बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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उन दोनों में आदिम पद 'अथ' अनन्तरार्थ का वाची है। दूसरे पद से विमानकार्य के योग्य लोहे कहे
हैं। पदों का अर्थ ऐसे कहकर अब विशेषार्थ कहा जाता है। शौनकीय सूत्र में जैसे लोहे कहे हैं वैसे
ही यथाक्रम उन्हें विमानरचनाविधि में कहूंगा ॥ ७६—७९ ॥
तदुक्तं शौनकोये—वह कहा है शौनकीय सूत्र में-
अथ वैमानिकान् लोहाननुक्रमिष्यामस्सौमकसौण्डालिकमौक्तिकाइचे-
तत्सम्मेलनादूष्मपाष्षोडशधा भवन्तीति ते वैमानिका इति ॥
अथ वैमानिक - विमान के हितकर लोहों को कहेंगे जो कि सौमक, सौण्डालिक, मौक्तिक हैं।
इनके सम्मेलन से ऊष्मप लोहे १६ प्रकार के होते हैं अत. वे वैमानिक लोहे होते हैं ॥
अथ नामानि - अथ उनके नाम हैं-
उष्णाम्भरोष्णपोष्णाहनराजाम्लतृड् वीरहापञ्चघ्नोग्नितृड्भारहनशीत-
ह्नोगरलघ्नाम्लहनो विषम्भरविशल्यकृद् द्विजमित्रश्चेतीत्यादि ॥
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