बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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( २३ ) चापलरहस्य विचार—शत्रु का विमान दिखलाई पड़ने पर अपने विमान के मध्य
केन्द्रस्थ शक्तिपञ्जर की कीली चलाने से एक छोटिकामात्र ( तर्जनी अङ्गुष्ठ ध्वनि—चुटकी—क्षणभर )
काल मे चार हजार सतासी तरङ्गों का वेग उत्पन्न हो जाता है उसके फैलाने से शत्रुविमान के डांवाडोल
होने उलट गिरने का रहस्य है ॥
(२४) सर्वतोमुखरहस्यो नाम--स्वपथे स्वविमानविनाशार्थं परविमान-
शतैरा ( व्रा ?) वृते सति तदा स्वविमानशिरःकेन्द्रकीलीचालन'दनेक-
विमानवत्सर्वतोमुखसञ्चारक्रियारहस्यम् ॥
( २४) सर्वतो मुखरहस्य विचार—अपने मार्ग में अपने विमान के विनाशार्थ दूसरे के
सैकडों विमानों से घिर जाने पर अपने विमान के शिर की कीली ( घुण्डी बटन ) के चलाने से अनेक
विमानों की भांति सब ओर संचार करने का क्रिया रहस्य है ॥
(२५) परशब्दग्राहक रहस्यो नाम--सौदामिनीकलोक्तप्रकारेण विमान-
स्थशब्दग्राहकयन्त्रद्वारा परविमानस्थजनसंभाषणादिसर्वशब्दाकर्षण रहस्यम् ॥
( २५ ) पर शब्दग्राहक रहस्य विचार—'सौदामिनीकला' ( विद्युत्कला पुस्तक ) मे कहे प्रकारा-
नुसार विमानस्थ शब्दग्राहक यन्त्र के द्वारा आकाश के प्रथम मण्डल की परिधि को आरम्भ करके सात
परिधि मण्डलपर्यन्त परविमानस्थ जन सम्भाषण आदि समस्त शब्दों का आकर्षण रहस्य है ॥
(२६) रूपाकर्षणरहस्यो नाम--विमानस्थरूपाकर्षणयन्त्रद्वारा पर-
विमानस्थितवस्तुरूपाकर्षणरहस्यम् ॥
( २६ ) रूपाकर्षणरहस्य विचार—विमान में स्थित रूप का आकर्षण यन्त्रद्वारा परविमानस्थित
वस्तुओं के रूप के आकर्षण का रहस्य है ॥
(२७) क्रियाग्रहणरहस्यो नाम--विमाताधःकीलीचालनाच्छुद्धपट-
प्रसारणं भवति । ईशान्यकोणस्थद्रावकत्रये शक्तिसंयोजनं कृत्वा तच्छक्तिसप्त-
वर्गसूर्यकिरणेषु सन्धांयं पूर्वोक्तशुद्धटल दर्पणाभिमुखीकरणं कृत्वा तन्मुखात्पू-
र्वोक्तशक्तिप्रसारणपूर्वकोध्र्वकीलीचालनद्वाग विमानाधोभागस्थितपृथिव्य (व)
न्तरिक्षेषु यद्यत्क्रियारहस्यान्यन्ये क्रिय (कीय ?) न्ते तत्स्वरूपप्रतिबिम्बं शुद्ध-
पटले मूर्तवच्चित्रित (तो ?) भवति तद्द्वा [द्वा ] रा क्रियाग्रहणरहस्यम् ॥
( २७ ) क्रियाग्रहण रहस्य विचार—विमान के नीचे की कीली-घुण्डी के चलाने से शुद्ध पट
फैल जाता है, ईशान्यकोणस्थ तीन द्रावकों ❊ में शक्तिसंयोजन करके उस शक्ति को सप्तवर्गसूर्यकिरणों
मे सन्धान करके पूर्वोक्त शुद्ध पटल को दर्पण के सामने की ओर करके उसके मुख से पूर्वोक्त शक्ति फैलने
के साथ ऊपर की कीली-धुन्डी चलाने के द्वारा विमान के नीचे के भाग में स्थित पृथिवी, जल, अन्तरिक्ष
में जो जो क्रियारहस्य अन्यों द्वारा किये जाते हैं उनका स्वरूपप्रतिबिम्ब शुद्ध पटल पर मूर्त के समान
चित्रित हो जाता है उसके द्वारा क्रियाग्रहण रहस्य है ॥
❊ ये द्रावक किसी रूप आदि शक्ति के फैलाने वाले द्रावक पात्र साधन प्रतीत होते है ।