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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 368 में से

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पृष्ठ 27

४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यहां वाचकरूप ओम् ही विमान है ऐसा वर्णित किया है गुरुद्वारा उपदिष्ट मार्ग से उस पर
शास्त्रानुसार आरोहण कर जो उपासक जन ब्रह्मचर्य आदि साधन द्वारा ब्रह्मपद को प्राप्त होते हैं वह ऐसा
ब्रह्मपद यहां मङ्गलश्लोकरूप वचन से विमान प्रतिपादित किया है ॥ १६—२० ॥
तदर्थबोधकपदान्यष्ट श्लोके स्मृतानि हि ।
द्वितीय (य्य ? )† पदतस्तेषु सम्यगुक्ता मुमुक्षव ॥ २१ ॥
स एव कर्तृवाची स्याज्जीववाचीति चोच्यते ।
यद्विमानगतेप्यत्र वाचक प्रणवस्मृत ॥ २२ ॥
विमानत्वेनात्र सम्यक्तदेव प्रतिपादित ।
एष एवादिमपदो भवेत् कर्तृविशेषणम् ॥ २३ ॥
तुरीयपदत प्रोक्तमवाङ्‌मानसगोचरम् ।
अखण्डेकरस ब्रह्म प्राप्तव्यस्थानमुत्तमम् ॥ २४ ॥
उक्तमेतत्कर्मपदमिति श्लोकान्वयक्रमात् ।
प्रणवाख्यविमानेन गमन यत्प्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥
तत्तृतीयपदेनोक्त वाच्यलक्ष्यैक्यबोधकम् ।
क्रियापदमिति प्रोक्तम (क्त ञ्च?)न्वयक्रमत (त?) स्फुटम् ॥२६॥
विशेषणपदानि स्यु कर्मणस्त्रीण्यथाक्रमम् । +
प्रसिद्धि (द्ध?) द्योतनार्थाय पञ्चम पदमीरितम् ॥ २७ ॥
तथैव सप्तपद नित्यानन्दप्रबोधकम् ।
सर्ववेदान्तमानत्वबोधार्थ चाष्टम पदम् ॥ २८ ॥
उसके अर्थबोधक आठ पद यहां श्लोक में स्मरण किए गये हैं—कहे हैं, उनमें द्वितीय पद
से मुमुक्षु भली प्रकार कहे हैं। वह ही ओम् कर्तृवाची अर्थात् जगत्कर्ता परमेश्वर का वाचक है और
जीववाची अर्थात् जीव का वाचक भी कहा जाता है ‡, यहां जिस विमानपदप्राप्ति पर भी ओम् वाचक
निश्चित है। यहां मङ्गलाचरण में विमानरूप से वह ही भली प्रकार प्रतिपादित किया है वह ही आदि
का पद अर्थात् ब्रह्मात्मा का प्रथम पाद या ओम् में अकार कर्तृविशेषण है। तुरीय पद अर्थात्—ब्रह्मात्मा
के चतुर्थ पाद या ओम् के अमात्ररूप से वाणी और मन के व्यवहार से रहित अर्थात्—अवर्णनीय और
अचिन्त्य अखण्ड एकरस उत्तम प्राप्तव्य स्थानरूप ब्रह्म कहा है। यह कर्मपद इस प्रकार श्लोकान्वय क्रम
में कह दिया ओम् रूप विमान से गमन करना पहुँचना या प्राप्त करना जो कहा गया है। तृतीय पद से
† यहा द्वितीय' मे यकारद्वय पूर्व की भांति दाक्षिणात्य हो सकता है।

  • यहा 'त्रीण्यथाक्रमम्' त्रीणि यथाक्रमम् मे त्रीणि के अन्तिम इकार का लोप पुरातन छान्दस है।
    ‡ ओम् को जीववाची भी कहना यह वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके श्लोक का अनुवाद
    किया है।