बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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तथैव ध्रुववर्गस्थसोमवाडवशक्तितु ।
इन्दोश्चतुष्षष्ट्युत्तरत्रिशता शक्तिरुज्ज्वला ॥ १२१ ॥
साङ्केतिका डकारोपर्य्याकारेणात्र शाश्वत ।
वाडवाया पञ्चशतशक्ति कालाभिधा तथा ॥ १२२ ॥
ऋक् नाम वाली काश्यपी शक्ति ११० प्रकार की पूर्व की भांति संकेतित कर दी है 'औ' अक्षर
से यथाक्रम । मार्तण्ड की द्रवमुखी शक्ति १०० रूपों वाली, आश्वीनामक भूतशक्ति १०५ रूपोंवाली है इस
प्रकार ये दोनों शक्तियां यहां अनुस्वार ‘ ’ से संकेतित की हैं, सूर्य को ४६ शक्तियां कान्ता नाम की है,
नक्षत्रों की २५ शक्तियां वर्चानामवाली हैं दोनों सांकेतित हैं 'ड' अक्षर से यथाक्रम । वैसे ही ध्रुववर्ग में
स्थित सोमवाडव शक्तियों में चन्द्रमा की ३६४ उज्ज्वल हैं, डकार के ऊपर 'आ' अक्षर सांकेतित किया
है, वाडवा की ५०० शक्तियां कालनामक—॥ ११७–१२२ ॥
साङ्केतिता लकारेण वर्णसङ्केतनिर्णये ।
एवमुक्त्वा सोण्डालसकेतशक्ती यथाविधि ॥ १२३ ॥
इदानी मौर्त्विकलोहशक्तिसङ्केतमुच्यते ।
त्रिशतोत्तरसहस्रसख्याका पार्थिवाभिधा ॥ १२४ ॥
कूर्मशक्तिर्मकारेण पुनस्साङ्केतिता तथा ।
एकोत्तरद्विसहस्रसंख्याका कालाभिधा ॥ १२५ ॥
सङ्केतिता काश्यपस्य शक्तिरोकारतस्तथा ।
षष्ट्युत्तरद्विशतसख्याका लाघवाभिधा ॥ १२६ ॥
'ल' अक्षर से वर्णसंकेतनिर्णय में साङ्केतित करदी है। इस प्रकार मौण्डाल शक्तियों को
यथाविधि कहकर अब मौर्त्विक लोहशक्तियों का संकेत कहा जाता है। १३०० शक्तिया पार्थिव नामवाली
कूर्मशक्ति 'म' अक्षर से संकेतित की है पुनः २००१ कालनामक काश्यप की शक्ति संकेत की है 'ओ' अक्षर'
से, तथा २६० लाघवनाम की—॥ १२३–१२६ ॥
मार्तण्डशक्तिस्सङ्केताद्वयर्णेन निरूपिता ।
सप्तत्रिंशतिसख्याका वर्चुलीनामिका तथा ॥ १२७ ॥
भूतशक्तिस्तकारेण सङ्केतात् सन्निरूपिता ।
त्रिषष्ट्युत्तरसहस्रसंख्याका रुक्मकाभिधा ॥ १२८ ॥
नक्षत्रशक्तिस्सङ्केताद् वकारेणात्र वर्णिता ।
त्रयोदशोत्तरशतसंख्याका वरुणाभिधा ॥ १२६ ॥
अर्कशक्तिरिफारेण सङ्केतान्निरूपिता तथा ।
नवोत्तराष्टसहस्रसंख्याका रुजकाभिधा ॥ १३० ॥
निरूपितात्र सङ्केतादिन्द्रशक्ति ककारत ।
द्वादशोत्तरसहस्रसंख्याका पूर्णिकाभिधा ॥ १३१ ॥