बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविमान के रहस्य ] [ १७
(२८) दिक्प्रदर्शनरहस्यो नाम--विमानमुखकेन्द्रकीलीचालनेन दिशा-
म्पतियन्त्रनालपत्रद्वारा परयानागमनदिक्प्रदर्शनक्रियारहस्यम् ॥
( २८ ) दिक्प्रदर्शन रहस्य विचार—विमानमुखकेन्द्र की कीली चलाने से 'दिशाम्पति' नामक
( दिशाओं के पति ) यन्त्र के नालपत्र के द्वारा दूसरे के यान की आगमनदिशा का प्रदर्शन रहस्य है ॥
(२६) आकाशाकाररहस्यो नाम--आकाशतन्त्रोक्तरीत्या कृष्णाभ्रवारिणा
पिचुमन्दमूलभूनागद्रावकाभ्या यानावरणअभ्रकपटिकामालिप्य तस्मिन् वायुपथ-
किरणशक्तियोजनद्वारा विमानाकाशाकारवत्प्रदर्शनरहस्यम् ॥
( २६ ) आकाशाकाररहस्य विचार—आकाशतन्त्र में कही रीति के अनुसार कृष्ण अभ्रक जल
तथा पिचुमन्दमूल + और भूनाग × के द्रावक रस से यान के आवरण अभ्रकपटिका को लेप कर देने
से उस वायुपथ में किरणशक्तियोजनद्वारा विमान के आकाशाकार होने का प्रदर्शन रहस्य है ॥
(३०) जलरूपरहस्यो नाम--करकाम्लबिल्वतैलशुल्वलवणधूमसार-
ग्रन्थिकरससर्षपपिष्टमीनावरणाद्रवाणा शास्त्रोक्तप्रकारेण भागाशसम्मेलन कृत्वा
मुक्ताफलशुक्तिका लवणासारे सयोग्य सम्मिलितशक्ति धूमाकार कृत्वा विमाना-
वरणोपरिस्थितकिरणप्रभामुखसन्धी-अन्तर्धाय पूर्वोवत्तधू (क्त अधू?) माकार-
द्रावकेण (के न?) विमानावरणलेपन कृत्वा तदुपरि धूमप्रसारणद्वारा
जलदाकारवद्विमानप्रदर्शनरहस्यम् ॥
( ३० ) जलरूपरहस्य विचार—करकाम्ल ❁ दाडिमाम्ल ( दाडिम का तेजाब ), बिल्वतैल,
शुल्वलवण ( ताम्बे का लवण नीलाथोथा ), धूमसार ( गृहधूम ), ग्रन्थिकरस ( गुगल का द्राव या मण्डूर
और पारा ), सर्षपपिष्ट ( सरसों की पीठी ) मीनावरण ( मछली का आवरण ) इनके शास्त्रोक्त प्रकार से
भागांशों को मिलाकर मुक्ताफलशुक्तिका ( मोती की सीपी ) लवणासार† में संयुक्त करके सम्मिलित शक्ति
को धूमाकार करके विमानावरण के ऊपर रहनेवाली किरणप्रभामुखसन्धि में छिपाकर या लगाकर पूर्वोक्त
धूमाकार के द्रावक द्वारा विमानावरण के ऊपर लेपन करके उसके ऊपर धूम फैलाने के द्वारा जलदाकार
अर्थात् ( मेघाकार ) के समान विमानप्रदर्शनरहस्य है ॥
(३१) स्तब्धकरहस्यो नाम--विमानोत्तरपार्श्वस्थसन्धिमुखनालादप-
स्मारधूम सग्राह्य स्तम्भनयन्त्रद्वारा तद्धूमप्रसारणात् परविमानस्थसर्वजनाना
स्तब्धीकरणरहस्यम् ॥
- आयुर्वेदिक निघण्टुओ में 'पिचुमन्द' नाम की ओषधि नही है किन्तु पिचुमन्द ( निम्ब वृक्ष ) हो या कपास
की जड ।
× 'वैद्यक शब्द सिन्धु' कोष में 'भूनाग' केचुआ और सीसे धातु के लिये आया है, हो सकता है यहा सीसे धातु
का रासायनिक द्राव अभीष्ट हो ।
❁ 'करक -दाडिमे, शुल्वं ताम्रे', धूमसार —गृहधूमे, ग्रन्थिक —गुग्गुले मण्डूरे व, रस पारदे (वैद्यक शब्द सिन्धु )
† आयुर्वेदिक निघण्टुओ मे लवणासार शब्द नही है किन्तु लवण क्षार' है जल से उत्पन्न नमक विशेष के लिये
आया है । हो सकता है लवणासार से सोडा अभीष्ट हो ।