बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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र्कोदये ( ये ? ) कपञ्चाशल्लक्षनवसहस्राष्टशतसंख्याकानि भवन्ति तेषु भूरादि
सप्तलोकविमानास्सञ्चरन्तीति ॥
यह बात शौनकीय शास्त्र में कही है—
अब आकाशमार्गों को कहेंगे। रेखा, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र के भेद से भूतशक्तिप्रवाह-
मार्ग कूर्म से लेकर अरुण पर्यन्त ( आकूर्मार्दो आ अरुणान्तं' इस प्रकार पदच्छेद होने पर ) या कूर्म से
लेकर वरुणपर्यन्त (आकूर्मार्द् आ वारुणान्तं' पदच्छेद होने पर ❀ ) बाण ( आयतन ) का अवष्टम्भन
करके इक्तालीस से इक्यावन लक्ष नौ सहस्र आठ सौ होते हैं। उनमें 'भू' आदि सातलोकरूपविमान
सञ्चार करते हैं ॥
एतेषु सूत्रोक्तपञ्चमार्गभेदा यथाक्रमम् ।
यथोक्त धुण्ढिनाथेन तथैवात्र निरूप्यते—
रेखामार्गास्सप्तकोटित्रिलक्षाष्टशतास् (ना ?) स्मृता ।
+द्वाविंशत्कोट्यष्टलक्षद्विशत मण्डले क्रमात् ॥ १ ॥
द्विकोटिनवलक्षत्रिशत कध्ये निरूपिता ।
दशकोट्येकलक्षत्रिशत शक्तिपथेरिता ॥ २ ॥
त्रिशल्लक्षाष्टसाहस्रद्विशत केन्द्रमण्डले ।
एव रेखादिकेन्द्रान्तमण्डलेषु यथाक्रमम् ॥ ३ ॥
वाल्मीकिगणितान्मार्गसंख्या श्लोकैर्नि (नि ?) रूपिता ।
इनमें सूत्रोक्त पांच मार्गभेद यथाक्रम धुण्ढिनाथ ने जैसे कहा है यहा निरूपित किया जाता है—
'रेखामार्ग' सात कोटि तीन लाख आठसौ कहे गये हैं, बाईस कोटि आठ लाख दो सौ 'मण्डल'
में क्रम से, दो कोटि नौ लाख तीन सौ 'कक्ष्य' में कहे हैं, दश कोटि एक लक्ष तीन सौ 'शक्तिपथ' में
कहे हैं, तीन लाख आठ सहस्र दो सौ केन्द्रमण्डल में इस प्रकार 'रेखामार्ग' से लेकर 'केन्द्र' तक मण्डलों
में क्रमानुसार वाल्मीकि गणित से मार्ग संख्या श्लोकों से बतलाई गई है ॥ १–३ ॥
एतेषु यानसञ्चारमार्गनिर्णयमुच्यते ॥—
प्रथमायाश्चतुर्थान्त मार्ग [र्गा?] रेखापथे क्रमात् ।
भुवर्लोकसुवर्लोकमहलोकनिवासिनाम् ॥ १ ॥
विमानसञ्चारमार्गा इति शास्त्रेषु वर्णिता ।
जनो लोकविमानाना गमने मार्गनिर्णय ॥ २ ॥
द्वितीयाद्यापञ्चमान्तमु (त उ ?) क्ता कक्ष्यपथे क्रमात् ।
प्रथमाद्याषडन्तास्स्यु (ता स्यु ?) मार्गाश्शक्तिपथे क्रमात् ॥ ३ ॥
तपोलोकविमानानामिति शास्त्रविनिर्णय ।
तृतीया (य्या ?) येकादशान्ता ब्रह्मलोकनिवासिनाम् ॥ ४ ॥
❀ इस पक्ष मे 'वारुण' में 'वा' लेखकदोष या स्वार्थ मे अण् से आकार है ।
- 'द्वाविंशत्' इत्येतत्पद चिन्त्यम् । द्वात्रिंशत् इत्यनेन भवितव्य किंवा द्वाविंशति' इत्यस्य इकारलोप
आर्षश्छन्दस्संख्यापूर्त्यर्थत्वाच्छान्दसो वा ।