बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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मूलसत्त्वाद् वृद्धिमेतीत्याहुर्ज्ञानविदा वरा ।
मनोबुद्धीन्द्रियग्रामज्ञानाम् माससिक्रिरा ॥ ६३ ॥
फलसत्त्वाद् वृद्धिमेतीत्याहुश्शास्त्रविदा वरा ।
एतत्सत्त्वत्रयाहारो यन्तॄणा भोजने बुधा ॥ ६४ ॥
शास्त्रोक्ताहारवर्गेषु श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतम विदु ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्सत्त्व सग्रहेत् सुधी ॥ ६५ ॥ इत्यादि
आहार मूल वर्ग तो शास्त्र में १६ प्रकार के कहे हैं, वैसे ही आहार फल वर्ग ३२ कहे हैं
कन्दसत्त्व से मेद मज्जा हड्डी वीर्य आदि बढ़ते हैं मूलसत्त्व से ओज, बल काय की पुष्टि प्राण कोश
आदि बढ़ते हैं, फलसत्त्व से मन ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान रक्त मास सिक्रिजर-रस बढ़ते हैं ऐसा श्रेष्ठ शास्त्रज्ञ
कहते हैं, यह तीन सत्त्वों का आहार विमान के चालक यात्रियों के भोजन में विद्वानों ने शास्त्रोक्त आहार
वर्गों में श्रेष्ठतम माना है । अत सर्व प्रयत्न से बुद्धिमान उस सत्त्व का संग्रह करे ॥ ६१-६५ ॥
अपि च तृणादीनाम् ॥ अ० १, सू० १२ ॥
बो० वृ०
पूर्वसूत्रे कन्दमूलफलसत्त्वमुदाहृतम् ।
तृणगुल्मलतादीना सत्त्वमस्मिन्निरूप्यते ॥६६॥
पूर्व सूत्र में कन्द मूल फल का सत्त्व कहा है, इस सूत्र मे तृण गुल्म लता आदियों का सत्त्व
निरूपित किया जाता है ।
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प ग्रन्थ में —
तृणगुल्मलतादीना सत्त्वाहार च यन्तॄणाम् ।
पूर्वोक्तसत्त्ववद् देहारोग्यायुरप्यादिवर्धनम् ॥६७॥
तस्मात् सत्त्वमप्यन्तृभोजनार्थ समाहरेत् ।
दूर्वाषट्क मुञ्जषट्क कुशषट्क तथैव हि ॥६८॥
शौण्डीरस्याश्वकर्णस्य षट्क षट्कमत् परम् ।
शतमूलत्रय चैव भोजनेत्यन्तशोभना ॥६९॥
कारुवेल्ली चन्द्रवेल्ली मधुवेल्ली तथैव च ।
वर्चुली माकुटीवेल्ली सुगन्धा सूर्यवेल्लिका ॥७०॥
तृण, गुल्म, लता आदि का सत्त्व—लुगदी या रस चालक यात्रियों का भोजन है । पूर्वोक्त
सत्त्व—कन्द मूल फल के सत्त्व की भांति देह का आरोग्य आयुश्य आदि बढाने वाला है अत (इनका)
सत्त्व भी भोजनार्थ ले ले । दूब ६ भाग, मूञ्ज ६ भाग, कुशा ६ भाग, शौण्डीर ?—देवधान्य—कंगुनी या
स्वयं उत्पन्न जंगली तृण धान्य ? ६ भाग, अश्वकर्ण—लताशाल ६ भाग, शतमूलं—शतमूलिका—महा-
मूषाकर्णी ३ भाग, भोजन में अत्यन्त अच्छे हैं । कारुवेल्ली—कारवल्ली—छोटा करेला, चन्द्रवेल्ली—
ब्राह्मी, मधु वेल्ली—मुलहठी, वर्चुली ?, माकुटीवेल्ली ?, सुगन्धा—तुलसी, सूर्यवेल्ली—सूर्यवल्ली—
क्षीरकाकोली ॥ ६७-७० ॥