बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 52, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंआहाराधिकरण ] [ २६
ऋतु से उत्पन्न होने वाली २५ विषशक्तियां हैं जो पूर्व कहे आहार के भेद से विनाश को प्राप्त हो
जाती हैं अन्यथा नहीं ॥ ३०–३१ ॥
तदुक्तं विषनिर्णयाधिकारे—वह कहा है विषनिर्णयाधिकार में—
ऋतवष्षड्विधास्तेषा कालशक्त्यादय क्रमात् ।
बहुधा सम्प्रभिद्यन्ते रयवारुणचापलात् ॥३२॥
मरुच्चापलशक्त्य शशतैक तद्गदेव हि ।
वारुणायाप्योडशैकभागाशस्सप्तमेन्तरे ॥३३॥
सम्मेलन यदि भवेत् तदानन्तप्रकारत ।
सिनीवालीकुहूर्योगाद् विषामृतप्रभेदत ॥३४॥
प्रभिद्यन्ते बिशेषेण ऋतूना कालशक्तय ।
यास्सिनीवालिसंग्रस्तास्सर्वामृतशक्तय ॥३५॥
कुहूसंग्रसिता यास्स्युस्तास्सर्वा विषशक्तय ।
सप्तकोट्यष्टपञ्चाशल्लक्षसप्तशतामृता ॥३६॥
तावन्त्येव विषा प्रोक्ता वाल्मीकिगणितोदिता ।
भेदिन्याश्चास्तेषु ? पञ्चविंशास्स्युर्विषशक्तय ॥३७
ऋतुकालानुसारेण यन्त्रदेहविनाशका ।
तन्नाशश्चाहारभेदादिति शातातपोऽब्रवीत् ॥३८॥ इति
तस्मादाहारभेदोस्मिन् सूत्रे त्रेधा निरूपित ।
तत्सेवनात् कायपुष्टिर्यन्तॄणा प्रभवेद् ध्रुवम् ॥३६॥
ऋतुएं छ प्रकार की हैं उनकी कालशक्ति आदि कम से वरुण—आकाश में फैले जल के वेग
की चपलता से बहुत भेदों में होते हैं उसी प्रकार मरुत्-आकाशीय वायु की चपलशक्ति के भाग १०१ हैं,
वारुण शक्ति के १६ अंश (सौ) सातवें अन्तर में हैं सम्मेल यदि हो तो तब अनन्त प्रकार से हो,
सिनीवालीपूर्वा अमावस्या और कुहू—उत्तरा अमावस्या के योग से विष अमृत के भेद से भिन्न-भिन्न
हो जाती है । जो तो सिनीवाली से सम्बन्ध रखती हुई हैं वे सब अमृत शक्तिया हैं और जो कुहू
से संग्रस्त हैं वे सब विषशक्तियां हैं । सात करोड़ अठावन लाख सात सौ अमृत शक्तियां हैं और
उतनी ही विष शक्तिकां वाल्मीकि गणित से कही हुई हैं, उनमें भेदिनियां २५ विषशक्तियां हैं
जो ऋतुकालानुसार चालक यात्रियों के देह का विनाश करने वाली है। उनका नाश आहारभेद से
हो जाता है ऐसे शातातप के पुत्र शातातप ऋषि ने कहा है । अतः आहारभेद इस सूत्र में तीन स्थानों
पर कहा है, उनके सेवन से यात्रियों की शरीरपुष्टि निश्चित हो जावे ॥ ३२—३६ ॥
तत्कालानुसारदिति ॥ अ० १ सू० ६ ॥
बो० बृ०