बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एतल्लोहस्य शक्तीनां वर्णासङ्केतनिर्णयं ।
परिभाषाचन्द्रिकोक्तरीत्या किञ्चिन्निरूप्यते ॥ १०१ ॥
विमानरचना के लिये जो लोहे कृतक कहे हैं उनके बीज लोहे सौम आदि निश्चित किए गए
हैं। “स, औ, म,” अक्षरों की शक्ति भागों के मेल से इनके सहयोग के कारण लोहरूप को प्राप्त हुआ
अतः सौम इस नाम से कहा गया है। यह लोहे की वर्ण शक्तियों का संकेत निर्णय है, परिभाषाचन्द्रिका
की कही रीति से किञ्चित् निरूपण किया जाता है ॥ ६६-१०१ ॥
उक्तं हि परिभाषाचन्द्रिकायाम्—कहा ही है परिभाषाचन्द्रिका में—
सू० साङ्केतकाश्र्चतुर्वर्गीया ॥
विश्वम्भरकारिका--इस पर विश्वम्भरकारिका है—
वारुणीसूर्यकिरणादिति ध्रुवभेदत ।
सर्वेषा बीजलोहाना शक्तिवर्गाश्चतुविधा ॥ १०२ ॥
एकैकवर्गसङ्क्लृप्ताश्शक्तयस्तेषु शास्त्रत ।
लक्षैक च सहस्राणा सप्तषष्टितमास्तथा ॥ १०३ ॥
शताना सप्ततदुपर्यष्टषष्टितम क्रमात् ।
इति वाल्मीकिगणितप्रमाणात् सन्निरूपिता ॥ १०४ ॥
तेषु वारुणीवर्गस्य कूर्मकश्यपशक्तिषु ।
सप्तषष्टितमा शक्तिरुषाख्या कूर्मगर्भजा ॥ १०५ ॥
पञ्चाशीतितमा शक्ति कालारूपा काश्यपी तथा ।
साङ्केतकादिमो शक्ती सकारे सन्निरूपिते ॥ १०६ ॥
वारुणी—वरुणशक्ति और सूर्यकिरण से इस प्रकार स्थिर भेद से सब बीज लोहों के शक्तिवर्ग
चार प्रकार के हैं। एक एक वर्ग से विभक्त शास्त्र से उन में शक्तियां १ लाख ६७ सहस्र ७ सौ ६८ हैं यह
वाल्मीकि गणित से निरूपित की गई हैं। उनमें वारुणी वर्ग की कूर्मकश्यप शक्तियों में ६७वीं शक्ति
उषा नामक कूर्मगर्भ से उत्पन्न होने वाली है, ८५वीं काश्यपी कालनाम की शक्ति तथा संकेतवाली
आदिम दो शक्तियां 'स' अक्षर में कही हैं ॥ १०२-१०६ ॥
अर्कांशुवर्गे मार्तण्डभूतसञ्जातशक्तिषु ।
एकसप्ततिमा शक्तिर्मार्तण्डस्याम्बरा तथा ॥ १०७ ॥
रुचिकाख्या भूतशक्तिष्षष्ट्युत्तरशतात्मिका ।
उभो साङ्केतरूपेण ओकारे सम्प्रदर्शिते ॥ १०८ ॥
तथेवादितिगर्भस्थसूर्यनक्षत्रशक्तिषु ।
सुन्दराख्या नवमी शक्तिरादित्यस्य तथैव हि ॥ १०९ ॥
ऋक्षस्य शक्तिर्भोमाख्या एकोत्तरशतात्मिका ।
एते साङ्केतकादत्र मकारेणाभिर्वाणते ॥ ११० ॥