान इति प्रोक्तो यानशास्त्रविशारदै ॥ ६ ॥ इत्यादि
विश्वम्भर —
देशाद्देशान्तर तद्वद् द्वीपाद् द्वोपान्तर तथा ।
लोकाल्लोकान्तर चापि योम्बरे गन्तुमर्हति ।
स विमान इति प्रोक्त ( े ? ) खेटशास्त्रविदा वरै ॥७॥
विमानार्थ के निर्णय में इस प्रकार भाववाला यह विमान शब्द है । लल्ल आचार्य ने भी
कहा है--आकाश-मण्डल में गमन करने में पक्षिर्यो के साथ जिन की उपमा एवं तुल्यता हो वे यान-
शास्त्रज्ञ विद्वानों द्वारा विमान कहे गये हैं । नारायण आचार्य ने भो कहा है—पृथिवी जल आकाश में
पक्षिर्यों के वेग की भाति स्वयं ( यन्त्रादि द्वारा ) जो गमन करने को समर्थ हो वह विमान कहा गया है ।
आचार्य शङ्ख ने भी कहा है—आकाशमण्डल मे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को जो समर्थ हो
वह यानशास्त्रज्ञ विद्वानों द्वारा विमान कहा गया है । एवं विश्वम्भर आचार्य ने भी कहा है—आकाश में
देश से देश को द्वीप से द्वीप को और लोक से लोक को जो जा सकता हो वह यानशास्त्रज्ञ उक्त विद्वानों
द्वारा विमान कहा गया है ॥ ४—७ ॥
एव विमानशब्दार्थमुक्त्वा शास्त्रानुसारत ।
अथेदानी तद्रहस्यविचारस्स प्रकीर्त्यते—
रहस्यज्ञोधिकारी ॥ अ० १ । सू० २ ॥
सूत्रशब्दार्थ—रहस्यों का जाननेवाला विमान चलाने में अधिकारी है ।
बोधानन्दवृत्ति —
वैमानिकरहस्यानि (णि?) यानि प्रोक्तानि शास्त्रत ।
द्वात्रिंशदिति तान्येव यानयन्तृत्वकर्मणि ॥ १ ॥
साधकानि भवन्तीति यदुक्त ज्ञानिभि पुरा ।
तत्सूत्रस्यादिमपदात्सूचित भवति स्फुटम् ॥ २ ॥
एतद्रहस्यविज्ञान विदित येन शास्त्रत ।
द्वितीयपदत प्रोक्त सोधिकारी भवेदिति ॥ ३ ॥
एतेन यानयन्तृत्वे रहस्यज्ञानमन्तरा ।
सूत्रेधिकारससिद्धि र्नेति सम्यग्विनिर्णितम् ॥ ४ ॥

८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानरचने व्योमारोहणे चालने तथा ।
स्तम्भने गमने चित्रगतिवेगादिनिर्णये ॥ ५ ॥
वैमानिकरहस्यार्थज्ञानसाधनमन्तरा ।
यतोधिकारसंसिद्धि र्नेति सूत्रेण वर्णितम् ॥ ६ ॥
ततोधिकारसंसिद्ध्यर्थं तद्रहस्याण्यथाक्रमम् ।
यथोक्तानि रहस्यलहर्यां लल्लादिभि पुरा ॥ ७ ॥
तथैवोदाहरिष्यामि सग्रहेण यथामति ।
इस प्रकार शास्त्रानुसार विमानशब्दार्थ कहकर पुन अथ विमानरहस्य बिचार वर्णित किया
जाता है—शास्त्र द्वारा जो वैमानिक रहस्य बत्तीस कहे हैं वे ही यान-चालककर्म में साधक होते हैं यह
जो विद्वानों ने पुराकाल में कहा है वह सूत्र के आदिम पद से स्पष्ट सूचित होता है। इस बत्तीस
रहस्यविज्ञान को जिसने शास्त्रद्वारा जान लिया है वह विमान का अधिकारी है यह द्वितीय पद से कहा
है। इससे यानचालक कर्म में रहस्यज्ञान के बिना विमानाधिकार नहीं है यह भली प्रकार निर्णय
दिया है ॥ विमान के रचने, आकाश में चढने, चलाने, स्तम्भन करने—नियन्त्रण में रखने, उड़ाने
चित्रगति और वेग आदि देने के निर्णय में वैमानिक रहस्यार्थज्ञानरूप साधन के बिना अधिकारसंसिद्धि
नहीं है अत उसे सूत्र में कहा है । अधिकारसंसिद्धि के लिये उन रहस्यों को लल्ल आदि
आचार्यों ने पुराकाल में क्रमश जैसे 'रहस्यलहरी' ग्रन्थ में कहा है वैसे ही संक्षेप से यहा
यथावत् उदाहृत करूंगा ॥ १-७॥
उक्तं हि रहस्यलहर्याम्—
मान्त्रिकस् [को ?] तान्त्रिकस्तद्वत्कृतकश्चान्तरालक ।
गूढो दृश्यमदृश्यं च परोक्षश्चापरोक्षक ॥ १ ॥ [ ८ ]
सङ्कोचो विस्तृतश्चैव विरूपकरणस्तथा ।
रूपान्तरस्सुरूपश्च ज्योतिर्भावस्तमोमय ॥ २ ॥ [ ९ ]
प्रलयो विमुखस्तारो महाशब्दविमोहन ।
लङ्घनस्सर्पगमनश्चपलस्सर्वतो मुख ॥ ३ ॥ [ १० ]
परशब्दग्राहकश्च रूपाकर्षणस्तथा ।
क्रियारहस्यग्रहणो दिक्प्रदर्शनमेव च ॥ ४ ॥ [ ११ ]
✤ ...
स्तब्धक [को ?] कर्षणश्चेति रहस्यानि यथाक्रमम् [ १२ ]
एतानि द्वात्रिंशद्रहस्यानि [णि ?] गुरोर्मुंखात् ॥ ५ ॥

  • हस्तलेख में श्लोकार्द्ध छुटा हुआ है जो किसी कापी करने वाले से छूटा है, जिस श्लोकार्द्ध मे
    'प्राकाशाकार, जलदरूप' ये दो रहस्य थे तभी पूरी संख्या ३२ होगी, तथा आगे रहस्यविवरण मे २६
    ३० सख्या में उक्त दोनों रहस्यों को दिया हुआ भी है ।

विमान के रहस्य ] [ ६
विज्ञाय विधिवत्सर्वं पश्चात् कार्यं समारभेत् [१३]
एतद्रहस्यानुभवो यस्यास्ति गुरुबोधन ॥६॥
स एव व्योमयानाधिकारी स्यान्नेतरे जना (३) [१४]
एतेषां सिद्धनाथोक्तरहस्यार्थविवेचनम् ।
सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्यामि रहस्यज्ञानसिद्धये [१५]
'रहस्यलहरी' में कहा है कि—मान्त्रिक, तान्त्रिक, कृतक, अन्तरालक, गूढ, दृश्य, अदृश्य,
परोक्ष, अपरोक्षक, सङ्कोच, विस्तृत, विरूपकरण, रूपान्तर, सुरूप, ज्योतिर्भाव, तमोमय, प्रलय, विमुख,
महाशब्दविमोहन, लङ्घन, सर्पगमन, चपल, सर्वतोमुख, परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण,
दिकप्रदर्शन, (आकाशाकार, जलदरूप), स्तब्धक, कर्षक। यथाक्रम इन बत्तीस रहस्यों को गुरुमुख
से जानकर पुनः विधिवत् समस्त कार्य प्रारम्भ करना चाहिये ॥ गुरु से सीखा हुआ यह रहस्यानुभव
जिसको है वह ही व्योमयान अर्थात् आकाशयान विमान चलाने का अधिकारी हो सकता है अन्य
जन नहीं ८-१५ ॥
इन बत्तीस प्रकार के विमानविषयक रहस्यों के सिद्धनाथ आचार्य द्वारा वर्णित विवेचन को
मैं रहस्यज्ञानसिद्धि के लिये संक्षेप से कहूँगा ॥१५॥
( १ ) तत्र मान्त्रिकरहस्यो नाम--मन्त्राधिकारोक्तरीत्या छिन्नम-
स्ताभैरवीवेगिनीसिद्धाऽम्बादिमन्त्रानुष्ठानैरुपलब्धसिद्धमार्गोंक्तघुटिकापादुकादृश्या-
दृश्यादिशक्तिभिस्त (भि त ?) था सिद्धाऽम्बा--ओषधैश्च ( धीश्च ? )
र्यादिमन्त्रानुष्ठाने सम्प्राप्त ओषधिभिस्तद्द्वा ( द्रा ? ) वकतैलादिभिश्च
भुवनेश्व (नेश्व) र्यादिमन्त्रानुष्ठानलब्धमन्त्रशक्तिक्रियाशक्त्यादिभिश्च कलास्यो-
जनद्रागऽभेद्यत्वाच्छेद्यत्वादह्याऽविनाशित्वादिगुणविशिष्टविमानरचनाक्रिया
रहस्यम् × ।।
( १ ) मान्त्रिक रहस्य विचार—मन्त्राधिकार में कही रीति के अनुसार छिन्नमस्ता भैरवी वेगिनी
सिद्धाऽम्बा † आदि के मन्त्रानुष्ठानों से उपलब्ध सिद्ध मार्गों में कही हुई घुटिका, पादुका, दृश्य अदृश्य ‡
आदि की शक्तियों द्वारा तथा सिद्धाऽम्बा ओषधि + ऐश्वर्य आदि के मन्त्रानुष्ठानों से प्राप्त ओषधियों
× हस्तलेख में 'द्वारा अभेद्यत्वमच्छेद्यत्व अविनाशित्वादि' ऐसा सन्दिग्ध पाठ है ।
† छिन्नमस्ता आदि चार प्रकार की विद्युत् के नाम पारिभाषिक प्रतीत होते हैं जो यन्त्र में प्रयुक्त की
जाती हैं ।
‡ घुटिका आदि शक्तिरूप साधनों के जातिवाचक नाम हैं।

  • राजनिघण्टु में 'सिद्धौषधियां' पांच ओषधियों के नाम बतलाये हैं।
    तैलकन्दसुधाकन्दरुदन्ती सर्वपाशिषु ।
    तैलकन्दं सुधाकन्दं क्रोडदन्ती रुदन्तिका ।।
    सपनेत्रयुता पञ्च सिद्धौषधिसञ्ज्ञका ।। (रा० नि०)

१० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एवं उनके द्रावक तेल + आदि से भुवन ऐश्वर्य आदि मन्त्रानुष्ठानों से प्राप्त मन्त्रशक्ति ( विद्यायुक्त
विचारशक्ति ) एवं क्रियाशक्ति आदि से कलासंयोजन द्वारा अभेद्यता अच्छेद्यता अदाह्यता अविनाशिता
आदि गुणविशिष्ट विमानरचनारूप क्रियारहस्य विचार है ।
( २ ) तान्त्रिकरहस्यो नाम--महामायाशम्बरादितान्त्रिकशास्त्रोक्तता-
नुष्ठानमार्गात्तत्तच्छक्त्यनुसन्धानरहस्यम् ॥
( २ ) तान्त्रिकरहस्यविचार - महामाया शम्बर आदि तान्त्रिक शास्त्र में कहे अनुष्ठान मार्ग
से उस शक्ति का अनुसन्धानरहस्य विचार है ॥
( ३ ) कृतकरहस्यो नाम--विश्वकर्मच्छायापुरुषमनुमयादिशास्त्रानुष्ठान-
( नु ? ) द्वारा तत्तच्छक्त्यनुसन्धानपूर्वक तात्कालिकसङ्कल्पानुसारेण विमान-
रचनाक्रमरहस्यम् ॥
( ३ ) कृतक रहस्य विचार- विश्वकर्मा, छायापुरुष, मनु, मय ‡ आदि ( यन्त्राविष्कारक
महर्षियों के ) शास्त्रों के अनुष्ठान द्वारा उस शक्ति का अनुसन्धान खोज ध्यान तात्कालिक सङ्कल्प अर्थात्
तुरन्त नूतन कल्पना के अनुसार विमानरचनाक्रम रहस्य विचार है ।
( ४ ) अन्तरालरहस्यो नाम--आकाशपरिधिमण्डलशक्तिसन्धिस्थानेषु
विमानप्रवेशो यदा भवति तदोभय ( तदा उभय ? ) शक्तिसम्मर्दनेन चूर्णितो
भवति । अतो ( त ? ) विमानस्य तत्सन्धिप्रवेशसूचनात्तदन्तरालेषु विमान-
स्तम्भनक्रियाकरणरहस्यम् ॥
(४) अन्तरालरहस्य विचार-आकाशपरिधिमण्डल की शक्तियों के सन्धिस्थानों में जब विमान-
प्रवेश हो जाता है तो दोनों शक्तियों के सम्मर्दन से विमान चूर्णित हो जाता है टूट जाता है । अत
विमान के उस सन्धिप्रवेश की सूचना करने से उन अन्तरालों में विमानस्तम्भनक्रिया करने रूप रहस्य का
विचार होना चाहिये ।
( ५ ) गूढरहस्यो नाम--वायुतत्त्वप्रकरणोक्तरीत्या वातस्तम्भाष्टम-
परिधिरेखापथस्य यासावियासाप्रयासादिवातशक्तिभि सूर्यकिरणान्तर्गततम-
श्शक्तिमाकृष्य तत्संयोजनद्वारा विमानाच्छादनरहस्यम् ॥
( ५ ) गूढरहस्यविचार - वायुतत्त्व प्रकरण में कही रीति के अनुसार वातस्तम्भ की आठवीं
परिधि के रेखामार्ग की यासा वियासा प्रयासा आदि वातशक्तियों के द्वारा सूर्यकिरणान्तर्गत अन्धकार
शक्ति को आकृष्ट कर उसके संयोजनद्वारा विमानाच्छादन करना रहस्य है ॥

  • यन्त्र में तेल का उपयोग आवश्यक है अत कहा गया है ।
    ‡ विश्वकर्मा, छायापुरुष, मनु, मय आदि प्राचीन विमान आदि यान यन्त्र के आविष्कारक तथा उन उन
    शास्त्रों के रचयिता थे । वाल्मीकि रामायण में पुष्पक विमान का आविष्कारक विश्वकर्मा कहा ही है ।

विमान के रहस्य ] [ ११
( ६ ) दृश्यरहस्यो नाम--आकाशमण्डले विद्युद्वातकिरणशक्तयो
परस्परसम्मेलनात्सञ्जातबिम्बकृच्छक्तेर्विमानपीठपुरोभागस्य विश्वक्रियादर्पणविले
प्रतिफल कृत्वा पश्चात्तत्प्रकाशसन्निवेशनद्वारा मायाविमानप्रदर्शनरहस्यम् ॥
( ६ ) दृश्य रहस्य विचार—आकाशमण्डल में विद्युत्किरण वातकिरण ( वातलहर ) इन
दोनों की शक्तियों के परस्पर सम्मेलन से उत्पन्न हुई बिम्बकरने वाली शक्ति से विमान-पीठ के सामने-
वाले भाग के विश्वक्रियादर्पणरूप बिल में प्रतिफल छाया करके पश्चात् उस प्रकाश के पड़ने से माया-
विमान के दिखलाई पड़ने का रहस्य है ॥
( ७ ) अदृश्यरहस्यो नाम—शक्तितन्त्रोक्तरीत्या सूर्यरथैषादण्डप्राङ्-
मुखपृष्ठकेन्द्रस्थवैष्णरव्यंविकरणादिशक्तिभिरा ( भि श्रा ? ) काशतरङ्गस्थ
शक्तिप्रवाहमाकृष्य वातमण्डलस्थवलाहाविकरणादिशक्तिपञ्चके नियोज्य
तद्द्वा ( द्वा ? ) राश्वेताभ्रमण्डलाकार कृत्वा तदावरणाद्विमानादृश्यकरण-
रहस्यम् ॥
(७) अदृश्य रहस्य विचार—शक्तितन्त्र की कही रीति के अनुसार सूर्यकिरण के एषादण्ड के
सामने पृष्ठ केन्द्र में रहने वाले वैष्णरण्य त्रिकरण* आदि शक्तियों से आकाशतरङ्ग के शक्तिप्रवाह को
खींच कर वायुमण्डल में रहने वाली वलाहा ( वलाहाका ) विकरण आदि पांच शक्तियों को नियुक्त करके
उनके द्वारा सफेद अभ्र मण्डलाकार करके उस आवरण से विमान के अदृश्य करने का रहस्य है ॥७॥
(८) परोक्षरहस्यो नाम—मेघोत्पत्तिप्रकरणोक्तशरन्मेघावरणषट्केषु
द्वितीया ( या ? ) वरणपथे विमानमन्तर्धाय विमानस्थशक्त्याकर्षणदर्पण-
मुखात्तन्मेघशक्तिमाहृत्य पश्चाद्विमानपरिवेषचक्रमुखे नियोजयेत् । तेन स्तम्भन-
शक्तिप्रसारणा भवति, पश्चात्तद्द्वा ( द्वा ? ) रा लोकस्तम्भनक्रियारहस्यम् ॥
(८) परोक्षरहस्य विचार—मेघोत्पत्ति प्रकरण में कहे शरद् ऋतुसम्बन्धी छ मेघावरणों के
द्वितीय आवरण मार्ग में विमान छिपकर विमानस्थ शक्ति का आकर्षण करने वाले दर्पण के मुख से
उस मेघशक्ति को लेकर पश्चात् विमान के घेरे वाले चक्रमुख में नियुक्त करे उससे स्तम्भनशक्ति का
फैलाव हो जाता है पुन उसके द्वारा स्तम्भनक्रिया रहस्य हो जाता है ॥
( ९ ) अपरोक्षरहस्यो नाम—शक्तितन्त्रोक्तरौहिणीविद्युत्प्रसारणेन
विमानाभिमुखस्थवस्तूना प्रत्यक्षनिदर्शनक्रियारहस्यम् ॥
(६) अपरोक्ष रहस्य विचार—शक्तितन्त्र में कहीं रोहिणी विद्युत्+ के फैलाने से + विमान
के सामने आने वाली वस्तुओं का प्रत्यक्ष दिखलाई देना रूप अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) क्रिया रहस्य है ॥

  • सूर्य पृथिवी के मध्य पृथिवी की गति रेखा के अनुसार कार्य करने वाला सूर्य-रथ-ईषा दण्ड, यह कोई
    अङ्ग विमान का पारिभाषिक नाम से कहा गया है जिसके आगे पीछे और केन्द्र में वैष्णरध्य आदि
    शक्तियां निकलती हो उनसे आकाश से शक्तिप्रवाह खींचा जाता हो ।
  • यह रोहिणी विद्युत्—कोई फेंकने वाली सर्च लाईट की भांति लाईट होगी ।

१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र

( १० ) सङ्कोचनरहस्यो नाम--यन्त्रोपसंहाराधिकारोक्तरीत्या
[अन्त ?] रन्तरिक्षेति [यति ?] वेगात्पलायमानाना विस्तृतखेटयानानाम-
पायसम्भवे विमानस्थसप्तमकीलीचालनद्वारा तदङ्गोपसंहारक्रियारहस्यम् ॥
(१०) सङ्कोचन रहस्य विचार - यन्त्रोपसंहाराधिकार में कही रीति के अनुसार आकाश में
दौड़ते हुए बड़े विमानों के अतिवेग से अपने विमान के नाश की सम्भावना होने पर विमानस्थ
सातवीं कीली अर्थात् घुण्डी ( बटन पेंच ) के चलाने द्वारा उसके अङ्गों का उपसंहार अर्थात् सङ्कोचन
किया रहस्य है ॥*

(११) विस्तृतरहस्यो नाम - आकाशतन्त्रोक्तप्रकारेणाका [ रा आ ? ]
शतृतीयपञ्चमपरिधिमण्डलस्थानीय [य्य ?] मूलवातपरिधिकेन्द्रस्थविमानाना
वाल्मीकिगणितोक्तविमानप्रस्ताररेखाविन्यासमनुसृत्य विमानस्थैका [ स्थ
एका ] दशरेखामुखस्थानीयकीलीचालनद्वारा तात्कालिकोपयुक्तप्रमाणमनुसृत्य
विमानविस्तृतक्रियाकरणरहस्यम् ॥

(११) विस्तृत रहस्य विचार - आकाशतन्त्र में कहे प्रकारानुसार आकाश के तृतीय पञ्चम
परिधिमण्डलस्थानीय मूलवात परिधिकेन्द्रस्थ विमानों का वाल्मीकि गणित में कहे विमानप्रस्ताररेखा-
विन्यास का अनुसरण कर विमानस्थ ग्यारहवीं रेखा के मुखस्थानीय कीली - घुण्डी ( बटन पेंच ) के
चलाने द्वारा तात्कालिक उपयुक्त प्रमाण का अनुसरण करके विमान का विस्तृत किया रहस्य है ॥
(१२) विरूपकरणरहस्यो नाम - धूमप्रकरणोक्तप्रकारेण द्वात्रिंशज्जा-
तीयधूमराशि यन्त्रद्वारा परिकल्प्य तस्मिन् तरङ्गशक्त्युष्णमखण्डितप्रकाश
मेलयित्वा पश्चाद्विमानशिरोभागस्थभैरवीतैलसंस्कारितवैरूप्यदर्पणमुखे पद्मक-
चक्रमुखनालद्वारा पूर्वोक्तप्रकाशशक्ति सन्धार्य द्वात्रिंशदुत्तरशतकथ्यप्रमाण-
वेगात् परिभ्राम्यमाणे सति मण्डलाकारेण महाभयप्रदविकाराकारो जायते
विमानद्रष्टॄणा तत्प्रदर्शनद्वारा महाभयोत्पादनकार्यरहस्यम् ॥

(१२) विरूपकरण रहस्य विचार - धूम प्रकरण में कहे प्रकारानुसार बत्तीस प्रकार के धूमों की
राशि को यन्त्र द्वारा उत्पन्न कर उसमें तरङ्ग शक्ति की उष्णता से उत्पन्न प्रकाश का मिलाकर पश्चात्
विमान के सिर वाले भाग में रहने वाले भैरवी तैल ( कोई पेट्रोल जैसा तैल होगा ) से संस्कारित वैरूप
दर्पण मुख में पद्मक चक्रमुख की नाल द्वारा पूर्वोक्त प्रकाशशक्ति को युक्त करके एक सौ बत्तीस घोड़ों या
दर्जे के वेग से घुमाने पर गोल घेरे रूप से महाभयप्रद विकार का आकार उत्पन्न हो जाता है, विमान
देखने वालों को उसके देखने से महाभयोत्पादन कार्य का रहस्य है ॥
(१३) रूपान्तररहस्यो नाम - तैलप्रकरणोक्तप्रकारेण गृध्रजिह्वा-
कुम्भिणीकाकजङ्घादितैलसंस्कारितवैरूप्यदर्पणे-एकोनविंशतीधूम संयोज्य
तस्मिन् यानस्थकुण्डिणीशक्तिसंयोजनद्वारा विमानद्रष्टॄणा सिंहव्याघ्रभल्लूक-
सर्पगिरिनदीवृक्षादिविकारेणा [ रा अ ? ] न्यथाकल्पितरूपान्तरप्रदर्शनरहस्यम् ॥

  • इससे बचने, भाग निकलने का तात्पर्य विदित होता है ।

विमान के रहस्य ] [ १३
(१३) रूपान्तर रहस्य विचार—तैल प्रकरण में कहे प्रकारानुसार गृध्रजिह्वा, ॐ कुम्भिणी ×
काकजङ्घा ‡ आदि तैल से संस्कारित वैरूप्यदर्पण में उश्रीम प्रकार के धूम को संयुक्त करके उसमें यानस्थ-
कुण्टिणी शक्तिसंयोजन द्वारा विमान के देखने वालों को सिंह, बाघ, भालू, सर्प, पहाड़ी, नदी, वृक्ष
आदि विकार से अन्यथा कल्पित रूपान्तर दीखने का रहस्य ॥
(१४) सुरूपरहस्यो नाम—करकप्रकरणोक्तत्रयोदशजातीयकरकश-
क्तिमाकृष्य हिमोद्गारवायुना संधार्य पश्चाद्विमानदक्षिणकेन्द्रमुखस्थितपुष्पि-
णीपिञ्जुलादिदर्पणमुखे पूर्वोक्तशक्ति वातप्रकरणनालद्वारा संयोज्य तस्मिन्
सुरघारूपकिरणशक्तिं सन्धार्य तद्व्रा [ द्वा ? ] रा विमानसन्दर्शकानां विविध-
पुष्पमाल्योपसेवितदिव्याप्सरःस्वरूपवद्वि [ कद्भि ? ] काग्प्रदर्शनक्रिया-
रहस्यम् ॥
(१४) सुरूप रहस्य विचार—करकप्रकरण में कही तेरह प्रकार की करकशक्ति को आकृष्ट करके
हिमोद्गार वायु अर्थात् निकलती हुई ठण्डी भाप के द्वारा संयुक्त कर पश्चात् विमान के दक्षिण केन्द्र
मुख में स्थित पुष्पिणी पिञ्जुल + आदि ( के ) दर्पणमुख में पूर्व कही शक्ति को वायु फैलाने वाली
नाल के द्वारा संयुक्त करके उसमें सुरघा ( तीव्र गति वाली ) नाम की किरणशक्ति को युक्त करके उसके
द्वारा विमान देखने वालों को नाना पुष्पमालाओं से सेवित दिव्य अप्सरा स्वरूप वाले विकार के
दीखने का रहस्य है ॥
(१५) ज्योतिर्भावरहस्यो नाम—अंशुबोधिन्यामु [क्त्या उ ?] क्तप्रकारेण
संज्ञानादिषोडशसूर्यकलासु द्वादशाद्याषोडशान्तकलाप्रभाकर्षणं कृत्वा-आकाश-
चतुर्थपथस्थमयूखकक्ष्यस्थितवायुमण्डले नियोजयेत् । तथैव खतरङ्गशक्तिप्रभा-
माहृत्य वातमण्डलसप्तमावरणस्थप्रकाशशक्त्या सम्मेलयेत् । पश्चादेतच्छक्ति-
द्वय विमानस्थनालपञ्चकद्वारा विमानगुहागर्भदर्पणयन्त्रतृतीयकोशे सन्धार्य
तद्व्रा [ द्वा ? ] रा विमानद्रष्टॄणां बालातपवत्प्रकाशप्रदर्शनरहस्यम् ॥
(१५) ज्योतिर्भाव रहस्य विचार—अंशुबोधिनी में कहे प्रकारानुसार सूर्य की संज्ञान आदि
सोलह कलाओं में से बारहवीं से लेकर सोलहवीं तक कलाओं की प्रभा का आकर्षण करके आकाश के
चतुर्थपथ में रहने वाले किरणरूप अश्व या किरणक्षेत्र में स्थित वायुमण्डल में नियुक्त करे । उसी प्रकार
आकाशतरङ्ग की शक्ति की प्रभा का आहरण करके वातमण्डल के सातवें आवरण में स्थित प्रभाशक्ति
में मिला दे । पश्चात् इन दोनों शक्तियों को विमानस्थ पांच नालों द्वारा विमानगुहा के मध्य दर्पणयन्त्र
के तृतीय कोश में लाकर उसके द्वारा विमान देखने वालों को बाल सूर्य की भांति प्रकाश दीखने का
रहस्य है ।
ॐ आयुर्वेदिक निघण्टुओं में 'गृध्रजिह्वा' नाम से कोई ओषधि नहीं कही किन्तु 'गृध्रपत्रा' ( धूमपत्रा ) और
गृध्रनखी ( नाखुना ) कही है ।
× कुम्भिणीफल ( जमालगोटा ) तम्बाकू कुम्भिणी कुम्भीगूगल से अभीष्ट हो सकता है ।
‡ गुञ्जा ( रत्ति-घोंघ्चली ) को काकजङ्घा कहते हैं ।

  • प्रकाशरूप वैद्युत शक्ति के उत्पादक दर्पण यन्त्र ।

१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
(१६) तमोमयरहस्यो नाम—दर्पणप्रकरणोक्ततमश्श [ मो श ? ]
क्त्या [क्त्यप ?] कर्षणदर्पणद्वारा तमश्शक्तिमाहृत्य विमानपञ्जरवायव्य-
केन्द्रस्थतमोयन्त्रमुखात्तमो विद्युति संधाय तत्कीलीचालनान्मध्याह्नकालेऽमा
[ भ्रमा ? ] रात्रिवत्तमोविकारप्रदर्शनरहस्यम् ॥
(१६) तमोमय रहस्य विचार—दर्पणप्रकरण में कही अन्धकारशक्ति के आकर्षण (या फैलाव ?)
के द्वारा अन्धकार शक्ति का आहरण करके विमानपञ्जर के वायव्यकेन्द्रस्थ तमोयन्त्र के मुख से अन्धकार
को विद्युत् में मिलाकर उसकी कीली (घुण्डी-बटन) के चलाने से मध्याह्नकाल में अमावश्या की रात्रि
की भांति अन्धकाररूप विकार के दीखने का रहस्य है ।
(१७) प्रलयरहस्यो नाम—ऐन्द्रजालिकप्रलयपटलोक्तरीत्या यानपुरो-
भागकेन्द्रस्थोपसंहारयन्त्रनालात्सप्तजातीयधूममाकृष्य पड्गर्भ विवेकोक्तमेघ-
धूमेऽन्त [ अन्त ? ] र्धाय तद्धूम विद्युत्संसर्गात्पञ्चस्कन्धवातनालमुखेषु प्रसार्य
तद्द्वा [ द्वा ? ] रा सर्वपदार्थाना प्रलयवन्नाशक्रियाकरणरहस्यम् ॥
(१७) प्रलय रहस्य विचार—ऐन्द्रजालिक प्रलयपटल में कही रीति के अनुसार यान के
सामने के केन्द्र में रहने वाले सङ्कोचक यन्त्रनाल से सात प्रकार के धूम का आकर्षण करके 'पड्गर्भ-
विवेक' में कहे मेघधूम में छिपा कर उस धूम को विद्युत्संसर्ग से पञ्चस्कन्ध वाले वायुनाल मुखों में
फैला कर उसके द्वारा सर्व पदार्थों का प्रलय जैसा नाशक्रियारहस्य है ॥
(१८) विमुखरहस्यो नाम—रुद्धू [च्छृ ? ] द्वयोक्तप्रकारेण कुवेर-
विमुखवैश्वानरादिबिषचूर्णशक्ती [ ? ] रौद्रीदर्पणपञ्जरतृतीयनाले नियम्य
वातस्कन्धकीलीचालनद्वारा मूर्च्छावस्थाप्रदानेन विवर्शकरणक्रियारहस्यम् ॥
(१८) विमुखरहस्य विचार—रुद्ध द्वय में कहे प्रकारानुसार कुवेर विमुख वैश्वानर * आदि विष-
चूर्ण से उत्पन्न रौद्री शक्ति दर्पणपञ्जर तृतीयनाल में नियन्त्रित करके वातस्कन्ध कीली के चालनद्वारा
मूर्च्छावस्था प्रदान करने से विवर्शकरणक्रिया रहस्य है ॥
(१९) ताररहस्यो नाम—वातजलसूर्यकिरणप्रभाशक्तीना दशसप्त-
षोडशांशान् खतरङ्गशक्त्या संयोज्य तच्छक्ति तारमुखदर्पणद्वारा विमानमुख-
केन्द्रशक्तिनालमुखप्रसारणात्सर्वषा नक्षत्रमण्डलवत्प्रदर्शनक्रियारहस्यम् ॥
(१९) ताररहस्य विचार—वायु, जल, सूर्यकिरणप्रभा की शक्तियों के दश, सप्त, षोडश अंशों
को आकाशतरङ्ग की शक्ति से संयुक्त करके उस शक्ति को तारमुखदर्पण द्वारा विमान मुख की केन्द्रशक्ति
के नालमुख को फैलाने से समस्त नक्षत्रमण्डल के समान प्रदर्शन क्रियारहस्य है ॥
(२०) महाशब्दविमोहनरहस्यो नाम—विमानस्थसप्तनालवायुमेकीकृत्य
शब्दकेन्द्रमुखेऽन्त (अन्त ?) र्धाय पश्चात् कीली (लि ?) प्रचालयेत् तद्गंणाच्छ-
ब्दप्रकाशिकोक्तरीत्या द्विपष्टिध्मानकलासग्रहणाच्छब्दवन्महाशब्दो जायते तद्द्रव-

  • कुवेरविमुख वैश्वानर ये किन्ही विषचूर्णों के पारिभाषिक नाम हैं ।

विमान के रहस्य ] [ १५
स्मरणात् सर्वेषा हृदयकम्पन भवति किष्कुत्रयप्रमाणकम्पन यदा भवति
स्मृतिविस्मरण भवति तद्द्वा ( द्वा ? ) रा परेषा विमोहनक्रियारहस्यम् ॥
(२०) महाशब्दविमोहनरहस्य विचार—विमानस्थ सात नालों के वायु को एक करके शब्द-
केन्द्रमुख में बन्द करके पश्चात् कीली (घुण्डी) को चलावे, उसके वेग से शब्दप्रकाशिका में कही रीति
के अनुसार बासठ धौंकने वाली कलाओं के संघर्षण शब्द (गूंज) के समान महाशब्द उत्पन्न होता है
उस शब्द के स्मरण से सब का हृदय कांप जाता है, तीन किष्कुओं ( तीन बालिश्त या तीन हाथ-तीन
फीट ) के प्रमाण-जितना कम्पन जब होता है तब स्मृतिनाश हो जाता है उसके द्वारा दूसरों को विमोहित
मूर्च्छित करने का रहस्य है।
(२१) लङ्घनरहस्यो नाम—वायुतत्त्वप्रकरणोक्तप्रकारेण वातमण्डल-
परिधिरेखासु विमानसञ्चारकाले यदा सूर्यगोलवाडवामुखकिरणज्वालाप्रवाहो
(ह ?) विमानाभिमुखो भवति तेन विमान प्रज्वलितो भवति । अत
तन्निवारणा (र्णा ?) र्थंविमानस्थविशुद्धतशक्तितमेकीकृत्य विमानस्यप्राण-
कुण्डलीस्थाने सन्धाय पश्चात् कीलीचालनेन विमानोट्डीयनद्वारा कुल्यालङ्घन-
वद्रे खाद्द्रै खान्तरलङ्घनक्रियारहस्यम् ॥
( २१ ) लङ्घन रहस्य विचार—वायु तत्त्व प्रकरण में कहे प्रकारानुसार वातमण्डल परिधि-
रेखाओं में विमान संचार समय जब सूर्यगोले के वाडवामुख* (का) किरण ज्वालाप्रवाह विमान जल
उठता है, अत उसके निवारणार्थ विमानस्थ विद्युत् और वायु की शक्ति को मिलाकर विमान के प्राण-
कुण्डली स्थान ( मोटर मशीन ) मे युक्त करके पीछे कीली-घुण्डी चलाने से विमान के ऊर्ध्वगमन—ऊपर
उछलने (Jumping) द्वारा नहर नदी के लंघन की भांति एक रेखा से दूसरी रेखा पर लङ्घन करने-
फांन्दने कूदने (Jumping) का रहस्य है ॥
(२२) सार्पगमनरहस्यो नाम—दण्डवक्रादिसप्तविधमातरिश्वार्ककिरण-
शक्तोराकृष्य यानमुखस्थवक्रप्रसारणकेन्द्रमुखे नियोज्य पश्चात्तादाहृत्य शक्त्युद्ग
(द्ग ?) मन्त्काले प्रवेशयेत् । तत तत्कीलीचालनाद्विमानस्य सर्पवद् गमन-
क्रियारहस्यम् ॥
( २२ ) सार्पगमनरहस्य विचार—दण्ड चक्र आदि सात प्रकार के वायु और सूर्यकिरण की
शक्तियों को आकर्षित करके यानमुख में स्थित वक्रप्रसारण केन्द्रमुख में अर्थात् टेढ़ा फेंकने वाले केन्द्र-
मुख में नियुक्त करके पश्चात् उसका आहरण करके शक्ति को उत्पन्न करने निकालने वाले नाल में प्रवेश
करे तब उस कीली ( घुण्डी-बटन ) को चलाने से विमान का सर्प के समान गमनक्रिया रहस्य है ॥
(२३) चापलरहस्यो नाम—शत्रुविमानसन्दर्शनकाले विमानमध्यकेन्द्र-
स्थशक्तिपञ्जरकीलीचालने-एकछोटिकार्याच्छन्नकाले सप्ताशीत्युत्तरचतुस्सहस्र-
तरङ्गवेगो जायते तत्प्रसारणाच्छत्रुविमानकम्पनक्रियारहस्यम् ॥

  • हो सकता हैं यह कोई विमानभेदी तोप की विमानप्रज्वालक सर्च लाईट की भांति का कोई ज्वालोत्पादक
    साधन हो ।

१६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
( २३ ) चापलरहस्य विचार—शत्रु का विमान दिखलाई पड़ने पर अपने विमान के मध्य
केन्द्रस्थ शक्तिपञ्जर की कीली चलाने से एक छोटिकामात्र ( तर्जनी अङ्गुष्ठ ध्वनि—चुटकी—क्षणभर )
काल मे चार हजार सतासी तरङ्गों का वेग उत्पन्न हो जाता है उसके फैलाने से शत्रुविमान के डांवाडोल
होने उलट गिरने का रहस्य है ॥
(२४) सर्वतोमुखरहस्यो नाम--स्वपथे स्वविमानविनाशार्थं परविमान-
शतैरा ( व्रा ?) वृते सति तदा स्वविमानशिरःकेन्द्रकीलीचालन'दनेक-
विमानवत्सर्वतोमुखसञ्चारक्रियारहस्यम् ॥
( २४) सर्वतो मुखरहस्य विचार—अपने मार्ग में अपने विमान के विनाशार्थ दूसरे के
सैकडों विमानों से घिर जाने पर अपने विमान के शिर की कीली ( घुण्डी बटन ) के चलाने से अनेक
विमानों की भांति सब ओर संचार करने का क्रिया रहस्य है ॥
(२५) परशब्दग्राहक रहस्यो नाम--सौदामिनीकलोक्तप्रकारेण विमान-
स्थशब्दग्राहकयन्त्रद्वारा परविमानस्थजनसंभाषणादिसर्वशब्दाकर्षण रहस्यम् ॥
( २५ ) पर शब्दग्राहक रहस्य विचार—'सौदामिनीकला' ( विद्युत्कला पुस्तक ) मे कहे प्रकारा-
नुसार विमानस्थ शब्दग्राहक यन्त्र के द्वारा आकाश के प्रथम मण्डल की परिधि को आरम्भ करके सात
परिधि मण्डलपर्यन्त परविमानस्थ जन सम्भाषण आदि समस्त शब्दों का आकर्षण रहस्य है ॥
(२६) रूपाकर्षणरहस्यो नाम--विमानस्थरूपाकर्षणयन्त्रद्वारा पर-
विमानस्थितवस्तुरूपाकर्षणरहस्यम् ॥
( २६ ) रूपाकर्षणरहस्य विचार—विमान में स्थित रूप का आकर्षण यन्त्रद्वारा परविमानस्थित
वस्तुओं के रूप के आकर्षण का रहस्य है ॥
(२७) क्रियाग्रहणरहस्यो नाम--विमाताधःकीलीचालनाच्छुद्धपट-
प्रसारणं भवति । ईशान्यकोणस्थद्रावकत्रये शक्तिसंयोजनं कृत्वा तच्छक्तिसप्त-
वर्गसूर्यकिरणेषु सन्धांयं पूर्वोक्तशुद्धटल दर्पणाभिमुखीकरणं कृत्वा तन्मुखात्पू-
र्वोक्तशक्तिप्रसारणपूर्वकोध्र्वकीलीचालनद्वाग विमानाधोभागस्थितपृथिव्य (व)
न्तरिक्षेषु यद्यत्क्रियारहस्यान्यन्ये क्रिय (कीय ?) न्ते तत्स्वरूपप्रतिबिम्बं शुद्ध-
पटले मूर्तवच्चित्रित (तो ?) भवति तद्द्वा [द्वा ] रा क्रियाग्रहणरहस्यम् ॥
( २७ ) क्रियाग्रहण रहस्य विचार—विमान के नीचे की कीली-घुण्डी के चलाने से शुद्ध पट
फैल जाता है, ईशान्यकोणस्थ तीन द्रावकों ❊ में शक्तिसंयोजन करके उस शक्ति को सप्तवर्गसूर्यकिरणों
मे सन्धान करके पूर्वोक्त शुद्ध पटल को दर्पण के सामने की ओर करके उसके मुख से पूर्वोक्त शक्ति फैलने
के साथ ऊपर की कीली-धुन्डी चलाने के द्वारा विमान के नीचे के भाग में स्थित पृथिवी, जल, अन्तरिक्ष
में जो जो क्रियारहस्य अन्यों द्वारा किये जाते हैं उनका स्वरूपप्रतिबिम्ब शुद्ध पटल पर मूर्त के समान
चित्रित हो जाता है उसके द्वारा क्रियाग्रहण रहस्य है ॥
❊ ये द्रावक किसी रूप आदि शक्ति के फैलाने वाले द्रावक पात्र साधन प्रतीत होते है ।

विमान के रहस्य ] [ १७
(२८) दिक्प्रदर्शनरहस्यो नाम--विमानमुखकेन्द्रकीलीचालनेन दिशा-
म्पतियन्त्रनालपत्रद्वारा परयानागमनदिक्प्रदर्शनक्रियारहस्यम् ॥
( २८ ) दिक्प्रदर्शन रहस्य विचार—विमानमुखकेन्द्र की कीली चलाने से 'दिशाम्पति' नामक
( दिशाओं के पति ) यन्त्र के नालपत्र के द्वारा दूसरे के यान की आगमनदिशा का प्रदर्शन रहस्य है ॥
(२६) आकाशाकाररहस्यो नाम--आकाशतन्त्रोक्तरीत्या कृष्णाभ्रवारिणा
पिचुमन्दमूलभूनागद्रावकाभ्या यानावरणअभ्रकपटिकामालिप्य तस्मिन् वायुपथ-
किरणशक्तियोजनद्वारा विमानाकाशाकारवत्प्रदर्शनरहस्यम् ॥
( २६ ) आकाशाकाररहस्य विचार—आकाशतन्त्र में कही रीति के अनुसार कृष्ण अभ्रक जल
तथा पिचुमन्दमूल + और भूनाग × के द्रावक रस से यान के आवरण अभ्रकपटिका को लेप कर देने
से उस वायुपथ में किरणशक्तियोजनद्वारा विमान के आकाशाकार होने का प्रदर्शन रहस्य है ॥
(३०) जलरूपरहस्यो नाम--करकाम्लबिल्वतैलशुल्वलवणधूमसार-
ग्रन्थिकरससर्षपपिष्टमीनावरणाद्रवाणा शास्त्रोक्तप्रकारेण भागाशसम्मेलन कृत्वा
मुक्ताफलशुक्तिका लवणासारे सयोग्य सम्मिलितशक्ति धूमाकार कृत्वा विमाना-
वरणोपरिस्थितकिरणप्रभामुखसन्धी-अन्तर्धाय पूर्वोवत्तधू (क्त अधू?) माकार-
द्रावकेण (के न?) विमानावरणलेपन कृत्वा तदुपरि धूमप्रसारणद्वारा
जलदाकारवद्विमानप्रदर्शनरहस्यम् ॥
( ३० ) जलरूपरहस्य विचार—करकाम्ल ❁ दाडिमाम्ल ( दाडिम का तेजाब ), बिल्वतैल,
शुल्वलवण ( ताम्बे का लवण नीलाथोथा ), धूमसार ( गृहधूम ), ग्रन्थिकरस ( गुगल का द्राव या मण्डूर
और पारा ), सर्षपपिष्ट ( सरसों की पीठी ) मीनावरण ( मछली का आवरण ) इनके शास्त्रोक्त प्रकार से
भागांशों को मिलाकर मुक्ताफलशुक्तिका ( मोती की सीपी ) लवणासार† में संयुक्त करके सम्मिलित शक्ति
को धूमाकार करके विमानावरण के ऊपर रहनेवाली किरणप्रभामुखसन्धि में छिपाकर या लगाकर पूर्वोक्त
धूमाकार के द्रावक द्वारा विमानावरण के ऊपर लेपन करके उसके ऊपर धूम फैलाने के द्वारा जलदाकार
अर्थात् ( मेघाकार ) के समान विमानप्रदर्शनरहस्य है ॥
(३१) स्तब्धकरहस्यो नाम--विमानोत्तरपार्श्वस्थसन्धिमुखनालादप-
स्मारधूम सग्राह्य स्तम्भनयन्त्रद्वारा तद्धूमप्रसारणात् परविमानस्थसर्वजनाना
स्तब्धीकरणरहस्यम् ॥

  • आयुर्वेदिक निघण्टुओ में 'पिचुमन्द' नाम की ओषधि नही है किन्तु पिचुमन्द ( निम्ब वृक्ष ) हो या कपास
    की जड ।
    × 'वैद्यक शब्द सिन्धु' कोष में 'भूनाग' केचुआ और सीसे धातु के लिये आया है, हो सकता है यहा सीसे धातु
    का रासायनिक द्राव अभीष्ट हो ।
    ❁ 'करक -दाडिमे, शुल्वं ताम्रे', धूमसार —गृहधूमे, ग्रन्थिक —गुग्गुले मण्डूरे व, रस पारदे (वैद्यक शब्द सिन्धु )
    † आयुर्वेदिक निघण्टुओ मे लवणासार शब्द नही है किन्तु लवण क्षार' है जल से उत्पन्न नमक विशेष के लिये
    आया है । हो सकता है लवणासार से सोडा अभीष्ट हो ।

१८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
( ३१ ) स्तब्धकरहस्य विचार—विमान के उत्तर पार्श्वस्थ सन्धिमुखनाल से अपस्मार का धूम
संग्रह करके स्तम्भन यन्त्र द्वारा उस धूम के फैलाने से परविमानस्थ सर्वमनुष्यों के स्तब्ध कर देने जड-
मूच्छित बना देने का रहस्य है ॥
(३२) कर्षणरहस्यो नाम—स्वविमानसंहारार्थं परविमानपरम्परागमने
विमानाभिमुखस्थवैश्वानरनालान्तर्गतज्वालिनीप्रज्वालन कृत्वा सप्ताशीतिलिङ्क-
प्रमाणोष्ण यथा भवेत् तथा चक्रद्वयकीलीचालनात् शत्रुविमानोपरि वर्तुला-
कारेण तच्छक्तिप्रसारणद्वारा शत्रुविमाननाशनक्रियारहस्यम् ॥
( ३२) कर्षणरहस्य विचार—अपने विमान के नाशार्थ दूसरे के विमानयानों के लगातार
आने पर विमान के सामने वाले वैश्वानर नाल के अन्तर्गत ज्वालिनी + जलाकर सतासी लिङ्क (डिग्री)
प्रमाण की उष्णता जिससे हो जावे वैसे दो चक्रों की कीली चलाने के द्वारा शत्रुविमान के ऊपर गोलाकार
से उस शक्ति को फैलाने के द्वारा शत्रुविमान के नाश करने का क्रिया रहस्य है ॥
पञ्चञ्च ॥ अ० १ । सू० ३ ॥
सूत्रशब्दार्थ—और पांच का जानने वाला 'अधिकारी' है ।
बोधानन्दवृत्तिः—
यथारहस्यविज्ञान पूर्वसूत्रे निरूपितम् ।
पञ्चावर्तस्वरूपञ्च तथैवास्मिन्निरूप्यते ॥ १ ॥
एतेनोभयविज्ञानादेव यन्तृत्वतामियात् ।
इतिसूत्रद्वयविचारात्सिद्ध भवति ध्रु ( धृ ? ) वम् ॥ २ ॥
पञ्चावर्तविचारस्तु शौनकोक्तप्रकारत ।
रेखादिपञ्चमार्गानुसारदत्र प्रकीर्त्यते ॥ ३ ॥
रेखापथो मण्डलश्च कक्ष्यश ( ोश ? ) क्तिस्तथैव च ।
केन्द्रश्च ( च्चे ? ) ति विमानाना मार्गा खे पञ्चधा स्मृता ॥ ४ ॥
पूर्वसूत्र में जिस प्रकार रहस्यविज्ञान निरूपित किया गया है उसी प्रकार इस सूत्र में पञ्चावर्त-
स्वरूप (पांच आवर्तों-भँवरों-बवण्डरों का स्वरूप) भी निरूपित किया जाता है । इस भांति दोनों के
विज्ञान से ही विमानचालकता को प्राप्त किया जा सकता है यह बात उक्त दोनों सूत्रों के विचार से
निश्चित सिद्ध हो जाती है । पञ्चावर्त विचार शौनक ऋषि के कहे प्रकार से रेखा आदि पाच मार्गों के
अनुसार यहां वर्णन किया जाता है । रेखापथ, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र ये पांच प्रकार के मार्ग विमानों
के आकाश में बतलाए गये हैं ॥ १–४॥
तदुक्तं शौनकीये—
अथाकाशमार्गान्यनुक्रमिष्यामो रेखामण्डलकक्ष्यशक्ति केन्द्रभेदाद्-भूतशक्ति-
प्रवाहमागण्याकूर्मादावारुणान्त वाणमवष्टभ्यैकचत्वारि ष्ठं श ( रिङ् श )

  • विद्युन्मय बत्ती प्रतीत होती है ।

पांच आवर्त्त ] [ १६
र्कोदये ( ये ? ) कपञ्चाशल्लक्षनवसहस्राष्टशतसंख्याकानि भवन्ति तेषु भूरादि
सप्तलोकविमानास्सञ्चरन्तीति ॥
यह बात शौनकीय शास्त्र में कही है—
अब आकाशमार्गों को कहेंगे। रेखा, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र के भेद से भूतशक्तिप्रवाह-
मार्ग कूर्म से लेकर अरुण पर्यन्त ( आकूर्मार्दो आ अरुणान्तं' इस प्रकार पदच्छेद होने पर ) या कूर्म से
लेकर वरुणपर्यन्त (आकूर्मार्द् आ वारुणान्तं' पदच्छेद होने पर ❀ ) बाण ( आयतन ) का अवष्टम्भन
करके इक्तालीस से इक्यावन लक्ष नौ सहस्र आठ सौ होते हैं। उनमें 'भू' आदि सातलोकरूपविमान
सञ्चार करते हैं ॥
एतेषु सूत्रोक्तपञ्चमार्गभेदा यथाक्रमम् ।
यथोक्त धुण्ढिनाथेन तथैवात्र निरूप्यते—
रेखामार्गास्सप्तकोटित्रिलक्षाष्टशतास् (ना ?) स्मृता ।
+द्वाविंशत्कोट्यष्टलक्षद्विशत मण्डले क्रमात् ॥ १ ॥
द्विकोटिनवलक्षत्रिशत कध्ये निरूपिता ।
दशकोट्येकलक्षत्रिशत शक्तिपथेरिता ॥ २ ॥
त्रिशल्लक्षाष्टसाहस्रद्विशत केन्द्रमण्डले ।
एव रेखादिकेन्द्रान्तमण्डलेषु यथाक्रमम् ॥ ३ ॥
वाल्मीकिगणितान्मार्गसंख्या श्लोकैर्नि (नि ?) रूपिता ।
इनमें सूत्रोक्त पांच मार्गभेद यथाक्रम धुण्ढिनाथ ने जैसे कहा है यहा निरूपित किया जाता है—
'रेखामार्ग' सात कोटि तीन लाख आठसौ कहे गये हैं, बाईस कोटि आठ लाख दो सौ 'मण्डल'
में क्रम से, दो कोटि नौ लाख तीन सौ 'कक्ष्य' में कहे हैं, दश कोटि एक लक्ष तीन सौ 'शक्तिपथ' में
कहे हैं, तीन लाख आठ सहस्र दो सौ केन्द्रमण्डल में इस प्रकार 'रेखामार्ग' से लेकर 'केन्द्र' तक मण्डलों
में क्रमानुसार वाल्मीकि गणित से मार्ग संख्या श्लोकों से बतलाई गई है ॥ १–३ ॥
एतेषु यानसञ्चारमार्गनिर्णयमुच्यते ॥—
प्रथमायाश्चतुर्थान्त मार्ग [र्गा?] रेखापथे क्रमात् ।
भुवर्लोकसुवर्लोकमहलोकनिवासिनाम् ॥ १ ॥
विमानसञ्चारमार्गा इति शास्त्रेषु वर्णिता ।
जनो लोकविमानाना गमने मार्गनिर्णय ॥ २ ॥
द्वितीयाद्यापञ्चमान्तमु (त उ ?) क्ता कक्ष्यपथे क्रमात् ।
प्रथमाद्याषडन्तास्स्यु (ता स्यु ?) मार्गाश्शक्तिपथे क्रमात् ॥ ३ ॥
तपोलोकविमानानामिति शास्त्रविनिर्णय ।
तृतीया (य्या ?) येकादशान्ता ब्रह्मलोकनिवासिनाम् ॥ ४ ॥
❀ इस पक्ष मे 'वारुण' में 'वा' लेखकदोष या स्वार्थ मे अण् से आकार है ।

  • 'द्वाविंशत्' इत्येतत्पद चिन्त्यम् । द्वात्रिंशत् इत्यनेन भवितव्य किंवा द्वाविंशति' इत्यस्य इकारलोप
    आर्षश्छन्दस्संख्यापूर्त्यर्थत्वाच्छान्दसो वा ।

२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानसञ्चारमार्गाः प्रोक्ताः केन्द्रपथे क्रमात् ।
वाल्मीकिगणितेनैव गणितागमपारगैः ॥ ५ ॥
विमानानां यथाशास्त्रं कृतो (तं ?) मार्गविनिर्णयः ।
अथावर्त निर्णय —
आवर्ताश्च ॥ अ० १ । सू० ४ ॥
एवमुक्त्वा विमानानां पञ्चमार्गान्यथाक्रमम् । ‡
अथेदानों तदावर्तनिर्णयस्सन्निरूप्यते ॥ ६ ॥
आवर्ता (तं ?) बहुधा प्रोक्ता मार्गसंख्यानुसारतः ।
तेषु यानपथावर्ता पञ्चवैवेति विनिर्गिता ॥ ७ ॥
इनमें यान संचारमार्गों का निर्णय कहा जाता है—
प्रथम से आदि करके चतुर्थ तक मार्ग रेखापथ में क्रम से 'भुव' लोक, 'सुवः' लोक 'महः'
लोक निवासियों के विमान सञ्चार मार्ग इस प्रकार शास्त्रों में वर्णित हैं, 'जनः' लोक विमानो के गमन
में मार्ग निर्णय है । द्वितीय से आदि करके पञ्चम तक कक्ष्यापथ में क्रम से कहा है । प्रथम से आदि
कर छ तक मार्ग शक्तिपथ में क्रम से कहे हैं । 'तपः' लोक विमानों का है यह शास्त्रनिर्णय है तृतीय से
आदि करके एकादश तक 'ब्रह्म' लोक निवासियों के विमान सञ्चार मार्ग केन्द्रपथ में क्रम से कहे हैं ।
इस प्रकार वाल्मीकि गणित से ही गणित शास्त्र के पारंगत विद्वानों ने विमानों का मार्गनिर्णय शास्त्रा-
नुसार किया है ॥ १-५ ॥
आवर्त निर्णय—
इस प्रकार विमानों के पांच आवतों को क्रमानुसार कहकर अब इस समय उन आवर्तों
का निर्णय निरूपति किया जाता है । मार्गसंख्या के अनुसार आवर्त बहुत कहे हैं उनमें यानपथ के आवर्त
पांच ही निर्णय किये हैं ॥ ६-७ ॥
तदुक्तं शौनकीये—
प्रवाहद्वयससर्गादावर्त्तनमिति तान्यनुक्रमिष्याम । रेखापथे शक्त्यावर्तन
मण्डले वातावर्तन कक्ष्ये किरणावर्तन शक्तिपथे शैत्यावर्तन केन्द्रे घर्षणावर्तन-
मित्यवर्ता पञ्चधा भवन्तीति । आवर्ता पञ्चसु पञ्चेति हि ब्राह्मणम्† ।।
यह यह शौनकीय ग्रन्थ में कही है—
दो प्रवाहों के संसर्ग—संघर्ष से आवर्त—होते हैं, उन्हें यहां कहेंगे । रेखापथ में शक्त्यावर्त,
मण्डल में वातावर्त, कक्ष्य में किरणावर्त, शक्तिपथ में शैत्यावर्त, केन्द्र में घर्षणावर्त । इस प्रकार
आवर्त पाँच प्रकार के हैं । आवर्त पांच में पांच हैं ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ में कहा है ।
एव रेखादिमार्गेषु शक्तिद्वयसमाकुलात् ।
आवर्ताः सम्प्रजायन्ते खेटयानविनाशकाः ॥
इस प्रकार रेखा आदि मार्गों में दो शक्तियों के टक्कर से आवर्त उत्पन्न हो जाते हैं जो कि
विमानयानों के विनाशक बन जाते हैं ।
‡ यहा 'मार्गाणि' नपुसक लिङ्ग के इकार का लोप छन्दः पूर्ति के लिये पूर्व के समान है ।
† लुप्तब्राह्मणम् ।

विमानविध्वंसक आवर्त ] 32,622 54/274 [ २१
उक्तं हि मार्गनिबन्धने—
लहयोर्वहयोश्चैव यहयोरहयोस्तथा ।
महयोरन्तरालेषु शक्त्यावर्ता इतीरिता. ।। १ ।। (लल्लकारिका)
लकारेणात्र भूप्रोक्ता हकारादम्बरं स्मृतम् ।
प्रोक्तास्तयोरन्तराले रेखामार्गा (ग ?) स्त्वनेककः ॥ २ ॥
शक्त्यावर्तास्तेष्वनन्तास्स (न्ता स ?) भवन्त्य ( बर्त्य ? ) तिवेगत ।
तैर्भूलोकविमानानां विनाश इति निश्चितः ॥ ३ ॥
अम्बरे वणिते स्याद्वहकारात्मना क्रमात् ।
तयोर्मध्ये मण्डलाख्यमार्गा प्रोक्ता विशेषतः ॥ ४ ॥
वातावर्तास्तेष्वनन्तास्स भवन्त्यतिवेगतः ।
लोकत्रयविमानानां विनाशस्तेषु वणितः ॥ ५ ॥
तथैव यहवर्णाभ्यां वाय्वाकाशे निरूपिते ।
तयोर्मध्ये कक्ष्यार्मास्त्वनेकास्सप्रकीर्तिताः ॥ ६ ॥
भवन्ति किरणावर्तास्तेष्वंशुना प्रवाहतः ।
जनो लोकविमानाना विनाशस्तत्र वर्णितः ॥ ७ ॥
‘मार्गनिबन्धन’ में कहा है—
ल, ह के व, ह के य, ह के तथा र, ह के म, ह के अन्तरालों में शक्त्यावर्त होते हैं ऐसा
कहा है । ‘ल’ से भूमि कही है ‘ह’ से अम्बर समझा गया, इन दोनों के अन्तराल में रेखामार्ग अनेक
हैं । शक्त्यावर्त उनमें अनेक अतिवेग से उत्पन्न हो जाते हैं । उनके द्वारा भूलोकविमानों का विनाश
निश्चित हो जाता है । दो अम्बर व, ह से क्रमशः कहे हैं उनके मध्य में मण्डलनामक मार्ग विशेषतः
कहे गये हैं । उनमें अनन्त आवर्त अतिवेग से उत्पन्न हो जाते हैं जिनमें तीनों लोकों के विमानों का
विनाश वर्णन किया है । इसी प्रकार य, ह वर्ण से वायु आकाश निरूपित किये हैं, उनके मध्य में कक्ष्य
मार्ग अनेक हैं । उनके अन्दर किरणावर्त अंशुओं के प्रवाह से हो जाते हैं वहां ‘जन.’ लोक विमानों का
विनाश वर्णन किया है ॥ १—७ ॥
रवर्णेन रवि प्रोक्तो हवर्णादम्बरं स्मृतम् (तं ?) ।
तयोर्मध्ये शक्तिमार्गा बहुधा सम्प्रकीर्तिताः ॥ ८ ॥
शैत्यावर्तास्तेषु शक्तिससर्गादतिवेगतः ।
सम्भवन्ति विशेषेण खेटयानविनाशकाः ॥ ९ ।
महामार्तण्डशक्तित्वप्रवाहाशो मकारतः ।
हकारेणाम्बरञ्चैव वर्णितं स्याद्यथाक्रमम् ॥१०॥
तयोर्मध्ये केन्द्रमार्गा बहुधा सम्प्रकीर्तिताः ।
भवन्ति घर्षणावर्तास्तेषु नानामुखाः क्रमात् ॥११॥

ब्रह्मलोकविमानानां विनाशस्तैर्निरूपितः ।
शैत्योष्णशक्तिन्यूनातिरिक्ताभ्यां मार्गसन्धिषु ॥१२॥
'र' वर्ण से रवि कहा है 'ह' वर्ण से आकाश बतलाया गया, दोनों के मध्य में शक्तिमार्ग
बहुत कहे हैं। उनमें शैत्यावर्त अतिवेग से शक्तियों के संसर्ग से विशेष करके उत्पन्न हो जाते हैं जो
विमानयानों के नाशक होते हैं। महामार्तण्ड शक्तिश्च प्रवाहांश 'म' से लिया गया है और 'ह' से
आकाश यथाक्रम से वर्णित किये गये हैं। उन दोनों के मध्य में केन्द्रमार्ग प्राय कहे हैं, उनमें घर्षणावर्त
नानाप्रकार के क्रम से होते हैं। उनसे ब्रह्मलोक विमानों का विनाश शैत्य-उष्णशक्तियों के न्यूनाधिक
होने से मार्गसन्धियों में निरूपित किया गया है ॥ ८–१२ ॥
प्रवाहद्वयसंयोगवेगादावर्तनं क्रमादिति ।
एवं रेखादिमार्गेषु आवर्तस्सन्निरूपिता ॥ १३ ॥
तैर्विनाशो विमानानामिति शास्त्रविनिर्णयः ।
पूर्वसूत्रोक्तद्वात्रिंशद्रहस्यज्ञानवत्क्रमात् ॥ १४ ॥
मार्गावर्तस्वरूपे च सूत्राभ्यां

प्रथम अध्याय: चालक-लक्षण, वस्त्र-आहार एवं मार्ग-विभाग

विमान के अङ्ग ] [ २३
यथा सर्वाङ्गसंयुक्तो देहस्स (ह स ?) वार्थसाधने ।
समर्थस्स्या (र्थ स्या ?) द्विमानश्च सर्वाङ्गैस्सयुतस्तथा ॥२॥
विश्वक्रियादर्पणयन्त्रमारभ्य यथाविधि ।
एकत्रिशद्विमानाङ्गस्थानान्युक्तानि भूरिश ॥ ३ ॥
तानि सर्वाणि विधिवत्सङ्ग्रहेण यथाक्रमम् ।
छायापुरुषशास्त्रोक्तप्रकारेणात्र वर्ण्यते ॥ ४ ॥
विमानाङ्ग निर्णय :—
शास्त्र में समस्त विमानों के अङ्गाङ्गी भाव से स्फुट यानवेत्ता कुशल विद्वानों ने विमाना-
कार के निर्णय में कहा है कि जैसे सब अङ्गों से युक्त देह सर्वार्थ साधन में समर्थ होता है इसी प्रकार
विमान भी सब अङ्गों से युक्त होकर समर्थ होता है । यथाविधि विश्वक्रियादर्पण यन्त्र को आरम्भ करके
इकत्तीस विमानाङ्ग स्थानों को अधिक करके या उत्तमता से कहा है उन सबको विधिवत् सङ्क्षेप से
यथाक्रम छायापुरुषशास्त्र में कहे प्रकार से यहां वर्णित किया जाता है ॥ १–४ ॥
आदौ विश्वक्रियादर्शस्थानमित्यभिधीयते ।
शक्त्याकर्षणदर्पणस्थान च तत × परम् ॥ ५ ॥
परिवेषस्थानमुक्त विमानावरणोपरि । ☸
अङ्गोपसंहारयन्त्रस्सप्तमे बिन्दुकीलके ॥ ६ ॥
स्याद्विस्तृतक्रियास्थान रेखैकादशमध्यगे ।
वैरूप्यदर्पणस्थान पद्मचक्रमूख तथ। ' ॥ ७ ॥
शिरोभागे विजानीयाद्विमानस्य बुधः (धै ?) क्रमात् ।
कण्ठे तु कुष्ठिणीशक्तिस्थानमित्युच्यते बुधै । ८ ॥
पुषि्पणीपिञ्जुलादर्शस्थान दक्षिणकेन्द्रके ।
वामपार्श्वमुखे नालपञ्चकस्थानमुच्यते ॥ ६ ॥
आदि में विश्वक्रियादर्शस्थान कहा जाता है इसके आगे शक्त्याकर्षण स्थान कहा है ।
परिवेषस्थान ( परिधिस्थान ) विमानावरण के चारों ओर या ऊपर विमान के अङ्गों का सङ्कोचनयन्त्र
सातवें बिन्दुकील में । विस्तृत क्रियास्थान ग्यारहवीं रेखा के मध्य में होना चाहिये, वैरूप्यदर्पणस्थान
तथा पद्मचक्र मुख ये दोनों विमान के शिरोभाग में बुद्धिमान् क्रमश जाने । विमान के कण्ठ में
कुष्ठिणीशक्तिस्थान होना बुद्धिमानों ने कहा है । पुषि्पणीपिञ्जुलादर्श स्थान दक्षिणकेन्द्र में तथा नाल
पञ्चकस्थान ( पांच नालों का स्थान ) वाम पार्श्व में कहा जाता है ॥ ५–६ ॥
गुहागर्भादर्शयन्त्रस्थान कुक्षिमुखे क्रमात् ।
तमोयन्त्रस्य सस्थान भवेद् वायव्यकेन्द्रके ॥ १० ॥
पञ्चवातस्कन्धनालस्थान पश्चिमकेन्द्रके ।
रौद्रीदर्पणसस्थान वातस्कन्धाख्यकीलकम् ॥ ११ ॥
अध केन्द्रे विजानीयाद्विमानस्य यथाक्रमम् ।
शक्तिस्थान विमानस्य मुखदक्षिणकेन्द्रयो ॥ १२ ॥
× च तदनन्तरम् ( क्वचित् ) ।

  • यहां 'विमानावरणतोपरि' मे विमानावरणात परि न होकर विमानावरणत उपरि' भी हो सकता है विसर्ग
    लोप हो जाने पर त-उ की सन्धि छन्दपत्ति के लिये समझना चाहिये ।