बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शब्दकेन्द्रमुखस्थानं वामभागे निरूपितम् ।
विद्युद्द्वा (द्वा?) दशकस्थानं विमानेशान्यकोणके ॥१३॥
गुहागर्भदर्श यन्त्र का स्थान कुक्षिमुख में क्रमश: कहा है, तमोयन्त्र (अन्धकार करनेवाले
यन्त्र ) का स्थान वायव्य केन्द्र में होना चाहिये । पञ्चवातास्कन्धनाल का स्थान पश्चिम केन्द्र में हो ।
रौद्रीदर्पण स्थान वातस्कन्ध नामक कील में विमान के अध केन्द्र में यथाक्रम जानना चाहिये । शब्द
केन्द्रमुख स्थान बाम भाग में निरूपित किया है बारह विद्युत् का स्थान विमान के ऐशानीकोण में होना
चाहिये ॥ १०–१३॥
प्राणकुण्डलिसंस्थानं यानमूले निरूपितम् ।
भवेच्छक्त्युद् गमस्थानं नाभिकेन्द्रे तथैव च ॥१४॥
वक्रप्रसारणस्थानं विमानाधारपार्श्वके ।
मध्यकेन्द्रे भवेच्छक्तिपञ्जरस्थानकीलकम् ॥ १५ ॥
स्थानं शिरःकीलाख्यं भवेद्यानशिरोपरि । ❋
शब्दाकर्षणयन्त्रस्य स्थानं पश्चिमपार्श्वके ॥ १६ ॥
रूपाकर्षणयन्त्रस्य स्थानं यानभुजे क्रमात् ।
पटप्रसारणस्थानं यानाधोभागमध्यमे ॥ १७ ॥
प्राणकुण्डलीस्थान ( गतियन्त्र ) यान के मूल में निरूपित किया है तथा शक्त्युद्गमस्थान
नाभिकेन्द्र में कहा है । वक्रप्रसारण स्थान विमानाधारपार्श्व में और शक्तिपञ्जरस्थान कील मध्य केन्द्र में
होना चाहिये । शिरःकील नामक स्थान यान के शिर के ऊपर हो, शब्दाकर्षण यन्त्र का स्थान पश्चिम
पार्श्व में होना चाहिये । पटप्रसारणस्थान यान के अधोभाग के मध्य में होना चाहिये ॥ १४-१७॥
दिशाम्पतियन्त्रस्थानं वामकेन्द्रभुजे विदुः ।
पट्टिकाक्रमसस्थानं (न ?) यानावरणमध्यमे ॥ १८ ॥
विमानस्योपरि सूर्यस्य शक्त्याकर्षणपञ्जरम् ।
अपस्मारधूमस्थानं सन्धिनालमुखोत्तरे ॥ १९ ॥
अधोभागे स्तम्भनारुख्ययन्त्रस्थानमितीर्यते ।
वैश्वानराख्यनालस्य स्थानं नाभिमुखे विदुः ॥ २० ॥
इत्येकत्रिंशत्तिकस्थाननिर्णयः परिकीर्तितः ।
दिशाम्पति (दिशाओं के पति) यन्त्र का स्थान वामकेन्द्रभुजा में जानें पट्टिकाभ्रक
(अभ्रक की पट्टिका) का स्थान यानावरण के मध्य में होना चाहिये । विमान के ऊपर सूर्य की शक्ति
को आकर्षण करने वाला पञ्जर हो, अपस्मार धूम का स्थान सन्धिनालमुख के उत्तर भाग में होना
चाहिये । अधोभाग में स्तम्भन नामक यन्त्र का स्थान कहा गया है और वैश्वानर नामक नाल का स्थान
नाभिमुख में जाने ॥ यह एकत्तीस अङ्गस्थानों का निर्णय कहा ॥ १८-२० ॥
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❋ 'शिरोपरि' में 'शिर -उपरि' विसर्गलोप होकर सन्धि छन्द की पूर्ति के लिये है ।