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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 368 में से

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पृष्ठ 38

विमान के रहस्य ] [ १५
स्मरणात् सर्वेषा हृदयकम्पन भवति किष्कुत्रयप्रमाणकम्पन यदा भवति
स्मृतिविस्मरण भवति तद्द्वा ( द्वा ? ) रा परेषा विमोहनक्रियारहस्यम् ॥
(२०) महाशब्दविमोहनरहस्य विचार—विमानस्थ सात नालों के वायु को एक करके शब्द-
केन्द्रमुख में बन्द करके पश्चात् कीली (घुण्डी) को चलावे, उसके वेग से शब्दप्रकाशिका में कही रीति
के अनुसार बासठ धौंकने वाली कलाओं के संघर्षण शब्द (गूंज) के समान महाशब्द उत्पन्न होता है
उस शब्द के स्मरण से सब का हृदय कांप जाता है, तीन किष्कुओं ( तीन बालिश्त या तीन हाथ-तीन
फीट ) के प्रमाण-जितना कम्पन जब होता है तब स्मृतिनाश हो जाता है उसके द्वारा दूसरों को विमोहित
मूर्च्छित करने का रहस्य है।
(२१) लङ्घनरहस्यो नाम—वायुतत्त्वप्रकरणोक्तप्रकारेण वातमण्डल-
परिधिरेखासु विमानसञ्चारकाले यदा सूर्यगोलवाडवामुखकिरणज्वालाप्रवाहो
(ह ?) विमानाभिमुखो भवति तेन विमान प्रज्वलितो भवति । अत
तन्निवारणा (र्णा ?) र्थंविमानस्थविशुद्धतशक्तितमेकीकृत्य विमानस्यप्राण-
कुण्डलीस्थाने सन्धाय पश्चात् कीलीचालनेन विमानोट्डीयनद्वारा कुल्यालङ्घन-
वद्रे खाद्द्रै खान्तरलङ्घनक्रियारहस्यम् ॥
( २१ ) लङ्घन रहस्य विचार—वायु तत्त्व प्रकरण में कहे प्रकारानुसार वातमण्डल परिधि-
रेखाओं में विमान संचार समय जब सूर्यगोले के वाडवामुख* (का) किरण ज्वालाप्रवाह विमान जल
उठता है, अत उसके निवारणार्थ विमानस्थ विद्युत् और वायु की शक्ति को मिलाकर विमान के प्राण-
कुण्डली स्थान ( मोटर मशीन ) मे युक्त करके पीछे कीली-घुण्डी चलाने से विमान के ऊर्ध्वगमन—ऊपर
उछलने (Jumping) द्वारा नहर नदी के लंघन की भांति एक रेखा से दूसरी रेखा पर लङ्घन करने-
फांन्दने कूदने (Jumping) का रहस्य है ॥
(२२) सार्पगमनरहस्यो नाम—दण्डवक्रादिसप्तविधमातरिश्वार्ककिरण-
शक्तोराकृष्य यानमुखस्थवक्रप्रसारणकेन्द्रमुखे नियोज्य पश्चात्तादाहृत्य शक्त्युद्ग
(द्ग ?) मन्त्काले प्रवेशयेत् । तत तत्कीलीचालनाद्विमानस्य सर्पवद् गमन-
क्रियारहस्यम् ॥
( २२ ) सार्पगमनरहस्य विचार—दण्ड चक्र आदि सात प्रकार के वायु और सूर्यकिरण की
शक्तियों को आकर्षित करके यानमुख में स्थित वक्रप्रसारण केन्द्रमुख में अर्थात् टेढ़ा फेंकने वाले केन्द्र-
मुख में नियुक्त करके पश्चात् उसका आहरण करके शक्ति को उत्पन्न करने निकालने वाले नाल में प्रवेश
करे तब उस कीली ( घुण्डी-बटन ) को चलाने से विमान का सर्प के समान गमनक्रिया रहस्य है ॥
(२३) चापलरहस्यो नाम—शत्रुविमानसन्दर्शनकाले विमानमध्यकेन्द्र-
स्थशक्तिपञ्जरकीलीचालने-एकछोटिकार्याच्छन्नकाले सप्ताशीत्युत्तरचतुस्सहस्र-
तरङ्गवेगो जायते तत्प्रसारणाच्छत्रुविमानकम्पनक्रियारहस्यम् ॥

  • हो सकता हैं यह कोई विमानभेदी तोप की विमानप्रज्वालक सर्च लाईट की भांति का कोई ज्वालोत्पादक
    साधन हो ।