बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
( १० ) सङ्कोचनरहस्यो नाम--यन्त्रोपसंहाराधिकारोक्तरीत्या
[अन्त ?] रन्तरिक्षेति [यति ?] वेगात्पलायमानाना विस्तृतखेटयानानाम-
पायसम्भवे विमानस्थसप्तमकीलीचालनद्वारा तदङ्गोपसंहारक्रियारहस्यम् ॥
(१०) सङ्कोचन रहस्य विचार - यन्त्रोपसंहाराधिकार में कही रीति के अनुसार आकाश में
दौड़ते हुए बड़े विमानों के अतिवेग से अपने विमान के नाश की सम्भावना होने पर विमानस्थ
सातवीं कीली अर्थात् घुण्डी ( बटन पेंच ) के चलाने द्वारा उसके अङ्गों का उपसंहार अर्थात् सङ्कोचन
किया रहस्य है ॥*
(११) विस्तृतरहस्यो नाम - आकाशतन्त्रोक्तप्रकारेणाका [ रा आ ? ]
शतृतीयपञ्चमपरिधिमण्डलस्थानीय [य्य ?] मूलवातपरिधिकेन्द्रस्थविमानाना
वाल्मीकिगणितोक्तविमानप्रस्ताररेखाविन्यासमनुसृत्य विमानस्थैका [ स्थ
एका ] दशरेखामुखस्थानीयकीलीचालनद्वारा तात्कालिकोपयुक्तप्रमाणमनुसृत्य
विमानविस्तृतक्रियाकरणरहस्यम् ॥
(११) विस्तृत रहस्य विचार - आकाशतन्त्र में कहे प्रकारानुसार आकाश के तृतीय पञ्चम
परिधिमण्डलस्थानीय मूलवात परिधिकेन्द्रस्थ विमानों का वाल्मीकि गणित में कहे विमानप्रस्ताररेखा-
विन्यास का अनुसरण कर विमानस्थ ग्यारहवीं रेखा के मुखस्थानीय कीली - घुण्डी ( बटन पेंच ) के
चलाने द्वारा तात्कालिक उपयुक्त प्रमाण का अनुसरण करके विमान का विस्तृत किया रहस्य है ॥
(१२) विरूपकरणरहस्यो नाम - धूमप्रकरणोक्तप्रकारेण द्वात्रिंशज्जा-
तीयधूमराशि यन्त्रद्वारा परिकल्प्य तस्मिन् तरङ्गशक्त्युष्णमखण्डितप्रकाश
मेलयित्वा पश्चाद्विमानशिरोभागस्थभैरवीतैलसंस्कारितवैरूप्यदर्पणमुखे पद्मक-
चक्रमुखनालद्वारा पूर्वोक्तप्रकाशशक्ति सन्धार्य द्वात्रिंशदुत्तरशतकथ्यप्रमाण-
वेगात् परिभ्राम्यमाणे सति मण्डलाकारेण महाभयप्रदविकाराकारो जायते
विमानद्रष्टॄणा तत्प्रदर्शनद्वारा महाभयोत्पादनकार्यरहस्यम् ॥
(१२) विरूपकरण रहस्य विचार - धूम प्रकरण में कहे प्रकारानुसार बत्तीस प्रकार के धूमों की
राशि को यन्त्र द्वारा उत्पन्न कर उसमें तरङ्ग शक्ति की उष्णता से उत्पन्न प्रकाश का मिलाकर पश्चात्
विमान के सिर वाले भाग में रहने वाले भैरवी तैल ( कोई पेट्रोल जैसा तैल होगा ) से संस्कारित वैरूप
दर्पण मुख में पद्मक चक्रमुख की नाल द्वारा पूर्वोक्त प्रकाशशक्ति को युक्त करके एक सौ बत्तीस घोड़ों या
दर्जे के वेग से घुमाने पर गोल घेरे रूप से महाभयप्रद विकार का आकार उत्पन्न हो जाता है, विमान
देखने वालों को उसके देखने से महाभयोत्पादन कार्य का रहस्य है ॥
(१३) रूपान्तररहस्यो नाम - तैलप्रकरणोक्तप्रकारेण गृध्रजिह्वा-
कुम्भिणीकाकजङ्घादितैलसंस्कारितवैरूप्यदर्पणे-एकोनविंशतीधूम संयोज्य
तस्मिन् यानस्थकुण्डिणीशक्तिसंयोजनद्वारा विमानद्रष्टॄणा सिंहव्याघ्रभल्लूक-
सर्पगिरिनदीवृक्षादिविकारेणा [ रा अ ? ] न्यथाकल्पितरूपान्तरप्रदर्शनरहस्यम् ॥
- इससे बचने, भाग निकलने का तात्पर्य विदित होता है ।