बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविमान के रहस्य ] [ ६
विज्ञाय विधिवत्सर्वं पश्चात् कार्यं समारभेत् [१३]
एतद्रहस्यानुभवो यस्यास्ति गुरुबोधन ॥६॥
स एव व्योमयानाधिकारी स्यान्नेतरे जना (३) [१४]
एतेषां सिद्धनाथोक्तरहस्यार्थविवेचनम् ।
सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्यामि रहस्यज्ञानसिद्धये [१५]
'रहस्यलहरी' में कहा है कि—मान्त्रिक, तान्त्रिक, कृतक, अन्तरालक, गूढ, दृश्य, अदृश्य,
परोक्ष, अपरोक्षक, सङ्कोच, विस्तृत, विरूपकरण, रूपान्तर, सुरूप, ज्योतिर्भाव, तमोमय, प्रलय, विमुख,
महाशब्दविमोहन, लङ्घन, सर्पगमन, चपल, सर्वतोमुख, परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण,
दिकप्रदर्शन, (आकाशाकार, जलदरूप), स्तब्धक, कर्षक। यथाक्रम इन बत्तीस रहस्यों को गुरुमुख
से जानकर पुनः विधिवत् समस्त कार्य प्रारम्भ करना चाहिये ॥ गुरु से सीखा हुआ यह रहस्यानुभव
जिसको है वह ही व्योमयान अर्थात् आकाशयान विमान चलाने का अधिकारी हो सकता है अन्य
जन नहीं ८-१५ ॥
इन बत्तीस प्रकार के विमानविषयक रहस्यों के सिद्धनाथ आचार्य द्वारा वर्णित विवेचन को
मैं रहस्यज्ञानसिद्धि के लिये संक्षेप से कहूँगा ॥१५॥
( १ ) तत्र मान्त्रिकरहस्यो नाम--मन्त्राधिकारोक्तरीत्या छिन्नम-
स्ताभैरवीवेगिनीसिद्धाऽम्बादिमन्त्रानुष्ठानैरुपलब्धसिद्धमार्गोंक्तघुटिकापादुकादृश्या-
दृश्यादिशक्तिभिस्त (भि त ?) था सिद्धाऽम्बा--ओषधैश्च ( धीश्च ? )
र्यादिमन्त्रानुष्ठाने सम्प्राप्त ओषधिभिस्तद्द्वा ( द्रा ? ) वकतैलादिभिश्च
भुवनेश्व (नेश्व) र्यादिमन्त्रानुष्ठानलब्धमन्त्रशक्तिक्रियाशक्त्यादिभिश्च कलास्यो-
जनद्रागऽभेद्यत्वाच्छेद्यत्वादह्याऽविनाशित्वादिगुणविशिष्टविमानरचनाक्रिया
रहस्यम् × ।।
( १ ) मान्त्रिक रहस्य विचार—मन्त्राधिकार में कही रीति के अनुसार छिन्नमस्ता भैरवी वेगिनी
सिद्धाऽम्बा † आदि के मन्त्रानुष्ठानों से उपलब्ध सिद्ध मार्गों में कही हुई घुटिका, पादुका, दृश्य अदृश्य ‡
आदि की शक्तियों द्वारा तथा सिद्धाऽम्बा ओषधि + ऐश्वर्य आदि के मन्त्रानुष्ठानों से प्राप्त ओषधियों
× हस्तलेख में 'द्वारा अभेद्यत्वमच्छेद्यत्व अविनाशित्वादि' ऐसा सन्दिग्ध पाठ है ।
† छिन्नमस्ता आदि चार प्रकार की विद्युत् के नाम पारिभाषिक प्रतीत होते हैं जो यन्त्र में प्रयुक्त की
जाती हैं ।
‡ घुटिका आदि शक्तिरूप साधनों के जातिवाचक नाम हैं।
- राजनिघण्टु में 'सिद्धौषधियां' पांच ओषधियों के नाम बतलाये हैं।
तैलकन्दसुधाकन्दरुदन्ती सर्वपाशिषु ।
तैलकन्दं सुधाकन्दं क्रोडदन्ती रुदन्तिका ।।
सपनेत्रयुता पञ्च सिद्धौषधिसञ्ज्ञका ।। (रा० नि०)