बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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उक्तं हि मार्गनिबन्धने—
लहयोर्वहयोश्चैव यहयोरहयोस्तथा ।
महयोरन्तरालेषु शक्त्यावर्ता इतीरिता. ।। १ ।। (लल्लकारिका)
लकारेणात्र भूप्रोक्ता हकारादम्बरं स्मृतम् ।
प्रोक्तास्तयोरन्तराले रेखामार्गा (ग ?) स्त्वनेककः ॥ २ ॥
शक्त्यावर्तास्तेष्वनन्तास्स (न्ता स ?) भवन्त्य ( बर्त्य ? ) तिवेगत ।
तैर्भूलोकविमानानां विनाश इति निश्चितः ॥ ३ ॥
अम्बरे वणिते स्याद्वहकारात्मना क्रमात् ।
तयोर्मध्ये मण्डलाख्यमार्गा प्रोक्ता विशेषतः ॥ ४ ॥
वातावर्तास्तेष्वनन्तास्स भवन्त्यतिवेगतः ।
लोकत्रयविमानानां विनाशस्तेषु वणितः ॥ ५ ॥
तथैव यहवर्णाभ्यां वाय्वाकाशे निरूपिते ।
तयोर्मध्ये कक्ष्यार्मास्त्वनेकास्सप्रकीर्तिताः ॥ ६ ॥
भवन्ति किरणावर्तास्तेष्वंशुना प्रवाहतः ।
जनो लोकविमानाना विनाशस्तत्र वर्णितः ॥ ७ ॥
‘मार्गनिबन्धन’ में कहा है—
ल, ह के व, ह के य, ह के तथा र, ह के म, ह के अन्तरालों में शक्त्यावर्त होते हैं ऐसा
कहा है । ‘ल’ से भूमि कही है ‘ह’ से अम्बर समझा गया, इन दोनों के अन्तराल में रेखामार्ग अनेक
हैं । शक्त्यावर्त उनमें अनेक अतिवेग से उत्पन्न हो जाते हैं । उनके द्वारा भूलोकविमानों का विनाश
निश्चित हो जाता है । दो अम्बर व, ह से क्रमशः कहे हैं उनके मध्य में मण्डलनामक मार्ग विशेषतः
कहे गये हैं । उनमें अनन्त आवर्त अतिवेग से उत्पन्न हो जाते हैं जिनमें तीनों लोकों के विमानों का
विनाश वर्णन किया है । इसी प्रकार य, ह वर्ण से वायु आकाश निरूपित किये हैं, उनके मध्य में कक्ष्य
मार्ग अनेक हैं । उनके अन्दर किरणावर्त अंशुओं के प्रवाह से हो जाते हैं वहां ‘जन.’ लोक विमानों का
विनाश वर्णन किया है ॥ १—७ ॥
रवर्णेन रवि प्रोक्तो हवर्णादम्बरं स्मृतम् (तं ?) ।
तयोर्मध्ये शक्तिमार्गा बहुधा सम्प्रकीर्तिताः ॥ ८ ॥
शैत्यावर्तास्तेषु शक्तिससर्गादतिवेगतः ।
सम्भवन्ति विशेषेण खेटयानविनाशकाः ॥ ९ ।
महामार्तण्डशक्तित्वप्रवाहाशो मकारतः ।
हकारेणाम्बरञ्चैव वर्णितं स्याद्यथाक्रमम् ॥१०॥
तयोर्मध्ये केन्द्रमार्गा बहुधा सम्प्रकीर्तिताः ।
भवन्ति घर्षणावर्तास्तेषु नानामुखाः क्रमात् ॥११॥