बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
(१६) तमोमयरहस्यो नाम—दर्पणप्रकरणोक्ततमश्श [ मो श ? ]
क्त्या [क्त्यप ?] कर्षणदर्पणद्वारा तमश्शक्तिमाहृत्य विमानपञ्जरवायव्य-
केन्द्रस्थतमोयन्त्रमुखात्तमो विद्युति संधाय तत्कीलीचालनान्मध्याह्नकालेऽमा
[ भ्रमा ? ] रात्रिवत्तमोविकारप्रदर्शनरहस्यम् ॥
(१६) तमोमय रहस्य विचार—दर्पणप्रकरण में कही अन्धकारशक्ति के आकर्षण (या फैलाव ?)
के द्वारा अन्धकार शक्ति का आहरण करके विमानपञ्जर के वायव्यकेन्द्रस्थ तमोयन्त्र के मुख से अन्धकार
को विद्युत् में मिलाकर उसकी कीली (घुण्डी-बटन) के चलाने से मध्याह्नकाल में अमावश्या की रात्रि
की भांति अन्धकाररूप विकार के दीखने का रहस्य है ।
(१७) प्रलयरहस्यो नाम—ऐन्द्रजालिकप्रलयपटलोक्तरीत्या यानपुरो-
भागकेन्द्रस्थोपसंहारयन्त्रनालात्सप्तजातीयधूममाकृष्य पड्गर्भ विवेकोक्तमेघ-
धूमेऽन्त [ अन्त ? ] र्धाय तद्धूम विद्युत्संसर्गात्पञ्चस्कन्धवातनालमुखेषु प्रसार्य
तद्द्वा [ द्वा ? ] रा सर्वपदार्थाना प्रलयवन्नाशक्रियाकरणरहस्यम् ॥
(१७) प्रलय रहस्य विचार—ऐन्द्रजालिक प्रलयपटल में कही रीति के अनुसार यान के
सामने के केन्द्र में रहने वाले सङ्कोचक यन्त्रनाल से सात प्रकार के धूम का आकर्षण करके 'पड्गर्भ-
विवेक' में कहे मेघधूम में छिपा कर उस धूम को विद्युत्संसर्ग से पञ्चस्कन्ध वाले वायुनाल मुखों में
फैला कर उसके द्वारा सर्व पदार्थों का प्रलय जैसा नाशक्रियारहस्य है ॥
(१८) विमुखरहस्यो नाम—रुद्धू [च्छृ ? ] द्वयोक्तप्रकारेण कुवेर-
विमुखवैश्वानरादिबिषचूर्णशक्ती [ ? ] रौद्रीदर्पणपञ्जरतृतीयनाले नियम्य
वातस्कन्धकीलीचालनद्वारा मूर्च्छावस्थाप्रदानेन विवर्शकरणक्रियारहस्यम् ॥
(१८) विमुखरहस्य विचार—रुद्ध द्वय में कहे प्रकारानुसार कुवेर विमुख वैश्वानर * आदि विष-
चूर्ण से उत्पन्न रौद्री शक्ति दर्पणपञ्जर तृतीयनाल में नियन्त्रित करके वातस्कन्ध कीली के चालनद्वारा
मूर्च्छावस्था प्रदान करने से विवर्शकरणक्रिया रहस्य है ॥
(१९) ताररहस्यो नाम—वातजलसूर्यकिरणप्रभाशक्तीना दशसप्त-
षोडशांशान् खतरङ्गशक्त्या संयोज्य तच्छक्ति तारमुखदर्पणद्वारा विमानमुख-
केन्द्रशक्तिनालमुखप्रसारणात्सर्वषा नक्षत्रमण्डलवत्प्रदर्शनक्रियारहस्यम् ॥
(१९) ताररहस्य विचार—वायु, जल, सूर्यकिरणप्रभा की शक्तियों के दश, सप्त, षोडश अंशों
को आकाशतरङ्ग की शक्ति से संयुक्त करके उस शक्ति को तारमुखदर्पण द्वारा विमान मुख की केन्द्रशक्ति
के नालमुख को फैलाने से समस्त नक्षत्रमण्डल के समान प्रदर्शन क्रियारहस्य है ॥
(२०) महाशब्दविमोहनरहस्यो नाम—विमानस्थसप्तनालवायुमेकीकृत्य
शब्दकेन्द्रमुखेऽन्त (अन्त ?) र्धाय पश्चात् कीली (लि ?) प्रचालयेत् तद्गंणाच्छ-
ब्दप्रकाशिकोक्तरीत्या द्विपष्टिध्मानकलासग्रहणाच्छब्दवन्महाशब्दो जायते तद्द्रव-
- कुवेरविमुख वैश्वानर ये किन्ही विषचूर्णों के पारिभाषिक नाम हैं ।