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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 368 में से

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पृष्ठ 28

ब्रह्म विमान ] [ ५
वह वाच्य लक्ष्य की एकता का बोधक कहा है वह अन्वयक्रम से क्रियापद स्पष्ट कहा गया है । तीन
विशेषण पद कर्म के यथाक्रम है पाचवा पद प्रसिद्धि दर्शाने के अर्थ कहा गया है । उसी प्रकार सातवा
पद नित्यानन्द का बोधक है और आठवा पद समस्त वेदान्त-उपनिषद् वचनों द्वारा माननीयता के दर्शाने
के अर्थ है ॥ २१—२८ ॥
नत्वेति यत्पद प्रोक्त नत्प्रह्रीभावबोधकम् ।
एतेन तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थोक्तमभूत्क्रमात् ॥ २९ ॥
यद्विमानगतेत्यत्र त्वंपदत्वेन वर्णितम् ।
तत्पदार्थत्वेन ब्रह्मपर पदमितीरितम् ॥ ३० ॥
नत्वैक्यपरामर्शार्थोऽसि पदार्थबोधक ।
इत्थ श्लोकात्तत्त्वमसि वाक्यार्थस्सन्निरूपित ॥ ३१ ॥
तदैक्यानुसन्धानरूपमङ्गलमातनोत् ।
एव विधाय विधिवन्मङ्गलाचरण मुनि ॥ ३२ ॥
पूर्वाचार्याश्च तद्ग्रन्थान् द्वितीयश्लोक्तोब्रवीत् ।
विश्वनाथोक्तनामानि तेषा वक्ष्ये यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
नारायण (णो ?) शौनकश्च गर्गो वाचस्पतिस्तथा ।
चाक्रायणिर्धुण्डिनाथश्चेति शास्त्रकृतस्स्वयम् ॥३४॥
विमानचन्द्रिका व्योमयानतन्त्रस्तथैव च ।
यन्त्रकल्पो यानबिन्दु खेटयानप्रदीपिका ॥ ३५ ॥
व्योमयानार्कप्रकाशश्चेति शास्त्राणि षट् क्रमात् ।
नारायणादिमुनिभि प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥ ३६ ॥
विचार्यैतानि विधिवद् भरद्वाज कृपानिधि ।
वैमानिकप्रकरण सर्वलोकोपकारकम् ।
पारिभाषिकरूपेण रचयामास विस्तरात् ॥ ३७ ॥
मङ्गल वचनों में 'नत्वा' यह पद जो भरद्वाज ऋषि ने कहा है वह आदर-विनय भाव का
दर्शक है इससे 'तत्त्वमसि' आदि उपनिषद् वाक्यार्थो से कहा हुआ ब्रह्म क्रम से समझना चाहिये ।
'यद्विमान गत०' यहा त्वं पदरूप से उपनिषद् वचन में 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' कहा गया है 'तत्' पदार्थ-
रूप से ब्रह्मपरक पद है ऐसा कहा है । 'नत्वा' यह ऐक्य परामर्श ( जीवब्रह्म की एकता ) के साथ सम्बन्ध
रखने वाला 'असि' का पदार्थबोधक है इस प्रकार श्लोक से 'तत्त्वमसि' वाक्य का अर्थ निरूपित किया
है+। भरद्वाज मुनि ने इस प्रकार विधिवत् मङ्गलाचरण करके उस ऐक्यार्थ के अनुसन्धानरूप मङ्गल
का विस्तार किया है ॥ पूर्व आचार्यों और उनके ग्रन्थों को दूसरे श्लोक से कहा है, विश्वनाथ आचार्य के

  • यहा जीवब्रह्म की एकता का सिद्धान्त वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके वचनो का
    अनुवाद किया है ।