बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविमान के अङ्ग ] [ २३
यथा सर्वाङ्गसंयुक्तो देहस्स (ह स ?) वार्थसाधने ।
समर्थस्स्या (र्थ स्या ?) द्विमानश्च सर्वाङ्गैस्सयुतस्तथा ॥२॥
विश्वक्रियादर्पणयन्त्रमारभ्य यथाविधि ।
एकत्रिशद्विमानाङ्गस्थानान्युक्तानि भूरिश ॥ ३ ॥
तानि सर्वाणि विधिवत्सङ्ग्रहेण यथाक्रमम् ।
छायापुरुषशास्त्रोक्तप्रकारेणात्र वर्ण्यते ॥ ४ ॥
विमानाङ्ग निर्णय :—
शास्त्र में समस्त विमानों के अङ्गाङ्गी भाव से स्फुट यानवेत्ता कुशल विद्वानों ने विमाना-
कार के निर्णय में कहा है कि जैसे सब अङ्गों से युक्त देह सर्वार्थ साधन में समर्थ होता है इसी प्रकार
विमान भी सब अङ्गों से युक्त होकर समर्थ होता है । यथाविधि विश्वक्रियादर्पण यन्त्र को आरम्भ करके
इकत्तीस विमानाङ्ग स्थानों को अधिक करके या उत्तमता से कहा है उन सबको विधिवत् सङ्क्षेप से
यथाक्रम छायापुरुषशास्त्र में कहे प्रकार से यहां वर्णित किया जाता है ॥ १–४ ॥
आदौ विश्वक्रियादर्शस्थानमित्यभिधीयते ।
शक्त्याकर्षणदर्पणस्थान च तत × परम् ॥ ५ ॥
परिवेषस्थानमुक्त विमानावरणोपरि । ☸
अङ्गोपसंहारयन्त्रस्सप्तमे बिन्दुकीलके ॥ ६ ॥
स्याद्विस्तृतक्रियास्थान रेखैकादशमध्यगे ।
वैरूप्यदर्पणस्थान पद्मचक्रमूख तथ। ' ॥ ७ ॥
शिरोभागे विजानीयाद्विमानस्य बुधः (धै ?) क्रमात् ।
कण्ठे तु कुष्ठिणीशक्तिस्थानमित्युच्यते बुधै । ८ ॥
पुषि्पणीपिञ्जुलादर्शस्थान दक्षिणकेन्द्रके ।
वामपार्श्वमुखे नालपञ्चकस्थानमुच्यते ॥ ६ ॥
आदि में विश्वक्रियादर्शस्थान कहा जाता है इसके आगे शक्त्याकर्षण स्थान कहा है ।
परिवेषस्थान ( परिधिस्थान ) विमानावरण के चारों ओर या ऊपर विमान के अङ्गों का सङ्कोचनयन्त्र
सातवें बिन्दुकील में । विस्तृत क्रियास्थान ग्यारहवीं रेखा के मध्य में होना चाहिये, वैरूप्यदर्पणस्थान
तथा पद्मचक्र मुख ये दोनों विमान के शिरोभाग में बुद्धिमान् क्रमश जाने । विमान के कण्ठ में
कुष्ठिणीशक्तिस्थान होना बुद्धिमानों ने कहा है । पुषि्पणीपिञ्जुलादर्श स्थान दक्षिणकेन्द्र में तथा नाल
पञ्चकस्थान ( पांच नालों का स्थान ) वाम पार्श्व में कहा जाता है ॥ ५–६ ॥
गुहागर्भादर्शयन्त्रस्थान कुक्षिमुखे क्रमात् ।
तमोयन्त्रस्य सस्थान भवेद् वायव्यकेन्द्रके ॥ १० ॥
पञ्चवातस्कन्धनालस्थान पश्चिमकेन्द्रके ।
रौद्रीदर्पणसस्थान वातस्कन्धाख्यकीलकम् ॥ ११ ॥
अध केन्द्रे विजानीयाद्विमानस्य यथाक्रमम् ।
शक्तिस्थान विमानस्य मुखदक्षिणकेन्द्रयो ॥ १२ ॥
× च तदनन्तरम् ( क्वचित् ) ।
- यहां 'विमानावरणतोपरि' मे विमानावरणात परि न होकर विमानावरणत उपरि' भी हो सकता है विसर्ग
लोप हो जाने पर त-उ की सन्धि छन्दपत्ति के लिये समझना चाहिये ।