बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानसञ्चारमार्गाः प्रोक्ताः केन्द्रपथे क्रमात् ।
वाल्मीकिगणितेनैव गणितागमपारगैः ॥ ५ ॥
विमानानां यथाशास्त्रं कृतो (तं ?) मार्गविनिर्णयः ।
अथावर्त निर्णय —
आवर्ताश्च ॥ अ० १ । सू० ४ ॥
एवमुक्त्वा विमानानां पञ्चमार्गान्यथाक्रमम् । ‡
अथेदानों तदावर्तनिर्णयस्सन्निरूप्यते ॥ ६ ॥
आवर्ता (तं ?) बहुधा प्रोक्ता मार्गसंख्यानुसारतः ।
तेषु यानपथावर्ता पञ्चवैवेति विनिर्गिता ॥ ७ ॥
इनमें यान संचारमार्गों का निर्णय कहा जाता है—
प्रथम से आदि करके चतुर्थ तक मार्ग रेखापथ में क्रम से 'भुव' लोक, 'सुवः' लोक 'महः'
लोक निवासियों के विमान सञ्चार मार्ग इस प्रकार शास्त्रों में वर्णित हैं, 'जनः' लोक विमानो के गमन
में मार्ग निर्णय है । द्वितीय से आदि करके पञ्चम तक कक्ष्यापथ में क्रम से कहा है । प्रथम से आदि
कर छ तक मार्ग शक्तिपथ में क्रम से कहे हैं । 'तपः' लोक विमानों का है यह शास्त्रनिर्णय है तृतीय से
आदि करके एकादश तक 'ब्रह्म' लोक निवासियों के विमान सञ्चार मार्ग केन्द्रपथ में क्रम से कहे हैं ।
इस प्रकार वाल्मीकि गणित से ही गणित शास्त्र के पारंगत विद्वानों ने विमानों का मार्गनिर्णय शास्त्रा-
नुसार किया है ॥ १-५ ॥
आवर्त निर्णय—
इस प्रकार विमानों के पांच आवतों को क्रमानुसार कहकर अब इस समय उन आवर्तों
का निर्णय निरूपति किया जाता है । मार्गसंख्या के अनुसार आवर्त बहुत कहे हैं उनमें यानपथ के आवर्त
पांच ही निर्णय किये हैं ॥ ६-७ ॥
तदुक्तं शौनकीये—
प्रवाहद्वयससर्गादावर्त्तनमिति तान्यनुक्रमिष्याम । रेखापथे शक्त्यावर्तन
मण्डले वातावर्तन कक्ष्ये किरणावर्तन शक्तिपथे शैत्यावर्तन केन्द्रे घर्षणावर्तन-
मित्यवर्ता पञ्चधा भवन्तीति । आवर्ता पञ्चसु पञ्चेति हि ब्राह्मणम्† ।।
यह यह शौनकीय ग्रन्थ में कही है—
दो प्रवाहों के संसर्ग—संघर्ष से आवर्त—होते हैं, उन्हें यहां कहेंगे । रेखापथ में शक्त्यावर्त,
मण्डल में वातावर्त, कक्ष्य में किरणावर्त, शक्तिपथ में शैत्यावर्त, केन्द्र में घर्षणावर्त । इस प्रकार
आवर्त पाँच प्रकार के हैं । आवर्त पांच में पांच हैं ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ में कहा है ।
एव रेखादिमार्गेषु शक्तिद्वयसमाकुलात् ।
आवर्ताः सम्प्रजायन्ते खेटयानविनाशकाः ॥
इस प्रकार रेखा आदि मार्गों में दो शक्तियों के टक्कर से आवर्त उत्पन्न हो जाते हैं जो कि
विमानयानों के विनाशक बन जाते हैं ।
‡ यहा 'मार्गाणि' नपुसक लिङ्ग के इकार का लोप छन्दः पूर्ति के लिये पूर्व के समान है ।
† लुप्तब्राह्मणम् ।